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April 11, 2026
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भारत

भारत (989)

   नई दिल्ली / पश्चिम एशिया में हालिया घटनाक्रमों और क्षेत्रीय तनाव के बीच भारत ने सक्रिय कूटनीतिक पहल करते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में खाड़ी देशों के शीर्ष नेतृत्व से उच्चस्तरीय संवाद स्थापित किया। प्रधानमंत्री ने मंगलवार को कतर के अमीर, कुवैत के क्राउन प्रिंस और ओमान के सुल्तान से टेलीफोन पर अलग-अलग वार्ता कर क्षेत्रीय शांति, संप्रभुता और भारतीय समुदाय की सुरक्षा जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा की।

कतर के अमीर से बातचीत
प्रधानमंत्री मोदी ने कतर के अमीर महामहिम शेख तमीम बिन हमद अल सानी से बातचीत में भारत की ओर से कतर के साथ अटूट एकजुटता व्यक्त की। उन्होंने कतर की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के किसी भी उल्लंघन की कड़ी निंदा की।
दोनों नेताओं ने संवाद और कूटनीति के माध्यम से क्षेत्र में शांति एवं स्थिरता की शीघ्र बहाली पर बल दिया। प्रधानमंत्री ने इस चुनौतीपूर्ण समय में कतर में रह रहे भारतीय समुदाय को वहां के नेतृत्व द्वारा दिए जा रहे निरंतर समर्थन और स्नेह के लिए आभार व्यक्त किया।

कुवैत के क्राउन प्रिंस से सार्थक संवाद
प्रधानमंत्री ने कुवैत के क्राउन प्रिंस महामहिम शेख सबाह अल-खालिद अल-हमद अल-मुबारक अल-सबाह से भी फोन पर विस्तृत चर्चा की। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारत कुवैत की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा करता है तथा इस कठिन समय में कुवैत के लोगों के साथ मजबूती से खड़ा है।
वार्ता के दौरान दोनों नेताओं ने क्षेत्रीय शांति बहाली में कूटनीतिक प्रयासों और संवाद की अहम भूमिका को रेखांकित किया। प्रधानमंत्री ने कुवैत में भारतीय समुदाय की सुरक्षा और भलाई सुनिश्चित करने में कुवैती नेतृत्व के सहयोग की सराहना की।

ओमान के सुल्तान से पश्चिम एशिया की स्थिति पर विचार-विमर्श
प्रधानमंत्री मोदी ने ओमान के महामहिम सुल्तान हैथम बिन तारिक से भी बातचीत की और पश्चिम एशिया की वर्तमान परिस्थितियों पर विचारों का आदान-प्रदान किया। उन्होंने ओमान की संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन की निंदा करते हुए क्षेत्र में स्थिरता की शीघ्र बहाली के लिए निरंतर कूटनीतिक संवाद को आवश्यक बताया।
प्रधानमंत्री ने ओमान द्वारा भारतीय समुदाय को दिए जा रहे निरंतर सहयोग के लिए आभार व्यक्त किया।

भारत का स्पष्ट संदेश
इन तीनों वार्ताओं के माध्यम से भारत ने एक स्पष्ट और संतुलित कूटनीतिक संदेश दिया है—
खाड़ी देशों की संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता के समर्थन में भारत की दृढ़ प्रतिबद्धता।
तनाव की स्थिति में संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता।
विदेशों में रह रहे भारतीय नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता।
विशेषज्ञों के अनुसार, पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच भारत की यह सक्रिय पहल न केवल क्षेत्रीय स्थिरता के समर्थन का संकेत है, बल्कि खाड़ी देशों के साथ भारत के मजबूत रणनीतिक और मानवीय संबंधों को भी रेखांकित करती है।
भारत ने एक बार फिर यह स्पष्ट किया है कि वह वैश्विक मंच पर शांति, स्थिरता और सहयोग की नीति पर अडिग है।

विशेष रिपोर्ट | उत्तर प्रदेश

सनातन धर्म, जो त्याग, तप, सत्य और चरित्र की शुचिता का प्रतीक माना जाता है, आज एक गंभीर विमर्श के केंद्र में है। कारण है—स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पर आरोप लगाने वाले आशुतोष पांडे उर्फ आशुतोष ब्रह्मचारी, जिनका नाम दीक्षा, ब्रह्मचर्य और धार्मिक संगठनों से जुड़ने के साथ-साथ एक लंबे और विवादास्पद आपराधिक इतिहास से भी जुड़ा रहा है।

21 से 27 मुकदमों का साया

विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स और पुलिस रिकॉर्ड के अनुसार, आशुतोष पांडे पर 21 से 27 तक आपराधिक मुकदमे दर्ज बताए जाते हैं। इन मामलों में गैंगरेप (धारा 376), धोखाधड़ी (420), जबरन वसूली, गैंगस्टर एक्ट, गोवध अधिनियम, आईटी एक्ट और धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने जैसी गंभीर धाराएं शामिल हैं।
शामली जिले के कांधला थाना क्षेत्र में वे एक घोषित हिस्ट्रीशीटर हैं, जिनकी हिस्ट्रीशीट संख्या 76A है। पुलिस रिकॉर्ड में उनके नाम आशु शर्मा और अश्वनी सिंह के रूप में भी दर्ज होने की बात सामने आई है।

जिलों में फैला आपराधिक नेटवर्क

आशुतोष पांडे के खिलाफ मुकदमे केवल एक जिले तक सीमित नहीं हैं।

  • शामली (कांधला): 2019 में उन पर ₹25,000 का इनाम घोषित किया गया था।

  • मथुरा: कृष्ण जन्मभूमि से जुड़े मामलों में पक्षकार होने के साथ धोखाधड़ी और धमकी के आरोप।

  • गोंडा, लखनऊ, मुजफ्फरनगर: यहां भी उनके खिलाफ आपराधिक प्रकरण लंबित बताए जाते हैं।

फर्जी दस्तावेज और गौ-तस्करी के आरोप

उन पर फर्जी दस्तावेजों के सहारे चुनाव लड़ने, फर्जी पहचान पत्रों के इस्तेमाल और गौ-तस्करी में संलिप्तता के आरोप भी लगे हैं। कुछ मामलों में पुलिस को रिश्वत देने की कोशिश और जेल यात्रा की पुष्टि भी रिपोर्ट्स में की गई है।

हालिया पुलिस कार्रवाई

  • शामली: अक्टूबर 2025 में कांधला थाने में एक महिला की शिकायत पर घर में घुसकर मारपीट, चोट पहुंचाने और धमकी देने का मामला दर्ज हुआ।

  • मथुरा: मई 2024 में गोविंद नगर थाने में धोखाधड़ी और धमकी (धारा 406, 504, 506 IPC) का केस। इस एफआईआर को रद्द कराने की याचिका इलाहाबाद हाई कोर्ट ने खारिज कर दी, केवल प्रक्रियागत राहत दी गई।

दीक्षा और विवाद का संगम

वर्ष 2022 में जगद्गुरु रामभद्राचार्य से दीक्षा लेने के बाद आशुतोष पांडे ने स्वयं को आशुतोष ब्रह्मचारी घोषित किया और सन्यासी जीवन अपनाने का दावा किया। इसके बाद वे मथुरा में बस गए और “श्रीकृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट” के अध्यक्ष बने।
यहीं से एक बड़ा सवाल खड़ा होता है—क्या दीक्षा मात्र से अतीत के आपराधिक आरोप धुल जाते हैं, या फिर यह धार्मिक आवरण का दुरुपयोग है?

फरवरी 2026 का नया मोड़

फरवरी 2026 में एक पत्रकार द्वारा सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करना कि उसे स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद को झूठे यौन शोषण के मामले में फंसाने के लिए उकसाया गया, इस पूरे प्रकरण को और गंभीर बना देता है। हालांकि आशुतोष की शिकायत पर प्रयागराज की पॉक्सो कोर्ट के आदेश से एफआईआर दर्ज हुई है, लेकिन अब पुलिस आरोपकर्ता के आपराधिक इतिहास और शिकायत की सत्यता की गहन जांच कर रही है।

सनातन धर्म की गरिमा पर प्रश्न

धर्माचार्य, संत और समाज के प्रबुद्ध वर्ग मानते हैं कि सनातन धर्म का वस्त्र केवल बाहरी आवरण नहीं, बल्कि आचरण और चरित्र की कसौटी है। यदि आपराधिक प्रवृत्ति के लोग धार्मिक पदों, ब्रह्मचारी या पीठाधीश्वर जैसे शब्दों का सहारा लेकर समाज को भ्रमित करते हैं, तो यह न केवल कानून बल्कि धर्म की आत्मा के साथ भी अन्याय है।

निष्कर्ष

आशुतोष पांडे उर्फ आशुतोष ब्रह्मचारी का मामला केवल एक व्यक्ति या एक आरोप तक सीमित नहीं है। यह उस बड़ी चुनौती की ओर संकेत करता है, जहां धर्म की आड़ में आपराधिक अतीत को छिपाने की कोशिश समाज को दिग्भ्रमित कर सकती है।
अब यह जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था, न्यायपालिका और धर्मगुरुओं—तीनों की है कि सनातन धर्म की गरिमा को बचाया जाए और यह स्पष्ट संदेश जाए कि धर्म का चोला अपराधों पर पर्दा नहीं बन सकता

नई दिल्ली / 
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा केरल का आधिकारिक नाम बदलकर 'केरलमÓ किए जाने के ऐतिहासिक निर्णय पर केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने राज्य के लोगों को हार्दिक बधाई दी है। यह फैसला केरल के लोगों की लंबे समय से चली आ रही सांस्कृतिक और भाषाई मांग को पूरा करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और सम्मानजनक कदम माना जा रहा है।
राज्य की विरासत को उसकी असली पहचान
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ङ्ग पर साझा किए गए अपने संदेश में श्री अमित शाह ने कहा कि 'केरलमÓ नाम राज्य की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और भाषाई विरासत को उसकी पूरी सच्चाई के साथ प्रतिबिंबित करता है। उन्होंने कहा कि यह नाम न केवल राज्य की प्राचीन पहचान को सहेजता है, बल्कि उसके गौरव और आत्मसम्मान को भी बनाए रखेगा।
लंबे समय की मांग को मिला संवैधानिक सम्मान
श्री शाह ने कहा कि केंद्र सरकार का यह निर्णय केरलवासियों की उस भावना का सम्मान है, जो वर्षों से अपनी मातृभाषा और परंपरा के अनुरूप राज्य के नाम को मान्यता दिलाने की मांग कर रहे थे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि यह कदम भारत की विविधता में एकता के सिद्धांत को और अधिक सशक्त करता है।
मोदी सरकार की सांस्कृतिक संवेदनशीलता का प्रतीक
राजनीतिक और सांस्कृतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह निर्णय मोदी सरकार की उस नीति को दर्शाता है, जिसमें स्थानीय पहचान, भाषा और परंपरा को राष्ट्रीय सम्मान देने पर विशेष जोर दिया जा रहा है। इससे पहले भी केंद्र सरकार ने ऐतिहासिक और सांस्कृतिक नामों को पुनस्र्थापित करने की दिशा में कई अहम फैसले किए हैं।
केरलम: नाम नहीं, आत्मा की पहचान
'केरलमÓ शब्द मलयालम भाषा और राज्य की सभ्यता से गहराई से जुड़ा हुआ है। यह नाम राज्य के इतिहास, समुद्री व्यापार, आयुर्वेद, साहित्य और सामाजिक चेतना की पहचान को और अधिक प्रामाणिक रूप में प्रस्तुत करता है।

नई दिल्ली/
भारत और इजरायल के बीच मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) को लेकर वार्ता का पहला दौर 23 फरवरी 2026 को नई दिल्ली में प्रारंभ हुआ, जो 26 फरवरी 2026 तक चलेगा। यह पहल दोनों देशों के बीच व्यापार और आर्थिक सहयोग को नई ऊंचाई देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।

नवंबर 2025 में दोनों पक्षों ने वार्ता के लिए संदर्भ की शर्तों (टीओआर) पर हस्ताक्षर कर एक संरचित ढांचा तैयार किया था। वित्त वर्ष 2024-25 में भारत और इजरायल के बीच कुल द्विपक्षीय व्यापार 3.62 बिलियन अमेरिकी डॉलर रहा। दोनों देश कई क्षेत्रों में एक-दूसरे के पूरक हैं, ऐसे में प्रस्तावित एफटीए से व्यापार में स्थिरता और पूर्वानुमेयता आएगी, विशेषकर एमएसएमई क्षेत्र को इसका लाभ मिलेगा।

इन प्रमुख विषयों पर होगी चर्चा

वार्ता के इस दौर में तकनीकी विशेषज्ञ वस्तुओं और सेवाओं के व्यापार, रूल्स ऑफ ओरिजिन, स्वच्छता एवं पादप स्वच्छता उपाय (SPS), व्यापार में तकनीकी बाधाएं (TBT), सीमा शुल्क प्रक्रिया एवं व्यापार सुगमीकरण, तथा बौद्धिक संपदा अधिकार जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विस्तृत चर्चा करेंगे।

प्रधानमंत्री की यात्रा के साथ अहम शुरुआत

उद्घाटन सत्र में वाणिज्य सचिव राजेश अग्रवाल ने कहा कि यह वार्ता 25-26 फरवरी 2026 को नरेंद्र मोदी की इजरायल यात्रा के अवसर पर प्रारंभ होना दोनों देशों के लिए विशेष महत्व रखता है। उन्होंने नवाचार, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, साइबर सुरक्षा, हाई-टेक विनिर्माण, कृषि और सेवाओं के क्षेत्रों में अपार संभावनाओं पर जोर दिया।

भारत के मुख्य वार्ताकार और वाणिज्य विभाग के अपर सचिव अजय भादू ने संतुलित और भविष्योन्मुखी समझौते की आवश्यकता पर बल दिया। वहीं इजरायल की मुख्य वार्ताकार यिफ़त अलोन पेरेल ने कहा कि यह एफटीए आपूर्ति श्रृंखलाओं को मजबूत करने, सहयोग बढ़ाने और नए बाजारों के द्वार खोलने में सहायक होगा।

रणनीतिक साझेदारी को मजबूती

यह पहल भारत-इजरायल संबंधों के रणनीतिक महत्व को रेखांकित करती है। दोनों देश एक संतुलित, पारस्परिक रूप से लाभकारी और दीर्घकालिक आर्थिक साझेदारी को साकार करने की दिशा में प्रतिबद्ध हैं। प्रस्तावित एफटीए को द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने और वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता मजबूत करने के लिए एक अहम कदम माना जा रहा है।

  नई दिल्ली / एजेंसी /
भारतीय नौसेना पनडुब्बी रोधी युद्ध (एएसडब्ल्यू) क्षमताओं को बढ़ाने के लिए आठ युद्धपोतों वाली एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यू-एसडब्ल्यूसी) परियोजना के तीसरे पोत अंजदीप को शामिल करने जा रही है। इस युद्धपोत को 27 फरवरी, 2026 को चेन्नई बंदरगाह पर पूर्वी नौसेना कमान में औपचारिक रूप से शामिल किया जाएगा।

इस समारोह की अध्यक्षता नौसेना प्रमुख एडमिरल दिनेश के त्रिपाठी करेंगे।

इस शुभारंभ समारोह से रक्षा क्षेत्र में 'आत्मनिर्भर भारत' की दिशा में राष्ट्र की तीव्र प्रगति का पता चलता है, क्योंकि एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट परियोजना स्वदेशी युद्धपोत डिजाइन और निर्माण की सफलता का उत्कृष्ट उदाहरण है। गार्डन रीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स (जीआरएसई), कोलकाता द्वारा निर्मित, अंजदीप एक अत्याधुनिक पोत है जिसे विशेष रूप से तटीय युद्ध वातावरण की चुनौतियों का सामना करने के लिए डिजाइन किया गया है - यानी तटीय और उथले जल क्षेत्र जो राष्ट्र की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

यह पोत 'डॉल्फिन हंटर' के रूप में कार्य करने के लिए डिज़ाइन किया गया है, जिसका मुख्य उद्देश्य तटीय क्षेत्रों में दुश्मन की पनडुब्बियों का पता लगाना, उनका पीछा करना और उन्हें निष्क्रिय करना है। यह पोत स्वदेशी, अत्याधुनिक पनडुब्बी रोधी हथियारों और सेंसर पैकेज से सुसज्जित है, जिसमें हल माउंटेड सोनार अभय भी शामिल है, और हल्के टॉरपीडो और पनडुब्बी रोधी रॉकेटों से लैस है। अपनी प्राथमिक पनडुब्बी रोधी भूमिका के अलावा, यह फुर्तीला और अत्यधिक पैंतरेबाज़ी करने में सक्षम युद्धपोत तटीय निगरानी, ​​कम तीव्रता वाले समुद्री अभियान (एलआईएमओ) और खोज एवं बचाव अभियान चलाने में भी सक्षम है। 77 मीटर लंबे इस पोत में एक उच्च गति वाला वाटर-जेट प्रोपल्सन प्रणाली है, जो इसे त्वरित प्रतिक्रिया और निरंतर संचालन के लिए 25 समुद्री मील की अधिकतम गति प्राप्त करने में सक्षम बनाती है।

कारवार तट से दूर स्थित ऐतिहासिक रूप से महत्वपूर्ण द्वीप के नाम पर नामित अंजदीप नामक पोत को नौसेना में शामिल करने से तमिलनाडु और पुडुचेरी क्षेत्र सहित देश के विशाल समुद्री हितों और तटीय क्षेत्रों की रक्षा करने की नौसेना की क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जो भारतीय नौसेना को एक दुर्जेय 'निर्माता नौसेना' में बदलने की दिशा में एक और महत्वपूर्ण कदम है।

   नई दिल्ली / एजेंसी / प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने आज देश भर में 30 लाख घरों को रूफटॉप सोलर से सशक्त बनाने की सफलता की प्रशंसा की। उन्होंने इसे भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा में एक सराहनीय उपलब्धि बताया।
प्रधानमंत्री ने रूफटॉप सोलर अपनाने वाले सभी लाभार्थियों को बधाई दी और रेखांकित किया कि यह पहल नागरिकों के बीच बचत, स्थिरता और आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दे रही है।
श्री मोदी ने इस बात पर बल दिया कि यह योजना ऊर्जा आत्मनिर्भर, पर्यावरण अनुकूल और भविष्य के लिए तैयार भारत के निर्माण की दिशा में सरकार के प्रयासों का एक अभिन्न अंग है।
केंद्रीय मंत्री श्री प्रल्हाद जोशी के एक पोस्ट का उत्तर देते हुए, प्रधानमंत्री ने पोस्ट किया;

“भारत की स्वच्छ ऊर्जा यात्रा में एक सराहनीय उपलब्धि!
उन सभी को बहुत-बहुत बधाई जिन्होंने इस योजना का लाभ उठाया है और रूफटॉप सोलर को अपनाया है, जिससे बचत, सतत जीवनशैली और आत्मनिर्भरता को बल मिला है। यह योजना ऊर्जा आत्मनिर्भर, पर्यावरण अनुकूल और भविष्य के लिए तैयार भारत के निर्माण के हमारे प्रयासों का एक अभिन्न हिस्सा है।

   नई दिल्ली /  भारत निर्वाचन आयोग (ECI) द्वारा मंगलवार, 24 फरवरी 2026 को नई दिल्ली स्थित भारत मंडपम में भारत निर्वाचन आयोग और राज्य निर्वाचन आयुक्तों (SEC) का राष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है। उल्लेखनीय है कि यह सम्मेलन 27 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद हो रहा है, इससे पूर्व ऐसा सम्मेलन वर्ष 1999 में आयोजित हुआ था।
सम्मेलन की अध्यक्षता मुख्य निर्वाचन आयुक्त श्री ज्ञानेश कुमार करेंगे। इस अवसर पर निर्वाचन आयुक्त डॉ. सुखबीर सिंह संधु और डॉ. विवेक जोशी भी उपस्थित रहेंगे। देश के सभी 36 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के राज्य निर्वाचन आयुक्त अपने कानूनी एवं तकनीकी विशेषज्ञों के साथ भाग लेंगे, वहीं सभी राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) भी सम्मेलन में शामिल होंगे।
समन्वय और सहकारी संघवाद पर जोर
इस राष्ट्रीय गोलमेज सम्मेलन का प्रमुख उद्देश्य निर्वाचन प्रक्रियाओं और व्यवस्थाओं के संदर्भ में ईसीआई और राज्य निर्वाचन आयुक्तों के बीच तालमेल को मजबूत करना है। सम्मेलन से निर्वाचन प्रबंधन में सहकारी संघवाद की भावना को और सुदृढ़ करने की उम्मीद है।
तकनीक, ईवीएम और मतदाता सूची पर मंथन
दिनभर चलने वाले इस सम्मेलन में निर्वाचन प्रक्रियाओं को सशक्त बनाने,प्रौद्योगिकी के उपयोग,ईवीएम की मजबूती, पारदर्शिता और सुरक्षा,तथा मतदाता सूचियों को साझा करने जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर विचार-विमर्श होगा।आयोग के वरिष्ठ अधिकारी हाल ही में शुरू किए गए ईसीआईएनईटी (ECINET) डिजिटल प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुतियां देंगे और बताएंगे कि यह प्लेटफॉर्म निर्वाचन सेवाओं को किस प्रकार सरल और प्रभावी बना रहा है।
मतदाता पात्रता पर तुलनात्मक प्रस्तुति
सम्मेलन में जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में मतदाता पात्रता से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर एक तुलनात्मक प्रस्तुति भी दी जाएगी, जिससे मतदाता सूची निर्माण से जुड़े कानूनों पर सूचनात्मक चर्चा संभव हो सके।
संवैधानिक पृष्ठभूमि
राज्य निर्वाचन आयोगों का गठन 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के तहत संबंधित राज्य कानूनों द्वारा किया जाता है। अनुच्छेद 243के और 243जेडए के अंतर्गत पंचायतों और नगरीय निकायों के चुनाव तथा मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी राज्य निर्वाचन आयुक्तों को सौंपी गई है।
कुल मिलाकर, यह सम्मेलन देश की निर्वाचन प्रणाली को और अधिक पारदर्शी, तकनीक-सक्षम और समन्वित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण और दूरगामी कदम माना जा रहा है।

नई दिल्ली/ 
शाकुंभरी पीठाधीश्वर आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज (आशुतोष महाराज) द्वारा ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों ने धार्मिक जगत के साथ-साथ राजनीतिक और कानूनी हलकों में भी तीखी बहस छेड़ दी है। मामला सीधे नाबालिगों के कथित यौन शोषण जैसे अत्यंत संवेदनशील आरोपों से जुड़ा है, जिस पर न्यायिक प्रक्रिया सक्रिय हो चुकी है।

क्या हैं आरोप और कोर्ट का रुख
आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने प्रयागराज की स्पेशल POCSO कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिविरों तथा वाराणसी स्थित विद्यामठ में नाबालिगों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं होती रही हैं। याचिका के साथ प्रस्तुत कथित साक्ष्यों और दो नाबालिगों के बयानों के आधार पर अदालत ने 21 फरवरी 2026 को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद गिरी के विरुद्ध FIR दर्ज करने का आदेश दिया।

कानूनी स्पष्टता: यह आदेश जांच शुरू करने से संबंधित है; दोष-निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

अन्य आरोप: पद, संपत्ति और फंडिंग
यौन शोषण के आरोपों के साथ-साथ आशुतोष महाराज ने शंकराचार्य पर ‘फर्जी शंकराचार्य’, अवैध संपत्ति और विदेशी फंडिंग से जुड़े आरोप भी लगाए हैं। इन दावों पर भी अलग-अलग स्तर पर जांच की मांग की गई है।

पलटवार: आरोपकर्ता की साख पर सवाल
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थकों ने आरोपों को निराधार बताते हुए आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। उनके अनुसार आशुतोष महाराज उत्तर प्रदेश के शामली (कांधला थाना) में हिस्ट्रीशीटर के रूप में दर्ज बताए जाते हैं। समर्थकों का दावा है कि उन पर करीब 21 आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, जिनमें जबरन उगाही, धोखाधड़ी और गंभीर धाराएं शामिल बताई जाती हैं।
गैंगरेप के पुराने आरोप का उल्लेख भी किया जा रहा है, जिस पर आशुतोष महाराज ने पहले ही सफाई देते हुए इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया था और मेडिकल जांच का हवाला दिया था।
महत्वपूर्ण: ये सभी दावे/आरोप हैं; अंतिम सत्य का निर्धारण केवल अदालतें ही करेंगी।

पहले भी विवादों में रहे हैं आशुतोष महाराज
सतनामी समाज विवाद (नवंबर 2025): बिलासपुर में कथित अपमानजनक टिप्पणी के मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई थी, जिसने सामाजिक तनाव को जन्म दिया।
राजनीतिक संबंध: वे श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। उन पर राम मंदिर विरोधी दलों से नजदीकी जैसे आरोप भी लगते रहे हैं, जिनसे उनका सार्वजनिक प्रोफाइल विवादास्पद बना रहा है।
धार्मिक पृष्ठभूमि: आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज, जगद्गुरु रामभद्राचार्य के शिष्य बताए जाते हैं—इस कारण यह विवाद केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धार्मिक प्रतिष्ठानों की साख से भी जुड़ गया है।

व्यापक असर: आस्था बनाम जवाबदेही
यह प्रकरण भारत में धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता, नैतिक जवाबदेही और कानून के समान अनुप्रयोग पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। एक ओर नाबालिगों की सुरक्षा सर्वोपरि है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक निष्पक्षता और निर्दोषता की धारणा भी उतनी ही आवश्यक है।
अब निगाहें पुलिस जांच, साक्ष्यों की पड़ताल और अदालती सुनवाई पर टिकी हैं। सच चाहे जो हो, यह मामला तय करेगा कि आस्था के बड़े मंचों पर बैठे लोगों के लिए कानून की कसौटी कितनी कठोर और समान रूप से लागू होती है।
यह विवाद आरोपों और प्रत्यारोपों से आगे बढ़कर सत्य की न्यायिक खोज का विषय है। अंतिम फैसला अदालत का होगा—और वही तय करेगा कि यह प्रकरण आस्था पर कलंक है या आरोपों का राजनीतिक-व्यक्तिगत तानाबाना। तब तक, जिम्मेदार पत्रकारिता का धर्म है कि तथ्यों को दावे के रूप में, संतुलन और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया जाए।

नई दिल्ली/ 
शाकुंभरी पीठाधीश्वर आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज (आशुतोष महाराज) द्वारा ज्योतिष पीठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के खिलाफ लगाए गए गंभीर आरोपों ने धार्मिक जगत के साथ-साथ राजनीतिक और कानूनी हलकों में भी तीखी बहस छेड़ दी है। मामला सीधे नाबालिगों के कथित यौन शोषण जैसे अत्यंत संवेदनशील आरोपों से जुड़ा है, जिस पर न्यायिक प्रक्रिया सक्रिय हो चुकी है।

क्या हैं आरोप और कोर्ट का रुख
आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज ने प्रयागराज की स्पेशल POCSO कोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया कि शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के शिविरों तथा वाराणसी स्थित विद्यामठ में नाबालिगों के साथ यौन उत्पीड़न की घटनाएं होती रही हैं। याचिका के साथ प्रस्तुत कथित साक्ष्यों और दो नाबालिगों के बयानों के आधार पर अदालत ने 21 फरवरी 2026 को शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके शिष्य मुकुंदानंद गिरी के विरुद्ध FIR दर्ज करने का आदेश दिया।

कानूनी स्पष्टता: यह आदेश जांच शुरू करने से संबंधित है; दोष-निर्धारण न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

अन्य आरोप: पद, संपत्ति और फंडिंग
यौन शोषण के आरोपों के साथ-साथ आशुतोष महाराज ने शंकराचार्य पर ‘फर्जी शंकराचार्य’, अवैध संपत्ति और विदेशी फंडिंग से जुड़े आरोप भी लगाए हैं। इन दावों पर भी अलग-अलग स्तर पर जांच की मांग की गई है।

पलटवार: आरोपकर्ता की साख पर सवाल
शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद और उनके समर्थकों ने आरोपों को निराधार बताते हुए आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं। उनके अनुसार आशुतोष महाराज उत्तर प्रदेश के शामली (कांधला थाना) में हिस्ट्रीशीटर के रूप में दर्ज बताए जाते हैं। समर्थकों का दावा है कि उन पर करीब 21 आपराधिक मामले दर्ज रहे हैं, जिनमें जबरन उगाही, धोखाधड़ी और गंभीर धाराएं शामिल बताई जाती हैं।
गैंगरेप के पुराने आरोप का उल्लेख भी किया जा रहा है, जिस पर आशुतोष महाराज ने पहले ही सफाई देते हुए इसे राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया था और मेडिकल जांच का हवाला दिया था।
महत्वपूर्ण: ये सभी दावे/आरोप हैं; अंतिम सत्य का निर्धारण केवल अदालतें ही करेंगी।

पहले भी विवादों में रहे हैं आशुतोष महाराज
सतनामी समाज विवाद (नवंबर 2025): बिलासपुर में कथित अपमानजनक टिप्पणी के मामले में उनकी गिरफ्तारी हुई थी, जिसने सामाजिक तनाव को जन्म दिया।
राजनीतिक संबंध: वे श्री कृष्ण जन्मभूमि मुक्ति निर्माण ट्रस्ट के अध्यक्ष हैं। उन पर राम मंदिर विरोधी दलों से नजदीकी जैसे आरोप भी लगते रहे हैं, जिनसे उनका सार्वजनिक प्रोफाइल विवादास्पद बना रहा है।
धार्मिक पृष्ठभूमि: आशुतोष ब्रह्मचारी महाराज, जगद्गुरु रामभद्राचार्य के शिष्य बताए जाते हैं—इस कारण यह विवाद केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि धार्मिक प्रतिष्ठानों की साख से भी जुड़ गया है।

व्यापक असर: आस्था बनाम जवाबदेही
यह प्रकरण भारत में धार्मिक संस्थाओं की पारदर्शिता, नैतिक जवाबदेही और कानून के समान अनुप्रयोग पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। एक ओर नाबालिगों की सुरक्षा सर्वोपरि है, वहीं दूसरी ओर न्यायिक निष्पक्षता और निर्दोषता की धारणा भी उतनी ही आवश्यक है।
अब निगाहें पुलिस जांच, साक्ष्यों की पड़ताल और अदालती सुनवाई पर टिकी हैं। सच चाहे जो हो, यह मामला तय करेगा कि आस्था के बड़े मंचों पर बैठे लोगों के लिए कानून की कसौटी कितनी कठोर और समान रूप से लागू होती है।
यह विवाद आरोपों और प्रत्यारोपों से आगे बढ़कर सत्य की न्यायिक खोज का विषय है। अंतिम फैसला अदालत का होगा—और वही तय करेगा कि यह प्रकरण आस्था पर कलंक है या आरोपों का राजनीतिक-व्यक्तिगत तानाबाना। तब तक, जिम्मेदार पत्रकारिता का धर्म है कि तथ्यों को दावे के रूप में, संतुलन और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत किया जाए।

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