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June 17, 2026
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बस्तर

बस्तर (1131)

कोंडागांव। छत्तीसगढ़ के कोंडागांव जिला मुख्यालय में इन दिनों पेट्रोल और डीजल की अचानक कमी से आम जनता और किसानों को भारी परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। जिले के कई पेट्रोल पंपों पर ईंधन खत्म होने की स्थिति बन गई है, वहीं कुछ पंपों को अस्थायी रूप से बंद भी करना पड़ा है।

स्थानीय लोगों के अनुसार, सुबह से ही कई पेट्रोल पंपों पर लंबी कतारें देखी जा रही हैं। कई उपभोक्ताओं को घंटों इंतजार के बाद भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। इस स्थिति ने परिवहन व्यवस्था के साथ-साथ कृषि कार्यों को भी प्रभावित करना शुरू कर दिया है।

मामले की पड़ताल के लिए आसपास के जिलों—कांकेर, नारायणपुर और जगदलपुर—में संपर्क किया गया, जहां से जानकारी मिली कि वहां पेट्रोल और डीजल की कोई कमी नहीं है और सामान्य रूप से आपूर्ति जारी है। ऐसे में कोंडागांव में ही इस तरह की किल्लत सामने आना कई सवाल खड़े कर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि जब आसपास के जिलों में पर्याप्त मात्रा में ईंधन उपलब्ध है, तो कोंडागांव में कमी क्यों? क्या यह कृत्रिम संकट पैदा कर कीमत बढ़ने की आशंका में ईंधन का भंडारण (डंपिंग) किया जा रहा है? या फिर कालाबाजारी के लिए आपूर्ति को जानबूझकर रोका जा रहा है?

इस मुद्दे पर स्थानीय प्रशासन की भूमिका भी सवालों के घेरे में है। आम नागरिकों और किसानों ने जिला प्रशासन से जल्द हस्तक्षेप कर स्थिति को नियंत्रित करने और ईंधन की सुचारू आपूर्ति सुनिश्चित करने की मांग की है।

अब देखना होगा कि प्रशासन इस गंभीर समस्या का समाधान कितनी जल्दी करता है और जनता को राहत कब तक मिल पाती है।

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना से बदली तस्वीर, ग्रामीणों को मिली आवागमन, शिक्षा और स्वास्थ्य की बेहतर सुविधा

रायपुर, / बीजापुर जिले के भैरमगढ़ विकासखंड के अतिसंवेदनशील और पूर्व नक्सल प्रभावित अबुझमाड़ क्षेत्र में प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत सड़क निर्माण कार्य ग्रामीणों के जीवन में सकारात्मक बदलाव ला रहा है। वर्षों तक विकास से दूर रहे मयूरीपारा तक अब सड़क पहुंचने से लोगों को बेहतर आवागमन, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं का लाभ मिलने लगा है।

16 किलोमीटर सड़क निर्माण से जुड़ रहा दूरस्थ क्षेत्र

प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के अंतर्गत बैल से मयूरीपारा तक 16 किलोमीटर लंबी सड़क का निर्माण किया जा रहा है। इस परियोजना में अब तक 13 किलोमीटर मिट्टीकृत सड़क का निर्माण पूरा हो चुका है। साथ ही मुरूमीकरण और छह पुलियों का निर्माण कार्य अंतिम चरण में है। विभागीय अधिकारियों के अनुसार शेष कार्य जून माह में पूरा कर लिया जाएगा।

दुर्गम रास्तों से मिल रही राहत

ग्राम बैल की सरपंच श्रीमती जुग्गी अठामी ने बताया कि लंबे समय तक सड़क सुविधा नहीं होने के कारण ग्रामीणों को दैनिक जरूरतों, स्वास्थ्य सेवाओं और अन्य कार्यों के लिए घने जंगलों से होकर कई किलोमीटर पैदल चलना पड़ता था। बरसात के मौसम में नदी पार करने के लिए नाव का सहारा लेना पड़ता था, जिससे समय और परेशानी दोनों बढ़ जाते थे। उन्होंने बताया कि आजादी के 78 वर्षों बाद भी यह क्षेत्र नक्सल प्रभाव और कठिन भौगोलिक परिस्थितियों के कारण विकास की मुख्यधारा से दूर था। अब सड़क निर्माण से हालात तेजी से बदल रहे हैं और लोगों को बड़ी राहत मिली है।

शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को मिला नया आधार

सड़क बनने से स्कूली बच्चों का आवागमन आसान हुआ है। वहीं स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच भी बेहतर हुई है। अब जरूरत पड़ने पर मरीजों को समय पर अस्पताल पहुंचाना संभव हो रहा है, जिससे ग्रामीणों को बड़ी सुविधा मिल रही है।

विकास और समृद्धि की नई उम्मीद

ग्रामीणों का कहना है कि यह सड़क केवल एक मार्ग नहीं, बल्कि क्षेत्र के विकास, शिक्षा, स्वास्थ्य और बेहतर भविष्य की नई उम्मीद है। बैल से मयूरीपारा मार्ग के पूर्ण होने के बाद क्षेत्र में सामाजिक और आर्थिक गतिविधियों को भी नई गति मिलेगी। प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के माध्यम से अबुझमाड़ जैसे दूरस्थ क्षेत्रों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का प्रयास ग्रामीणों के जीवन में सकारात्मक परिवर्तन ला रहा है।

  बस्तर / शौर्यपथ / सुकमा के जंगलों के बीच मैदान में युवाओं को क्रिकेट खेलते देख उप मुख्यमंत्री श्री अरुण साव खुद को रोक न सके। उन्होंने गाड़ी रुकवाई, खिलाडिय़ों के बीच मैदान में पहुंचे और क्रीज पर जाकर बैट थाम लिया। टूर्नामेंट खेल रहे कुशल गेंदबाजों की गेंदों पर कुछ करारे शॉट भी लगाए। यह बदलते बस्तर की खुशनुमा तस्वीर है।
किरंदुल से सुकमा के रास्ते का यह मुनगा गांव था जहां श्री साव ने मैदान में बल्ला भांजा। सुकमा जिले के ग्राम पंचायत कोर्रा का आश्रित गांव है यह। मैदान पर खेलने के लिए जुटे युवाओं से पता चला कि यहां 7 जून से क्रिकेट टूर्नामेंट चल रहा है जिसमें आसपास के गांवों की 16 टीमों ने भाग लिया है। मैदान के एक छोर पर खिलाडिय़ों का झुंड तो दूसरे छोर पर दर्शकों का झुंड था।
उप मुख्यमंत्री साव ने कुछ गेंदे खेलने के बाद पिच पर ही खिलाडिय़ों से अपने सहज-सरल अंदाज में बातचीत शुरू की, जिससे इस टूर्नामेंट की जानकारी मिली। उन्होंने खिलाडिय़ों के मांगे बिना ही सभी 16 टीमों को क्रिकेट किट देने का वादा किया, जिससे वे पूरे साजो-सामान के साथ अपने खेल का आनंद ले सकें। श्री साव से चर्चा के बीच खिलाडिय़ों ने खेल मैदान की कमी की बात रखी, जिस पर उन्होंने कलेक्टर को निर्देशित कर समुचित व्यवस्था का आश्वासन दिया।
उप मुख्यमंत्री अरुण साव इन दिनों चार दिनों के बस्तर प्रवास पर हैं। वे रोज दिनभर निर्माण कार्यों और विकास योजनाओं का निरीक्षण कर रहे हैं। साथ ही अधिकारियों की बैठक लेकर इनकी प्रगति की समीक्षा भी कर रहे हैं। बस्तर संभाग के प्रगतिरत काम जल्दी कैसे पूरे हों... अप्रारंभ कार्यों को तत्काल शुरू कर कैसे तेजी से अंजाम तक पहुंचाएं, इन पर बैठकों में मंथन भी कर रहे हैं।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। बस्तर जिले में अवैध खनिज उत्खनन और परिवहन पर लगाम कसने के लिए खनिज विभाग द्वारा लगातार सख्त और प्रभावी कार्रवाई की जा रही है। संचालक खनिज एवं बस्तर कलेक्टर के निर्देश पर चलाए जा रहे विशेष अभियान के तहत जिला खनिज जांच उड़नदस्ता दल ने विभिन्न क्षेत्रों में औचक निरीक्षण कर अवैध कारोबारियों पर बड़ी कार्रवाई करते हुए 36 वाहनों को जब्त किया है।

खनिज विभाग की इस सक्रियता को जिले में प्राकृतिक संसाधनों की सुरक्षा और राजस्व संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। विभागीय टीम ने उपनपाल, देवड़ा, कोडेनार, बड़ेआमाबाल, कोरपाल, बेलगांव, धरमपुरा, जगदलपुर, कुम्हरावंड, पिपलावंड, बजावंड, बडांजी, तारापुर और बनियागांव सहित कई क्षेत्रों में लगातार निरीक्षण किया। जांच के दौरान अवैध रूप से रेत एवं चुना पत्थर का उत्खनन, परिवहन और भंडारण करते पाए जाने पर संबंधित लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की गई।

कार्रवाई के दौरान जब्त किए गए सभी वाहनों को पुलिस अभिरक्षा में सौंप दिया गया है, वहीं चार भंडारणकर्ताओं के खिलाफ भी प्रकरण दर्ज कर आगे की कार्रवाई की जा रही है। खनिज विभाग ने स्पष्ट किया है कि अवैध खनिज गतिविधियों में संलिप्त लोगों के खिलाफ छत्तीसगढ़ गौण खनिज नियमावली 2015 एवं खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम 1967 के तहत कठोर दंडात्मक कार्रवाई जारी रहेगी।

खनिज विभाग की इस मुहिम से अवैध खनिज कारोबारियों में हड़कंप मचा हुआ है, वहीं आम लोगों में प्रशासन की सक्रियता को लेकर सकारात्मक संदेश गया है। विभागीय अधिकारियों की सतर्कता और मैदान स्तर पर लगातार निगरानी से यह साफ संकेत मिला है कि प्राकृतिक संसाधनों की लूट अब बर्दाश्त नहीं की जाएगी।

इस अभियान में खनि अधिकारी शिखर चेरपा, सहायक खनि अधिकारी जागृत गायकवाड, खनि निरीक्षक अंकित पुरी, अनि सिपाही डिकेश्वर खरे, नगर सैनिक विजय कश्यप, कृष्णा बघेल एवं सहदेव बघेल सहित जिला खनिज जांच उड़नदस्ता दल के सदस्यों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

कोंडागांव, शौर्यपथ।  छत्तीसगढ़ राज्य बनने के बाद कोंडागांव जिला 2012 से जिला घोषित हो गया था जिसके बाद से अब तक जिले में सभी जिलेवासियों को शासन की सभी योजनाओं को पूरा किया जा रहा है । मगर एक तरफ ध्यान दिया जाए तो एक बड़ी बात सामने आती है देश एक कठनाई से गुजर रहा है जहाँ पेट्रोल व डीजल की किल्लत देखा जा रहा है।

वही अगर बात करे कोंडागांव की तो  

न्यायालय कैदियों को जगदलपुर या नारायणपुर जेल भेजती है जो कोंडागांव मुख्यालय से 60 से 50 किलोमीटर दूर पड़ता है जहाँ रोजना कैदियों को लाने में मशक्कत की जाती है अगर कोंडागांव जिला मुख्यालय में भी एक जेल या उप जेल बन जाए तो पुलिस को राहत मिलेगी।

समस्या क्या है?

कोंडागांव को 2012 में जिला घोषित किया गया था

इसके बावजूद यहां अभी तक जिला जेल/उप-जेल नहीं है

कोर्ट (न्यायालय) से कैदियों को जगदलपुर या नारायणपुर भेजा जाता है

यह दूरी लगभग 50–60 किलोमीटर है

इससे क्या दिक्कतें हो रही हैं?

पुलिस को रोज कैदियों को ले जाने में अधिक मेहनत और संसाधन खर्च

पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों के बीच आर्थिक बोझ

सुरक्षा जोखिम भी बढ़ता है (लंबी दूरी पर ट्रांजिट)

कैदियों और उनके परिजनों को असुविधा

अब देखने वाली बात होगी कि शौर्यपथ की इस खबर से जिला प्रशासन व शासन क्या कदम उठाएगी।

सुकमा , /सुकमा जिले के कोंटा विकासखंड स्थित ग्राम पंचायत एर्राबोर में आयोजित ‘सुशासन तिहार’ शिविर ग्रामीणों के लिए राहत और खुशियों का केंद्र बन गया। कलेक्टर श्री अमित कुमार के मार्गदर्शन में आयोजित इस शिविर में बड़ी संख्या में ग्रामीण शामिल हुए और विभिन्न शासकीय योजनाओं का लाभ प्राप्त किया।
शिविर का उद्देश्य शासन की योजनाओं और सेवाओं को सीधे ग्रामीणों तक पहुंचाना था। प्रशासनिक अधिकारियों ने मौके पर उपस्थित रहकर लोगों की समस्याएं सुनीं और त्वरित समाधान की प्रक्रिया शुरू की।
शिविर में विद्यार्थियों को जाति प्रमाण पत्र वितरित किए गए। वहीं गर्भवती महिलाओं की गोद भराई और 6 माह के बच्चों का अन्नप्राशन कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। इससे कार्यक्रम में सामाजिक और मानवीय जुड़ाव का वातावरण देखने को मिला।
ग्रामीणों की सुविधा के लिए शिविर में राशन कार्ड ई-केवाईसी, महतारी वंदन योजना ई-केवाईसी, नया आधार कार्ड पंजीयन एवं अपडेट, बी-1 और किसान किताब वितरण तथा एग्री स्टेक पंजीयन जैसी जरूरी सेवाएं भी मौके पर उपलब्ध कराई गईं।
शिविर के दौरान विभिन्न विभागों को कुल 250 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें पंचायत विभाग के 165, कृषि विभाग के 22, विद्युत विभाग के 14 तथा राजस्व और लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी विभाग के 11-11 आवेदन शामिल रहे। सभी आवेदनों पर त्वरित कार्रवाई की जा रही है।
कार्यक्रम में स्थानीय सरपंच श्रीमती लक्ष्मी कट्टम, पूर्व सरपंच, पंचगण, जनप्रतिनिधि, अधिकारी और बड़ी संख्या में ग्रामीण उपस्थित रहे। सुशासन तिहार के माध्यम से प्रशासन और ग्रामीणों के बीच विश्वास और सहभागिता को नई मजबूती मिली है।

कर्तव्यनिष्ठ पुलिस अधिकारी अमित शुक्ला के निधन से शोक की लहर

बस्तर सहित पूरे पुलिस महकमे के लिए अत्यंत दुःखद समाचार सामने आया है।

बस्तर के विभिन्न थानों में अपनी सेवाएं देने वाले पुलिस अधिकारी श्री अमित शुक्ला का असमय निधन हो गया। उनके निधन की खबर से पुलिस विभाग, सहयोगियों और क्षेत्रीय नागरिकों में गहरा शोक व्याप्त है।

श्री अमित शुक्ला अपने शांत स्वभाव, कर्तव्यनिष्ठ कार्यशैली और जनता के प्रति संवेदनशील व्यवहार के लिए जाने जाते थे। बस्तर जैसे संवेदनशील क्षेत्र में उन्होंने कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हुए पुलिस विभाग में अपनी अलग पहचान बनाई थी।

उनकी कार्यशैली में अनुशासन के साथ मानवीय संवेदनाएं भी स्पष्ट दिखाई देती थीं, यही कारण रहा कि वे अपने साथियों और आम नागरिकों के बीच सम्मानित अधिकारी के रूप में पहचाने जाते थे।

उनका असमय निधन केवल एक अधिकारी की विदाई नहीं, बल्कि पुलिस महकमे के लिए ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई लंबे समय तक संभव नहीं होगी।

विभाग के अनेक अधिकारियों और कर्मचारियों ने उनके निधन पर गहरा दुःख व्यक्त करते हुए इसे व्यक्तिगत क्षति बताया है।

शोक संदेशों का सिलसिला लगातार जारी है।

सहकर्मियों का कहना है कि अमित शुक्ला ने अपने सेवा काल में कठिन परिस्थितियों के बीच भी कर्तव्य को सर्वोपरि रखा और सदैव ईमानदारी एवं समर्पण के साथ अपनी जिम्मेदारियां निभाईं।

ईश्वर से प्रार्थना है कि दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें तथा शोकाकुल परिवार को यह असीम दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।

ॐ शांति ?

 

 कोंडागांव / 
मदर्स डे के पावन अवसर पर शांति फाउंडेशन में आयोजित एक भावनात्मक सम्मान समारोह ने मानवता, सेवा और मातृत्व के प्रति सम्मान का अनूठा संदेश दिया। इस विशेष अवसर पर उन माताओं का सम्मान किया गया, जिन्हें कभी सड़क से रेस्क्यू कर शांति फाउंडेशन के पुनर्वास केंद्र में लाया गया था और आज उपचार, देखभाल एवं अपनत्व के सहारे उन्हें नई जिंदगी मिली है।

कार्यक्रम में शांति फाउंडेशन के संचालक यतेंद्र “छोटू” सलाम एवं फाउंडेशन की नींव रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले तुषार जी विशेष रूप से उपस्थित रहे। दोनों ने माताओं के साथ समय बिताया और उन्हें सम्मानित कर मदर्स डे की शुभकामनाएं दीं।


केक कटिंग के साथ गूंजा अपनत्व का संदेश

कार्यक्रम के दौरान सभी माताओं के साथ केक काटा गया। पूरा परिसर खुशी, आत्मीयता और सम्मान के भाव से सराबोर दिखाई दिया। माताओं के चेहरों पर मुस्कान और आंखों में छलकती भावनाएं वहां मौजूद हर व्यक्ति को भावुक कर रही थीं।

इस आयोजन को सफल बनाने में मोनी, मदन कुमारी, आशा खान, फूल कुंवर साहू, बिंद्राबाई, सरला, दशा बाई, कांतम, केशवम सहित शांति फाउंडेशन के समस्त स्टाफ एवं प्रभुजनों ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।


राजस्थान की “मोनी अम्मा” की कहानी ने झकझोरा

कार्यक्रम के दौरान राजस्थान निवासी मदन कुमारी उर्फ मोनी अम्मा जी की कहानी ने सभी को भावुक कर दिया। उन्हें शांति फाउंडेशन द्वारा रेस्क्यू कर पुनर्वास केंद्र लाया गया था, जहां लगातार उनका उपचार कराया गया।

स्वास्थ्य में सुधार होने के बाद काउंसलिंग के दौरान उन्होंने अपना घर राजस्थान में बताया। फाउंडेशन की टीम ने उनके बेटे से संपर्क किया, लेकिन बेटे ने अपनी मां को साथ रखने में असमर्थता जताते हुए कहा कि उसकी जिम्मेदारी अब पत्नी और बेटी हैं।

यह घटना वहां मौजूद लोगों के लिए बेहद मार्मिक पल बन गई और समाज में बढ़ती संवेदनहीनता पर कई सवाल छोड़ गई।


सात वर्षों से अपनों का इंतजार कर रहीं आयशा खान

शांति फाउंडेशन में रह रहीं आयशा खान अम्मा जी की कहानी भी लोगों की आंखें नम कर गई। मानसिक रूप से अस्वस्थ अवस्था में उन्हें रेस्क्यू कर पुनर्वास केंद्र लाया गया था। लगातार इलाज और देखभाल के बाद जब उनकी स्थिति में सुधार हुआ तो उन्होंने अपने गांव का नाम दुर्ग बताया।

इसके बाद से शांति फाउंडेशन की टीम उनके परिवार की तलाश में लगातार जुटी हुई है। आयशा खान अक्सर अपने बच्चों को याद कर भावुक हो जाती हैं। लगभग सात वर्षों से वह शांति फाउंडेशन में रहकर जीवन बिता रही हैं और आज भी अपने परिवार से मिलने की उम्मीद लगाए बैठी हैं।


“मां भगवान का सबसे सुंदर रूप”

कार्यक्रम के दौरान शांति फाउंडेशन परिवार ने कहा—
“मां केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि भगवान का सबसे सुंदर रूप होती है। मां पूरी जिंदगी अपने बच्चों के लिए त्याग करती है, लेकिन वृद्धावस्था में उन्हें सबसे ज्यादा अपनापन और सहारे की जरूरत होती है।”

फाउंडेशन ने समाज से अपील करते हुए कहा कि अपने माता-पिता और परिवारजनों को कभी बेसहारा न छोड़ें।


मानवता और सेवा का जीवंत उदाहरण बना शांति फाउंडेशन

शांति फाउंडेशन लगातार असहाय, बेसहारा और मानसिक रूप से अस्वस्थ लोगों की सेवा एवं पुनर्वास के लिए कार्य कर रहा है। मदर्स डे पर आयोजित यह कार्यक्रम केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि समाज को संवेदनशीलता, सेवा और पारिवारिक मूल्यों का संदेश देने वाला प्रेरणादायी आयोजन बन गया।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। डिमरापाल आयुष औषधालय में नियमित उपस्थिति को लेकर शिकायत के बाद अब मामले में एक नया पहलू सामने आया है। विभागीय सूत्रों एवं संबंधित पक्षों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, शिकायत के बाद जिला आयुष अधिकारी द्वारा संबंधित चिकित्सा अधिकारी से चर्चा की गई, जिसमें कथित रूप से नियमित उपस्थिति प्रभावित होने के पीछे “अत्यधिक गर्मी” एवं व्यक्तिगत कारणों का उल्लेख किया गया।

सूत्रों के अनुसार, संबंधित चिकित्सा अधिकारी ने चर्चा के दौरान कहा कि अत्यधिक तापमान के कारण लंबे समय तक अस्पताल में बैठने में कठिनाई होती है। इस पर जिला आयुष अधिकारी ने कथित तौर पर नाराजगी व्यक्त करते हुए यह कहा कि शासकीय सेवा में निर्धारित समय तक उपस्थित रहकर मरीजों को सेवाएं देना आवश्यक दायित्व है और अन्य अधिकारी-कर्मचारी भी समान परिस्थितियों में कार्य कर रहे हैं।

बताया जा रहा है कि इसके बाद संबंधित चिकित्सा अधिकारी द्वारा पारिवारिक परिस्थितियों, विशेषकर अपनी स्कूली बेटी की देखभाल का उल्लेख करते हुए नियमित उपस्थिति में कठिनाई होने की बात कही गई। साथ ही यह भी चर्चा में आया कि उनकी व्यक्तिगत परिस्थितियों की जानकारी विभागीय स्तर पर होने के कारण उन्हें ऐसे स्थान पर पदस्थ किया गया, जहां आवागमन अपेक्षाकृत सुगम हो। अब सवाल यह उठ रहा है कि क्या सरकारी अस्पताल “व्यक्तिगत सुविधा केंद्र” बनते जा रहे हैं? यदि व्यक्तिगत कारणों और मौसम को आधार बनाकर नियमित ड्यूटी प्रभावित होगी, तो दूरदराज के मरीज आखिर किस भरोसे सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों की ओर देखें?

सबसे हैरान करने वाली बात यह बताई जा रही है कि बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि अनुपस्थित रहने के बावजूद हाजिरी में अनुपस्थिति दर्ज नहीं होती। हालांकि, इन बिंदुओं की आधिकारिक पुष्टि विभागीय जांच के बाद ही संभव होगी।

अब मुख्य प्रश्न यह है कि यदि सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में नियमित सेवाएं प्रभावित होती हैं, तो इसका सीधा असर ग्रामीण मरीजों पर पड़ता है। ऐसे में आमजन की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि विभाग इस मामले में तथ्यात्मक जांच कर क्या निष्कर्ष निकालता है और नियमानुसार क्या कदम उठाए जाते हैं।

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