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April 11, 2026
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शौर्य की बाते ( सम्पादकीय )

शौर्य की बाते ( सम्पादकीय ) (230)

लेख - प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (भारत गणराज्य )

शौर्यपथ लेख / आज 11 अप्रैल हम सभी के लिए बहुत विशेष दिन है। आज भारत के महान समाज सुधारकों में से एक और पीढ़ियों को दिशा दिखाने वाले महात्मा ज्योतिराव फुले की जन्म-जयंती है। इस वर्ष यह अवसर और भी अधिक महत्वपूर्ण है, क्योंकि उनके 200वें जयंती वर्ष का शुभारंभ भी हो रहा है।
महान समाज सुधारक महात्मा फुले का जीवन नैतिक साहस, आत्म चिंतन और समाज के हित के लिए अटूट समर्पण का प्रेरक उदाहरण है। महात्मा फुले को केवल उनकी संस्थाओं या आंदोलनों के लिए ही याद नहीं किया जाता, बल्कि उन्होंने लोगों के मन में जो आशा और आत्मविश्वास जगाया, उसका व्यापक प्रभाव हम आज भी महसूस करते हैं। उनके विचार देशवासियों के लिए प्रेरणापुंज हैं।
महात्मा फुले का जन्म 1827 में महाराष्ट्र में एक बहुत साधारण परिवार में हुआ। लेकिन शुरुआती चुनौतियां कभी उनकी शिक्षा, साहस और समाज के प्रति समर्पण को नहीं रोक पाईं। उन्होंने हमेशा यह माना कि चाहे कितनी भी कठिनाइयां क्यों न आएं, इंसान को मेहनत करनी चाहिए, ज्ञान हासिल करना चाहिए और समस्याओं का समाधान करना चाहिए, न कि उन्हें अनदेखा करना चाहिए। बचपन से ही महात्मा फुले बहुत जिज्ञासु थे और अपनी उम्र के अन्य बच्चों की अपेक्षा कहीं अधिक पुस्तकें पढ़ते थे। वो कहते भी थे, “हम जितना ज्यादा सवाल करते हैं, उनसे उतना ही अधिक ज्ञान निकलता है।” साफ है कि बचपन से मिली जिज्ञासा उनकी पूरी यात्रा में बनी रही।
महात्मा फुले के जीवन में शिक्षा सबसे महत्वपूर्ण मिशन बनी। उनका मानना था कि ज्ञान किसी एक वर्ग की संपत्ति नहीं, बल्कि एक ऐसी शक्ति है, जिसे सभी के साथ साझा किया जाना चाहिए। जब समाज के बड़े हिस्से को शिक्षा से वंचित रखा जाता था, तब उन्होंने लड़कियों और वंचित वर्गों के लिए स्कूल खोले। वे कहते थे, “बच्चों में जो सुधार मां के माध्यम से आता है, वह बहुत महत्वपूर्ण होता है। इसलिए अगर स्कूल खोले जाएं, तो सबसे पहले लड़कियों के लिए खोले जाएं।” उन्होंने शिक्षा को न्याय और समानता का माध्यम बनाया।
शिक्षा के प्रति उनका दृष्टिकोण हमें आज भी बहुत प्रेरित करता है। पिछले एक दशक में भारत ने युवाओं के लिए रिसर्च और इनोवेशन को बहुत प्राथमिकता दी है। एक ऐसा इकोसिस्टम बनाने का प्रयास किया गया है, जिसमें युवा सवाल पूछने, नई चीजें सीखने और इनोवेशन के लिए प्रेरित हों। ज्ञान, कौशल और अवसरों में निवेश करके भारत अपने युवाओं को देश की प्रगति का आधारस्तंभ बना रहा है।
अपने शैक्षिक ज्ञान और बौद्धिकता से महात्मा फुले ने कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे क्षेत्रों की गहरी जानकारी हासिल की। वे कहते थे कि किसानों और मजदूरों के साथ अन्याय समाज को कमजोर करता है। उन्होंने देखा कि सामाजिक असमानताएं खेतों और गांवों में लोगों के जीवन को कैसे प्रभावित करती हैं। इसलिए उन्होंने गरीबों, वंचितों और कमजोर वर्गों को सम्मान दिलाने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया। इसके साथ ही उन्होंने सामाजिक सद्भाव बनाए रखने के लिए भी हरसंभव प्रयास किए।
महात्मा फुले ने कहा था, “"जोपर्यंत समाजातील सर्वांना समान अधिकार मिळत नाहीत, तोपर्यंत खरे स्वातंत्र्य मिळत नाही” यानी जब तक समाज के सभी लोगों को समान अधिकार नहीं मिलते, तब तक सच्ची आजादी नहीं मिल सकती। इसी विचार को जमीन पर उतारने के लिए उन्होंने कई संस्थाओं की स्थापना की। उनका सत्यशोधक समाज, आधुनिक भारत के सबसे महत्वपूर्ण समाज सुधार आंदोलनों में से एक था। यह आंदोलन सामाजिक सुधार, सामुदायिक सेवा और मानवीय गरिमा को बढ़ावा देने में अग्रणी रहा था। यह महिलाओं, युवाओं और गांवों में रहने वाले लोगों की पुरजोर आवाज बना। यह आंदोलन उनके इस विश्वास को दर्शाता है कि समाज की मजबूती के लिए न्याय, हर व्यक्ति के प्रति सम्मान और सामूहिक प्रगति जरूरी है।
उनका व्यक्तिगत जीवन भी साहस की मिसाल रहा। लगातार लोगों के बीच रहकर काम करने का असर उनके स्वास्थ्य पर भी पड़ा। लेकिन गंभीर बीमारी भी उनके संकल्प को कमजोर नहीं कर सकी। एक गंभीर स्ट्रोक के बाद भी उन्होंने अपना काम और समाज के लिए संघर्ष जारी रखा। उनका शरीर कमजोर हुआ, लेकिन समाज के प्रति उनका समर्पण कभी नहीं डगमगाया। आज भी करोड़ों लोग उनके जीवन के इस पहलू से प्रेरणा लेते हैं।
महात्मा फुले का स्मरण, सावित्रीबाई फुले के सम्मानजनक उल्लेख के बिना अधूरा है। वह स्वयं भारत की महान समाज सुधारकों में से एक थीं। भारत की पहली महिला शिक्षिकाओं में शामिल सावित्रीबाई ने लड़कियों की शिक्षा को आगे बढ़ाने में बेहद अहम भूमिका निभाई। महात्मा फुले के निधन के बाद भी उन्होंने इस कार्य को जारी रखा। 1897 में प्लेग महामारी के दौरान उन्होंने मरीजों की इतनी सेवा की कि वह स्वयं भी इस बीमारी की शिकार हो गईं और उनका निधन हो गया।
भारतभूमि बार-बार ऐसी महान विभूतियों से धन्य होती रही है, जिन्होंने अपने विचार, त्याग और कर्म से समाज को मजबूत बनाया है। उन्होंने बदलाव का इंतजार नहीं किया, बल्कि स्वयं बदलाव का माध्यम बने। सदियों से हमारे देश में समाज सुधार की आवाज उन्हीं लोगों से उठी है, जिन्होंने पीड़ा को भाग्य नहीं माना, बल्कि उसे खत्म करने के प्रयासों में जुटे रहे। महात्मा ज्योतिराव फुले भी ऐसे ही महान व्यक्तित्व थे।
मुझे 2022 में पुणे की अपनी यात्रा याद है, जब मैंने शहर में महात्मा फुले की भव्य प्रतिमा पर उन्हें श्रद्धांजलि दी थी। उनके 200वें जयंती वर्ष की शुरुआत पर हम उनके विचारों को अपनाकर ही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि दे सकते हैं। हमें शिक्षा के प्रति अपने संकल्प को मजबूत करना होगा। अन्याय के प्रति संवेदनशील बनना होगा और यह विश्वास रखना होगा कि समाज अपने प्रयासों से ही खुद को बेहतर बना सकता है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि समाज की शक्ति को जनहित और नैतिक मूल्यों से जोड़कर भारत में क्रांतिकारी बदलाव लाए जा सकते हैं। यही कारण है कि आज भी उनके विचार करोड़ों लोगों में नई उम्मीद जगाते हैं। महात्मा ज्योतिराव फुले 200 साल बाद भी केवल इतिहास का नाम नहीं, बल्कि भारत के भविष्य के मार्गदर्शक बने हुए हैं।

छत्तीसगढ़ की राजनीति में “जोगी” नाम केवल एक व्यक्ति या परिवार का प्रतीक नहीं, बल्कि एक पूरे दौर, एक सोच और एक राजनीतिक प्रयोग का प्रतिनिधित्व करता है। अजीत जोगी ने जिस राज्य को जन्म के शुरुआती वर्षों में दिशा दी, उसी राज्य में उनके परिवार की राजनीति आज अस्तित्व के संकट और कानूनी लड़ाइयों के बीच खड़ी है। यह कहानी सिर्फ उत्थान और पतन की नहीं, बल्कि सत्ता, संघर्ष और विवादों के जटिल संगम की है।


नींव के शिल्पकार: अजीत जोगी

जब छत्तीसगढ़ का गठन हुआ, तब प्रशासनिक ढांचा कमजोर था, संसाधन सीमित थे और उम्मीदें आसमान छू रही थीं। ऐसे समय में अजीत जोगी ने एक मजबूत प्रशासक के रूप में राज्य की नींव रखी।

उन्होंने किसानों के लिए समर्थन मूल्य, गरीबों के लिए “काम के बदले चावल”, आदिवासियों के लिए भूमि सुरक्षा और जल प्रबंधन के लिए “जोगी डबरी” जैसी योजनाओं से एक जन-नेता की छवि बनाई। यह वह दौर था जब जोगी को छत्तीसगढ़ का “निर्माता मुख्यमंत्री” कहा जाने लगा।

लेकिन राजनीति में केवल योजनाएं ही पर्याप्त नहीं होतीं—विश्वास और पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी होती है।


सत्ता का केंद्रीकरण और गिरती साख

जोगी सरकार पर सबसे बड़ा आरोप था—सत्ता का केंद्रीकरण
सरकार के फैसले कुछ लोगों और परिवार के इर्द-गिर्द सिमटते नजर आए। इसी दौरान “सुपर सीएम” जैसी उपाधियों ने जन्म लिया, जिसने लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सवाल खड़े किए।

कांग्रेस के भीतर गुटबाजी, वरिष्ठ नेताओं का अलग होना और “जोगी टेप कांड” जैसे विवादों ने जनता के बीच यह संदेश दिया कि सत्ता सेवा से ज्यादा नियंत्रण का माध्यम बनती जा रही है।

परिणाम स्पष्ट था—2003 में सत्ता हाथ से निकल गई, और 15 साल तक वापसी नहीं हो सकी।


अमित जोगी: विवादों की परछाई में राजनीति

जहां अजीत जोगी ने संघर्ष से पहचान बनाई, वहीं अमित जोगी का राजनीतिक सफर शुरुआत से ही आरोपों और विवादों से घिरा रहा।

“केबल वॉर” हो या प्रशासनिक हस्तक्षेप के आरोप—इन सबने उनकी छवि को एक आक्रामक और प्रभावशाली लेकिन विवादित नेता के रूप में स्थापित किया।

सबसे बड़ा झटका तब लगा जब रामावतार जग्गी हत्याकांड में हाई कोर्ट ने 2026 में उन्हें आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
हालांकि अंतिम फैसला अभी न्यायिक प्रक्रिया के अंतिम चरण (सुप्रीम कोर्ट) पर निर्भर करेगा, लेकिन इस निर्णय ने जोगी परिवार की राजनीतिक जमीन को हिला कर रख दिया है।


झीरम घाटी: सवाल जो आज भी जिंदा हैं

2013 का झीरम घाटी कांड छत्तीसगढ़ की राजनीति का सबसे काला अध्याय रहा।
इसमें जोगी परिवार पर सीधे आरोप सिद्ध नहीं हुए, लेकिन राजनीतिक संदेह और आरोपों ने उनकी छवि को प्रभावित जरूर किया।

राजनीति में कभी-कभी सिर्फ दोषी होना जरूरी नहीं होता, संदेह भी काफी होता है।


जनता कांग्रेस (जे): एक प्रयोग, जो सिमट गया

अजीत जोगी ने कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई—जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ (जे)।
2018 में यह पार्टी “किंगमेकर” बनी, लेकिन 2023 तक पूरी तरह हाशिए पर चली गई।

आज स्थिति यह है कि:

  • संगठन कमजोर
  • नेता बिखर चुके
  • और अस्तित्व बचाने के लिए कांग्रेस में विलय की कोशिश

यह दिखाता है कि व्यक्ति आधारित राजनीति, संगठन के बिना लंबे समय तक टिक नहीं पाती।


निष्कर्ष: विरासत बनाम वास्तविकता

जोगी परिवार की कहानी हमें एक बड़ा राजनीतिक सबक देती है—

? विकास की योजनाएं विरासत बनाती हैं, लेकिन विवाद उसे कमजोर कर देते हैं।
? सत्ता का केंद्रीकरण अल्पकालिक लाभ देता है, लेकिन दीर्घकाल में नुकसान करता है।
? और सबसे महत्वपूर्ण—जनता अंततः छवि और विश्वास के आधार पर फैसला करती है।

आज जोगी परिवार एक ऐसे मोड़ पर है जहां:

  • अतीत की उपलब्धियां सम्मान दिलाती हैं
  • लेकिन वर्तमान के विवाद भविष्य तय कर रहे हैं

छत्तीसगढ़ की राजनीति में “जोगी युग” एक अधूरा अध्याय बन चुका है—जिसमें उपलब्धियों की चमक भी है और विवादों की छाया भी।


 

 शौर्यपथ लेख /

कल्पना करें कि राजस्थान के दूरदराज के किसी कोने में जिला कलेक्टर को एक ऐसी महत्वाकांक्षी कल्याण योजना की जिम्मेदारी सौंपी जाती है जिसके बारे में उसकी जानकारी बहुत कम है। एक दशक पहले उसे जानकारी के लिए कहीं धूल खा रही किसी नियमावली का सहारा लेना होता। या फिर वह अपने किसी वरिष्ठ सहयोगी की तीन बैठकों और लंच के बाद खाली होने का इंतजार करता। उसकी उम्मीद उस प्रशिक्षण कार्यक्रम पर भी टिकी हो सकती थी जो शायद एक या दो साल में कभी आता। लेकिन आज वह अपने फोन के जरिए आईगॉट (इंटिग्रेटेड गर्वनमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग प्लेटफॉर्म) पर लॉग ऑन करता है। उसे मिनटों में ही अपनी जरूरत के अनुरूप एक सुव्यवस्थित कार्यकुशलता आधारित पाठ्यक्रम मिल जाता है। वह शाम तक सूचनाओं और आत्मविश्वास से लैस होकर योजना के लाभार्थियों की पहली बैठक की अध्यक्षता कर रहा होता है। यह बदलाव देखने में छोटा लग सकता है मगर हकीकत में किसी क्रांति से कम नहीं है।
चमक-दमक से दूर धैर्य के साथ पांच साल पहले शुरू किया गया मिशन कर्मयोगी एक क्रांति ला रहा है। यह नए भारत के लिए एक नई तरह के प्रशासनिक अधिकारी तैयार करने के उद्देश्य से चुपचाप काम कर रहा है।
इसके महत्व को समझने के लिए हमें पहले संदर्भ को जानना होगा। 2047 तक विकसित भारत के प्रधानमंत्री के निर्धारित लक्ष्य तक यूं ही नहीं पहुंचा जा सकता। इस मंजिल तक पहुंचने के लिए हमें भारत गणतंत्र को चलाने वाली संस्थाओं और व्यक्तियों के जरिए सावधानी से एक-एक कदम आगे बढ़ना होगा। इस यात्रा में सबसे महत्वपूर्ण पूंजी, प्रौद्योगिकी या नीति नहीं है। सबसे ज्यादा अहमियत उन लगभग 3.5 करोड़ प्रशिक्षित, उत्साही और नागरिक केंद्रित सरकारी कर्मियों की क्षमता की है जो हर सुबह उठ कर भारतीय शासन को संचालित करते हैं।
स्वतंत्र भारत के इतिहास में ज्यादातर समय क्षमता निर्माण का मॉडल सांयोगिक रहा है। किसी नौजवान अधिकारी को सेवा की शुरुआत के समय औपचारिक प्रशिक्षण दिया जाता था। फिर करियर के बीच में यदा-कदा उसे कुछ पाठ्यक्रमों में हिस्सा लेने का अवसर मिल सकता था। बाकी, उसे काम करते हुए और दूसरों को देख कर ही सीखना होता था। एक स्थिर और धीमी गति से आगे बढ़ते विश्व में यह काफी था। लेकिन कृत्रिम मेधा, जलवायु अवरोध, जनसांख्यिकीय दबाव और जबर्दस्त प्रौद्योगिकीय परिवर्तन के युग में यह सरासर नाकाफी है। प्रशासन के सामने चुनौतियां जिस रफ्तार से आती हैं उसके सामने प्रशिक्षण की पुरानी प्रणालियों की गति कहीं नहीं टिकती।
'मिशन कर्मयोगी' को इसी बेमेल स्थिति के समाधान के रूप में की गई थी। 2021 में शुरू किया गया यह मिशन—जिसे उसी वर्ष अप्रैल में स्थापित 'क्षमता निर्माण आयोग' द्वारा संस्थागत रूप से संचालित किया गया, एक सचमुच महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने के लिए आगे बढ़ा। भारतीय सिविल सेवाओं की सीखने की संस्कृति को, समय-समय पर होने वाली और केवल नियमों के पालन तक सीमित प्रक्रिया से बदलकर, एक निरंतर चलने वाली, भूमिका-आधारित और स्वयं-निर्देशित विकास यात्रा में रूपांतरित करना इसका मकसद है। जैसा कि आयोग इसका वर्णन करता है, यह बदलाव 'कर्मचारी'—यानी नियमों का पालन करने वाले एक पदाधिकारी से 'कर्मयोगी' बनने की ओर है: एक ऐसा लोक सेवक जो किसी उद्देश्य, सेवा-भाव और उत्कृष्टता से प्रेरित हो।
पाँच वर्षों के बाद, ये आंकड़े अत्यंत शिक्षाप्रद हैं। ‘आईगॉट’ (इंटीग्रेटेड गवर्नमेंट ऑनलाइन ट्रेनिंग) प्लेटफॉर्म पर अब 1.5 करोड़ से अधिक सरकारी अधिकारी सक्रिय शिक्षार्थी के रूप में जुड़े हैं — यह एक ऐसी संख्या है जो शुरुआत के समय काल्पनिक लगती थी। 4,600 से अधिक योग्यता-आधारित पाठ्यक्रमों के माध्यम से, इन अधिकारियों ने 8.3 करोड़ से अधिक पाठ्यक्रम पूरे किए हैं। अकेले पिछले 'राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह' के दौरान, भागीदारी के परिणामस्वरूप 4.5 मिलियन घंटे के पाठ्यक्रम नामांकन और 3.8 मिलियन घंटे की वास्तविक शिक्षा दर्ज की गई। ये केवल अमूर्त आंकड़े नहीं हैं। दर्ज किया गया प्रत्येक घंटा भारत में कहीं न कहीं एक लोक सेवक का प्रतिनिधित्व करता है — छत्तीसगढ़ में एक राजस्व निरीक्षक, पुणे में एक शहरी स्थानीय निकाय अधिकारी, मणिपुर में एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, ये सब अपने साथी नागरिकों की बेहतर सेवा करने के लिए अपनी क्षमता बढ़ा रहें हैं।
जो बात आईगॉट प्लेटफॉर्म को वास्तव में परिवर्तनकारी बनाती है, वह केवल इसका पैमाना नहीं है, बल्कि इसकी 'पहुँच की संरचना' है। यह किसी भी समय और कहीं भी, स्मार्टफोन या डेस्कटॉप पर, कई भाषाओं में उपलब्ध है, और इसे शिक्षार्थी के पेशेवर प्रोफाइल के अनुसार बनाया गया है। पाठ्यक्रमों को हर तीन से छह महीने में अपडेट किया जाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि शासन में एआई टूल का उपयोग कैसे करें या नए वित्तीय नियमों को कैसे समझें, इससे संबंधित सामग्री वर्तमान और प्रासंगिक बनी रहे। दूसरे शब्दों में, यह प्लेटफॉर्म धूल फांकने वाली कोई डिजिटल लाइब्रेरी नहीं है — बल्कि यह सीखने का एक जीवंत और अनुकूलन योग्य तंत्र है। इस पर विचार कीजिए कि एक आदिवासी जिले की जूनियर आंगनवाड़ी कार्यकर्ता के लिए इसका क्या अर्थ है, जिसे उसकी अपनी भाषा में बाल पोषण मूल्यांकन के नवीनतम प्रोटोकॉल समझाने वाला एक मॉड्यूल प्राप्त होता है। उसे अपने ब्लॉक में किसी प्रशिक्षक के आने का इंतज़ार करने की ज़रूरत नहीं है। वह सीखती है, और कार्य करती है। यही इस मिशन का 'लोकतांत्रिक लाभांश' है।
क्षमता निर्माण आयोग, इस तंत्र के रणनीतिक संरक्षक के रूप में, एक साथ 'वास्तुकार' और 'संचालक' दोनों की भूमिका निभाता है। राष्ट्रीय नीति बनाने वाले एक सचिव से लेकर ग्राम स्तर पर इसे लागू करने वाले एक पंचायत पदाधिकारी तक, यह पहचान करता है कि सार्वजनिक भूमिकाओं के विशाल स्पेक्ट्रम में किन योग्यताओं की आवश्यकता है। यह सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के लिए राष्ट्रीय मानक 2.0 ढांचे के माध्यम से देश के प्रशिक्षण संस्थानों के लिए गुणवत्ता मानक निर्धारित करता है, जिसके तहत देश भर के 200 से अधिक प्रशिक्षण संस्थान पहले ही मान्यता प्राप्त कर चुके हैं। यह राज्यों के साथ मिलकर काम करता है। सभी 30 राज्य और केंद्र शासित प्रदेश अब औपचारिक समझौता ज्ञापनों के माध्यम से जुड़ चुके हैं ताकि ऐसी विशिष्ट 'क्षमता निर्माण योजनाएं' तैयार की जा सकें जो कार्यबल की दक्षताओं को संगठनात्मक लक्ष्यों के साथ जोड़ती हैं। 'राष्ट्रीय कर्मयोगी जन सेवा कार्यक्रम' जैसी ऐतिहासिक पहलों के माध्यम से, इसने एक मिलियन से अधिक प्रमाणित अधिकारियों को बड़े पैमाने पर व्यवहार प्रशिक्षण दिया है, जो प्रत्येक नागरिक को अंतिम हितधारक के रूप में मानने की सूक्ष्म लेकिन महत्वपूर्ण कला है।
मिशन के इस अंतिम आयाम पर विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है, क्योंकि यह एक ऐसी चीज़ के बारे में है जिसे 'पूर्णता प्रमाण पत्र' या 'लॉग किए गए घंटों' में आसानी से नहीं मापा जा सकता। मिशन कर्मयोगी की सबसे गहरी आकांक्षाओं में से एक है—दृष्टिकोण में बदलाव। यह राज्य और नागरिक के बीच एक 'लेन-देन' वाले संबंध से हटकर 'नागरिक देवो भव' की भावना से परिभाषित संबंध की ओर एक आंदोलन है: नागरिक ईश्वर के समान है, वह सर्वोच्च अधिकारी है जिसके प्रति राज्य का सेवक जवाबदेह है। जब रेलवे काउंटरों, राजस्व कार्यालयों और स्वास्थ्य केंद्रों पर नागरिक-केंद्रित अधिकारियों को इसके तहत प्रशिक्षित किया गया और बाद में नागरिकों का सर्वेक्षण किया गया तो प्रतिक्रिया आश्चर्यजनक थी। उन्होंने बदलाव को महसूस किया। न केवल दक्षता में, बल्कि व्यवहार की आत्मीयता, तत्परता और बातचीत की मानवीय गुणवत्ता में भी। एक ऐसे युग में जब एआई प्रशासनिक कार्यों के विशाल हिस्सों को स्वचालित करने की चुनौती दे रहा है, यह मानवीय परत, जो सहानुभूतिपूर्ण, सांस्कृतिक रूप से जागरूक और स्थानीय जड़ों से जुड़ी है कोई फालतू चीज़ नहीं, बल्कि भारत के शासन की सर्वोच्च शक्ति है।
इस मिशन ने अपनी तकनीकी महत्वाकांक्षाओं के साथ-साथ भारत की बौद्धिक विरासत का सम्मान करने का भी एक सचेत प्रयास किया है। 'भारतीय ज्ञान प्रणाली प्रकोष्ठ' के माध्यम से, पारंपरिक ज्ञान जिसमें सामुदायिक शासन और कृषि से लेकर वित्त और स्वास्थ्य सेवा तक के क्षेत्र शामिल हैं — को प्रशिक्षण सामग्री के ताने-बाने में बुना जा रहा है; इसे केवल अतीत की यादों के रूप में नहीं, बल्कि एक जीवंत ज्ञान के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। 'अमृत ज्ञान कोष' भंडार, जिसमें 70 से अधिक पूर्ण केस स्टडीज़ शामिल हैं, शासन-प्रशासन से जुड़े ऐसे ज्ञान का एक संग्रह तैयार कर रहा है जिसकी जड़ें भारतीय संदर्भों और भारतीय समाधानों में निहित हैं। प्रशासनिक मानसिकता का यह 'वि-औपनिवेशीकरण', जिसके तहत भारतीय लोक सेवकों को आधुनिक चुनौतियों का सामना करते हुए अपनी ही सभ्यतागत विरासत के साथ आत्मविश्वासपूर्ण जुड़ाव स्थापित करने की ओर लौटाया जाता है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रमुख आकांक्षाओं में से एक है और 'मिशन कर्मयोगी' इसी आकांक्षा को साकार रूप दे रहा है।
'साधना' सप्ताह 2 से 8 अप्रैल तक मनाया जाने वाला राष्ट्रीय शिक्षण सप्ताह — इस पांच वर्षीय यात्रा का उत्सव और इसके अधूरे कार्यों के प्रति पुनर्संकल्प, दोनों है। 'साधना' शब्द यहाँ अत्यंत उपयुक्त है। इसका अर्थ है समर्पित अभ्यास; एक ऐसे व्यक्ति का अनुशासित दैनिक प्रयास जो किसी एक असाधारण कार्य के माध्यम से नहीं, बल्कि अपने कौशल के प्रति निरंतर समर्पण के माध्यम से निपुणता प्राप्त करना चाहता है। जैसे ही हम सिविल सेवा प्रशिक्षण संस्थानों के एक 'राष्ट्रीय सम्मेलन' के साथ इस सप्ताह का उद्घाटन कर रहे हैं, जिसमें लगभग 700 वरिष्ठ अधिकारी व्यक्तिगत रूप से और 3,000 से अधिक वर्चुअल माध्यम से शामिल हो रहे हैं, हम केवल एक वर्षगाँठ नहीं मना रहे हैं। हम अगले पांच वर्षों के लिए अपना लक्ष्य निर्धारित कर रहे हैं — एक ऐसे भविष्य की ओर जिसमें हर स्तर पर प्रत्येक सिविल सेवक निरंतर सीखने वाला, एक 'नागरिक-चैंपियन' और भारत की आकांक्षाओं का एक आत्मविश्वासी संरक्षक होगा।
विकसित भारत 2047 के लक्ष्य — सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज से लेकर शून्य शुद्ध उत्सर्जन के संकल्प तक, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना से लेकर वैश्विक विनिर्माण नेतृत्व तक, केवल नीतिगत माध्यम से पूरे नहीं होंगे। वे लोगों के माध्यम से पूरे होंगे: उस जिला अधिकारी द्वारा जो योजना को सही ढंग से समझ कर उसे पूरी शुद्धता के साथ लागू कर सके; उस शहरी योजनाकार द्वारा जो स्थानिक डेटा टूल का उपयोग कर सके; उस अग्रिम पंक्ति के स्वास्थ्य कार्यकर्ता द्वारा जो सार्वजनिक स्वास्थ्य अलर्ट को इस तरह संप्रेषित करे कि उसका समुदाय उस पर भरोसा करे। मिशन कर्मयोगी न केवल कल के लिए, बल्कि आने वाले दशकों के लिए उसी दल का निर्माण कर रहा है।
भारत की शासन-व्यवस्था की कहानी के लंबे और प्रकाशमान सफर में, यह शायद वह अध्याय है जिसमें शासन ने आखिरकार 'सीखना' सीख लिया।

(लेखक केंद्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी और पृथ्वी विज्ञान राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) तथा प्रधानमंत्री कार्यालय, परमाणु ऊर्जा विभाग, अंतरिक्ष विभाग और कार्मिक, लोक शिकायत एवं पेंशन राज्यमंत्री हैं)

दुर्ग / शौर्यपथ

दुर्ग शहर, जो कभी निष्पक्ष पत्रकारिता और मजबूत संवाद परंपरा के लिए जाना जाता था, इन दिनों एक अजीब विडंबना का गवाह बन रहा है। यहां अब सिर्फ राजनेता ही राजनीति नहीं कर रहे—बल्कि पत्रकारों के बीच भी सियासत अपने चरम पर है। और इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि इस ‘कलम की लड़ाई’ में अब राजनीतिक दलों के मीडिया प्रभारी भी खुलकर भूमिका निभाते नजर आ रहे हैं।

? प्रेस क्लब की दीवारों के भीतर ‘दो खेमों’ की कहानी

वरिष्ठ पत्रकारों के पुराने प्रेस क्लब में लंबे समय से चल रहे आंतरिक मतभेद ने आखिरकार एक नए प्रेस क्लब के जन्म को जन्म दिया। सामान्यतः इसे लोकतांत्रिक विकल्प के रूप में देखा जा सकता था, लेकिन यहां कहानी कुछ और ही है।

नए प्रेस क्लब के अस्तित्व में आते ही पुराने क्लब के कुछ सदस्यों की सक्रियता संगठन मजबूती की दिशा में नहीं, बल्कि नए मंच को नीचा दिखाने की प्रवृत्ति में बदलती दिखी।

परिणाम—पत्रकारों के बीच संवाद की जगह अब अविश्वास और आरोपों की दीवार खड़ी हो गई है।

? भाजपा कार्यालय की प्रेस कॉन्फ्रेंस: ‘मीडिया मैनेजमेंट’ या ‘मीडिया विभाजन’?

हाल ही में भाजपा कार्यालय में मंत्री गजेंद्र यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस ने इस अंदरूनी खींचतान को सार्वजनिक कर दिया।

बताया जाता है कि भाजपा की मीडिया टीम ने बिना स्पष्ट सूचना के पत्रकारों को दो हिस्सों में बांटकर अलग-अलग प्रेस कॉन्फ्रेंस आयोजित कर दी।

यह कोई तकनीकी चूक नहीं लगती—क्योंकि प्रेस विज्ञप्तियां तो सभी पत्रकारों तक नियमित रूप से पहुंचती हैं।

सवाल यह है कि जब सूचना भेजी जा सकती है, तो समान मंच क्यों नहीं दिया गया?

इस घटना के बाद जो बहस और विवाद सामने आए, उसने यह स्पष्ट कर दिया कि यह सिर्फ ‘समन्वय की कमी’ नहीं, बल्कि सुनियोजित विभाजन भी हो सकता है।

? कांग्रेस भी पीछे नहीं: ‘भेदभाव की नीति’ सर्वदलीय?

यदि यह माना जाए कि यह समस्या केवल भाजपा तक सीमित है, तो यह अधूरी सच्चाई होगी।

कांग्रेस के मीडिया प्रबंधन पर भी ऐसे ही आरोप लगते रहे हैं—जहां प्रेस कॉन्फ्रेंस में चयनात्मक आमंत्रण और ‘पसंदीदा पत्रकारों’ को प्राथमिकता देने की प्रवृत्ति खुलकर सामने आती है।

इससे यह संकेत मिलता है कि पत्रकारों के बीच की दरार को राजनीतिक दल अपने-अपने तरीके से साधने में लगे हैं।

? ‘पत्रकार’ की परिभाषा भी विवाद में

स्थिति का एक और चिंताजनक पहलू यह है कि प्रेस क्लब की सदस्यता और ‘पत्रकार’ की पहचान भी सवालों के घेरे में है।

ऐसे कई नाम सामने आते हैं जो नियमित प्रकाशन भी नहीं कर पाते, लेकिन किसी अन्य पत्र की एजेंसी लेकर ‘पत्रकार’ कहलाने की होड़ में शामिल हैं।

इस प्रवृत्ति का असर सिर्फ संगठन तक सीमित नहीं—यह वरिष्ठ और गंभीर पत्रकारों की साख पर भी प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

? ‘3-4 एकड़ जमीन’ का शिगूफा: हकीकत या हास्य?

इसी बीच एक कथित दावे ने पूरे शहर में चर्चा का विषय बना दिया—कि शासन द्वारा प्रेस क्लब के लिए 3-4 एकड़ जमीन मुफ्त में दी गई है, जहां पत्रकारों की कॉलोनी बनाई जाएगी।

हालांकि, यह दावा अब तक किसी ठोस आधार पर खरा नहीं उतरा और शहर में इसे अधिकतर लोग मजाक या ‘राजनीतिक गुब्बारा’ ही मान रहे हैं।

ऐसे बयानों ने गंभीर मुद्दों को भी हल्का बना दिया है।

? बड़े आयोजन, छोटी सोच: सरोज पांडे कार्यक्रम भी विवादों में

देश-प्रदेश की वरिष्ठ नेता सरोज पांडे के हालिया कार्यक्रम में भी यही तस्वीर दोहराई गई।

इतने बड़े आयोजन में प्रेस कॉन्फ्रेंस का दो हिस्सों में बंट जाना न केवल मीडिया प्रबंधन की विफलता को दर्शाता है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि क्या जानबूझकर ऐसा किया गया?

परिणाम—कार्यक्रम को वह व्यापक प्रचार नहीं मिल सका, जिसका वह हकदार था।

?  ‘कलम’ अगर बंट गई, तो सवाल कौन पूछेगा?

दुर्ग में पत्रकारों के बीच बढ़ती यह खाई केवल व्यक्तिगत या संगठनात्मक विवाद नहीं है—यह लोकतांत्रिक संवाद के लिए खतरे की घंटी है।

जब पत्रकार ही आपसी खेमेबाजी में उलझ जाएंगे,

जब राजनीतिक दल उन्हें अपने हिसाब से ‘मैनेज’ करने लगेंगे,

और जब मंच संवाद का नहीं, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का बन जाएगा—

तब सबसे बड़ा नुकसान होगा सच्चाई और जनता के अधिकार का।

दुर्ग को यह तय करना होगा—

पत्रकारिता ‘प्रतिस्पर्धा’ रहेगी या ‘प्रतिशोध’?

विशेष लेख

छत्तीसगढ़ की पावन धरती ने समय-समय पर ऐसे महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने कर्म, सेवा और त्याग से समाज को नई दिशा दी। इन्हीं महान विभूतियों में एक नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान से लिया जाना चाहिए—महादानी दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल का।

4 अप्रैल 1876 को जन्मे दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल न केवल अपने समय के अत्यंत समृद्ध उद्यमी थे, बल्कि उससे कहीं बढ़कर वे समाज सेवा, परोपकार और मानव कल्याण के प्रतीक थे। आज भी रायपुर और आसपास के अनेक महत्वपूर्ण संस्थान उनकी दानशीलता के प्रमाण हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ उनका नाम धीरे-धीरे जनस्मृति से ओझल होता चला गया।

डी.के. अस्पताल से जुड़ा नाम, लेकिन योगदान उससे कहीं बड़ा

रायपुर का प्रतिष्ठित डी.के. (दाऊ कल्याण) अस्पताल आज भी उनके नाम से जाना जाता है। बहुत से लोग उन्हें केवल इसी अस्पताल की जमीन के दानदाता के रूप में जानते हैं, जबकि उनकी दानशीलता का दायरा इससे कहीं अधिक विशाल था।

1944 में दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने डी.के. अस्पताल के लिए जमीन के साथ भवन निर्माण हेतु 1,25,000 रुपये नकद दान किए, जो आज के मूल्यांकन में लगभग 70 करोड़ रुपये के बराबर माने जाते हैं।

एम्स सहित कई संस्थानों की नींव में उनका योगदान

रायपुर में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भी उसी भूमि पर बना है, जिसे दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने समाज के हित में दान किया था। यह तथ्य उनकी दूरदर्शिता और समाज के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

शिक्षा और कृषि के क्षेत्र में भी उदार योगदान

दाऊ जी ने केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक ही अपने दान को सीमित नहीं रखा।

उन्होंने लभांडी क्षेत्र की जमीन के साथ कृषि महाविद्यालय और गरीब छात्रों के लिए छात्रावास निर्माण हेतु 1,12,000 रुपये दान किए, जो आज के मूल्य में लगभग 62 करोड़ रुपये के बराबर माने जाते हैं।

इसके अतिरिक्त उन्होंने—

टीबी अस्पताल के लिए 323 एकड़ भूमि दान की

बरोंडा ग्राम में कृषि अनुसंधान के लिए भूमि प्रदान की

भाटापारा में कृषि विज्ञान के लिए विशाल भूमि दान दी

धार्मिक और सामाजिक सेवा में भी अग्रणी

दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल की आस्था और सेवा भाव धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में भी दिखाई देता है।

उन्होंने रायपुर के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के संचालन हेतु पूरा खैरा गांव दान कर दिया।

भाटापारा में अकाल के समय लोगों की पीड़ा को देखते हुए उन्होंने “कल्याण सागर” जलाशय का निर्माण कराया, जिससे हजारों लोगों और पशुओं को पानी की सुविधा मिली।

पशु सेवा और ज्ञान के प्रसार में योगदान

भाटापारा में विशाल पशु चिकित्सालय का निर्माण

गरीबों और विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय की स्थापना

ये सभी कार्य इस बात का प्रमाण हैं कि दाऊ जी का दृष्टिकोण केवल तत्कालीन समाज तक सीमित नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के कल्याण की सोच से जुड़ा था।

छत्तीसगढ़ से बाहर भी उदार दान

उनकी परोपकारिता केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रही। देश के विभिन्न हिस्सों में भी उन्होंने जरूरत के समय उदारतापूर्वक सहयोग किया।

प्रमुख योगदानों में शामिल हैं—

नागपुर के लेडी इरविन अस्पताल के निर्माण में सहयोग

सेंट्रल महिला कॉलेज के निर्माण में प्रमुख दान

बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए सहायता

वर्धा की भीषण बाढ़ में उदार दान

अपने समय के अत्यंत समृद्ध उद्यमी

दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल अपने समय के अत्यंत संपन्न उद्यमियों में गिने जाते थे।

1937 में उन्होंने लगभग 70,000 रुपये का राजस्व भुगतान किया, जो आज की गणना में लगभग 39 करोड़ रुपये से अधिक के बराबर माना जा सकता है।

आज क्यों धुंधला पड़ गया यह नाम?

इतने विशाल और ऐतिहासिक योगदान के बावजूद आज यह विडंबना है कि छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी तो दूर, बहुत से लोग इस महान माटीपुत्र के नाम और कार्यों से परिचित भी नहीं हैं।

यह केवल इतिहास की भूल नहीं, बल्कि उस विरासत के प्रति हमारी उपेक्षा भी है जिसने इस प्रदेश की सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूत नींव रखी।

स्मरण और सम्मान की आवश्यकता

आज आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ की जनता, सामाजिक संस्थाएं और सरकार मिलकर दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल जैसे महादानी व्यक्तित्वों को पुनः जनस्मृति में स्थापित करें।

क्योंकि किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी वर्तमान उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन महान व्यक्तियों से होती है जिन्होंने अपना सर्वस्व समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।

दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल न केवल छत्तीसगढ़ के गौरव हैं, बल्कि वे भारतीय परोपकार की परंपरा के एक उज्ज्वल अध्याय भी हैं।

   रायुपर / शौर्यपथ / श्रीमती सगो तेता स्व-सहायता समूह और बिहान से जुड़कर न केवल आर्थिक आत्मनिर्भरता हासिल की है, बल्कि अपने स्वाभिमान और आत्मविश्वास को भी नई पहचान दी है। आज कांकेर जिला के गांव ग्राम गढ़पिछवाड़ी की अन्य महिलाएं भी उनसे प्रेरणा लेकर आजीविका गतिविधियों से जुड़ रही हैं। श्रीमती तेता ने अपनी इस सफलता का श्रेय भारत सरकार की राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन योजना और छत्तीसगढ़ शासन की पहल बिहान को देते हुए प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय के प्रति आभार व्यक्त करते हुए कहा कि इन योजनाओं ने ग्रामीण महिलाओं को आत्मनिर्भर बनने और ‘लखपति दीदी’ बनने का अवसर प्रदान किया है। बिहान योजना ने श्रीमती सगो तेता के जीवन में नवा बिहान ला दिया।

श्रीमती सगो तेता ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी पृथक् पहचान बना चुकी
कुछ कर गुजरने का जुनून और उस इच्छाशक्ति को शासन की छोटी सी मदद मिल जाए, तो कामयाबी की बुलंदी को फर्श से अर्श तक पहुंचने में देर नहीं लगती। कांकेर जिले की महिलाएं शासन के सहयोग से प्रशिक्षण तथा सहायता प्राप्त कर अपने हुनर को अंजाम दे रही हैं। ऐसी ही एक मिसाल जिला मुख्यालय से लगभग 7 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम गढ़पिछवाड़ी की आदिवासी महिला श्रीमती सगो तेता आज ‘लखपति दीदी’ के रूप में अपनी पृथक् पहचान स्थापित कर चुकी हैं। उनकी कामयाबी यह साबित करती है कि मेहनत, लगन, आत्मविश्वास और उचित अवसर मिलने पर ग्रामीण महिलाएं भी खुद के दम पर अपने समूह, परिवार और समाज के लिए मिसाल कायम कर सकती हैं।

समूह ने बढाया आगे श्रीमती सगो को
एक समय था जब आर्थिक तंगी के कारण श्रीमती सगो को छोटी-छोटी जरूरतों को पूरी करने के लिए भी दूसरों का मुंह ताकना पड़ता था। आजीविका के एकमात्र साधन के रूप में खेती-बाड़ी तो थी, लेकिन सीमित संसाधनों और पारंपरिक तरीकों के कारण आय बहुत कम होती थी। वहीं बच्चों की पढ़ाई और घर के खर्चों की चिंता उन्हें अक्सर परेशान करती थी। इसी दौरान उन्हें राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन ‘बिहान’ की जानकारी मिली। इससे प्रेरित होकर सगो बाई ने गांव की अन्य महिलाओं के साथ मिलकर गायत्री स्व-सहायता समूह बनाया, जिसमें 10 महिलाएं शामिल हैं।

खेतों में द्विफसली सिंचाई की मिली सुविधा
समूह से जुड़ने के बाद उन्हें बिहान के अंतर्गत 60 हजार रुपये की सामुदायिक निवेश राशि प्राप्त हुई, जिसने उनके जीवन को नई दिशा दे दी। श्रीमती सगो तेता बताती हैं कि पहले उनके खेत में मोटरपंप (बोरवेल) नहीं था, जिसके कारण खेती पूरी तरह बारिश पर निर्भर थी और साल में धान की केवल एक ही फसल ले पाती थीं। फिर उन्होंने स्व-सहायता समूह से ऋण लेकर अपने खेत में बोर करवाया, जिससे अब उन्हें सिंचाई की सुविधा मिल गई है। इसका सकारात्मक परिणाम यह रहा कि अब वे अपने खेतों में साल में दोनों फसलें (खरीफ और रबी) ले रही हैं, जिससे उनकी आय में काफी वृद्धि हुई है।

आजीविकामूलक गतिविधियों ने बनाई लखपति दीदी
इसके साथ ही सगो बाई ने कई आजीविकामूलक गतिविधियां भी शुरू कीं। उन्होंने मशरूम पालन, छेना (कंडा) निर्माण, गोबर से जैविक खाद तैयार करना, रुई से तकिये बनाना, सब्जी उत्पादन, ईंट निर्माण और कपड़ों के विक्रय जैसे कार्य प्रारंभ किए। उनकी सतत् मेहनत रंग लाई और आज वे इन अलग-अलग गतिविधियों से प्रतिमाह लगभग 18 से 20 हजार रुपये की आय अर्जित कर रही हैं। इसी निरंतर आय और बचत के कारण पूरे क्षेत्र में वह आज ‘लखपति दीदी’ के रूप में पहचानी जा रही हैं।

जीवन में आया बड़ा बदलाव, महतारी वंदन योजना का भी मिल रहा लाभ
लखपति दीदी श्रीमती सगो तेता बताती हैं कि स्व-सहायता समूह से जुड़ने के बाद उनके जीवन में बड़ा बदलाव आया है। इसी आय के सहारे उन्होंने अपने तीनों बच्चों की पढ़ाई करवाई, साथ ही अपने दो बच्चों की शादी भी करवा ली है। इसके बाद अब वे अपनी आजीविका से होने वाली आय से अपनी छोटी बेटी की शादी करने की तैयारी कर रही हैं। उन्होंने यह भी बताया कि वह महतारी वंदन योजना का भी लाभ ले रही हैं, जिससे मिली रकम को वह बेटी के विवाह में किसी बड़े खर्च के लिए बचत कर रही हैं।

  
साभार - धनंजय राठौर, सयुक्त संचालक,
ताराशंकर सिन्हा, सहायक संचालक जनसंपर्क

 

नक्सलवाद की छाया से बाहर निकलता छत्तीसगढ़, विकास की राह पर बस्तर

(मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के जन्मदिवस विशेष)

लेखक : शरद पंसारी
संपादक – शौर्यपथ दैनिक समाचार


21 फरवरी—छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री माननीय विष्णु देव साय का जन्मदिन—सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्तित्व का जन्मदिवस नहीं, बल्कि उस नेतृत्व का उत्सव है जिसने बीते ढाई वर्षों में छत्तीसगढ़ की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नए सिरे से परिभाषित किया है।

आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व जब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश की कमान संभाली, तब उनके सामने अनेक चुनौतियाँ थीं—किसानों की उम्मीदें, महिलाओं का सशक्तिकरण, आवासहीन गरीबों की पीड़ा और सबसे बड़ी चुनौती, वर्षों से नक्सलवाद की छाया में जी रहा बस्तर।

चुनावी वादों से आगे, भरोसे की सरकार

मुख्यमंत्री साय की सरकार ने सत्ता संभालते ही यह स्पष्ट कर दिया कि यह सरकार केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि कार्यान्वयन की सरकार होगी।

  • किसानों से ₹3100 प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी कर अन्नदाता के सम्मान को पुनर्स्थापित किया गया।

  • महतारी वंदन योजना के तहत महिलाओं को प्रतिमाह ₹1000 की आर्थिक सहायता देकर महिला सशक्तिकरण को जमीनी मजबूती दी गई।

  • प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से हजारों परिवारों को पक्की छत का सपना साकार हुआ।

ये सभी वादे केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि धरातल पर उतरते हुए सरकार की नीयत और नेतृत्व की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।

नक्सलवाद के विरुद्ध निर्णायक नेतृत्व

परंतु इन उपलब्धियों के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक कार्य है, जो मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व को अमर पहचान दिलाता है—
? छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त करने की दिशा में ठोस और निर्णायक पहल।

वर्षों तक छत्तीसगढ़ के नागरिकों को अन्य राज्यों में एक ही सवाल का सामना करना पड़ता था—
“आप छत्तीसगढ़ में कैसे रह लेते हैं? वह तो नक्सली क्षेत्र है।”

मुख्यमंत्री साय के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार ने इस मानसिकता को जड़ से बदलने का काम किया। सुरक्षा बलों के मनोबल को बढ़ाना, विकास को सुरक्षा के साथ जोड़ना और संवाद व आत्मसमर्पण नीति को प्रभावी बनाना—इन सभी कदमों ने नक्सलवाद के मजबूत किले को कमजोर किया है।

बस्तर: भय से विश्वास की ओर

जो बस्तर कभी “नक्सलगढ़” कहा जाता था, आज वही बस्तर विकास की नई कहानी लिख रहा है।

  • दूरदराज के गांवों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की योजनाएं पहुंच रही हैं।

  • बड़ी संख्या में नक्सलियों का आत्मसमर्पण, समाज की मुख्यधारा में लौटने की ऐतिहासिक प्रक्रिया का प्रमाण है।

  • सड़क, संचार, मोबाइल नेटवर्क और प्रशासनिक पहुंच ने दशकों पुरानी दूरी को समाप्त किया है।

यह सब संभव हुआ है मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की उस सोच से, जिसमें सुरक्षा और संवेदनशीलता दोनों का संतुलन है।

पर्यटन और संस्कृति का नया केंद्र बनता बस्तर

आज बस्तर केवल शाही दशहरे तक सीमित नहीं रहा।
प्राकृतिक सौंदर्य, जनजातीय संस्कृति, जलप्रपात, वन संपदा और शांत वातावरण—बस्तर अब देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में अपनी पहचान बना रहा है।
यह बदलाव बताता है कि बस्तर अब बंदूक नहीं, भविष्य की संभावनाओं से पहचाना जाएगा।

इतिहास में दर्ज होगा यह नेतृत्व

निस्संदेह, भविष्य में जब छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के अंत की चर्चा होगी, तो मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवेदनशील प्रशासन और विकासोन्मुख दृष्टि से असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी संभव हो सकते हैं।

जन्मदिन पर बस्तर की दुआएं

आज, मुख्यमंत्री के जन्मदिन के अवसर पर, बस्तर की धरती—जिसने सबसे अधिक दर्द सहा—उन्हें सबसे अधिक दुआएं दे रही है।
यह दुआ कि शासन की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे,
यह दुआ कि विकास की यह यात्रा कभी न रुके,
और यह दुआ कि छत्तीसगढ़ हमेशा शांति, समृद्धि और सम्मान के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे।

21 फरवरी केवल जन्मदिन नहीं,
यह उस नेतृत्व का उत्सव है जिसने छत्तीसगढ़ को नई पहचान दी।

दुर्ग। शौर्यपथ।

शहर की राजनीति में कई बार छोटी दिखने वाली घटनाएँ भी बड़े सवाल खड़े कर जाती हैं। गंजपारा चौक के नामकरण को लेकर हालिया घटनाक्रम ने यही साबित किया है। चौक का नाम “महेश चौक” घोषित होते ही शहर की फिजा में चर्चा का दौर तेज हो गया—क्या यह महज़ एक नामकरण है, या फिर शहरी सरकार की कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं का आईना?

लंबित आवेदन और अचानक निर्णय

पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल के कार्यकाल में साहू समाज द्वारा “कर्मा माता चौक” और राजस्थानी ब्राह्मण समाज द्वारा “परशुराम चौक” नामकरण के लिए आवेदन दिए गए थे। दोनों प्रस्ताव एमआईसी में लंबित रहे। इसके अतिरिक्त, समीप निर्माणाधीन जगन्नाथ मंदिर को देखते हुए “जगन्नाथ चौक” नाम की भी चर्चा थी।

लेकिन परिषद के औपचारिक निर्णय से पहले ही गंजपारा चौक को “महेश चौक” के रूप में संबोधित किए जाने की खबर सामने आई। कार्यक्रम में राम रसोई के संरक्षक चतुर्भुज राठी की उपस्थिति ने इस पूरे घटनाक्रम को और राजनीतिक रंग दे दिया।

सवालों के घेरे में शहरी सरकार

वर्तमान महापौर अलका बाघमार ने पूर्व सरकार की त्रुटियों को सुधारने का संकल्प लेकर पदभार संभाला था। शपथ ग्रहण के समय निष्पक्षता और पारदर्शिता की जो बात कही गई थी, वह अब गंजपारा चौक के नामकरण प्रकरण में सवालों के घेरे में है।

यदि परिषद द्वारा अब तक औपचारिक निर्णय नहीं हुआ, तो “महेश चौक” नाम की घोषणा किस अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत हुई?

क्या यह निर्णय प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरकर लिया गया, या फिर प्रभावशाली वर्गों के दबाव में जल्दबाजी में?

राम रसोई और दोहरे मापदंड का आरोप

बस स्टैंड स्थित राम रसोई के अनुबंध को लेकर भी पूर्व में अनियमितताओं की चर्चा रही है। स्वयं महापौर ने पूर्व सरकार की गलतियों का उल्लेख करते हुए दूरी बनाई थी। किंतु वर्तमान कार्यकाल में भी अनुबंध की शर्तों के पालन पर सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद संचालन जारी है और निगम की प्रेस विज्ञप्ति में संचालक को “समाजसेवी” के रूप में प्रस्तुत किया जाना विरोधाभास पैदा करता है।

यही कारण है कि गंजपारा चौक के नामकरण को लेकर यह धारणा बल पकड़ रही है कि कहीं न कहीं प्रभावशाली और संपन्न वर्ग की आवाज़ अन्य समाजों की अपेक्षा अधिक प्रभावी रही।

भावनाएँ बनाम राजनीति

साहू समाज, राजस्थानी ब्राह्मण समाज और उड़िया समाज की ओर से लंबे समय से चली आ रही मांगों पर विचार न करते हुए अचानक एक नाम को आगे बढ़ाना सामाजिक संतुलन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। शहर की विविध सामाजिक संरचना में संतुलन बनाए रखना शहरी सरकार की जिम्मेदारी है।

नामकरण मात्र औपचारिकता नहीं—यह भावनाओं, पहचान और सम्मान का विषय होता है। ऐसे में यदि प्रक्रिया पारदर्शी न हो, तो अविश्वास जन्म लेता है।

निष्पक्षता की कसौटी पर बाघमार सरकार

पिछले एक वर्ष में कई ऐसे प्रसंग सामने आए हैं, जिनमें शहरी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर आलोचना हुई है। गंजपारा चौक प्रकरण ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।

क्या यह निर्णय प्रशासनिक पारदर्शिता के तहत हुआ?

क्या परिषद की सहमति ली गई?

क्या सभी समाजों की भावनाओं का सम्मान किया गया?

इन सवालों के जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं हैं।

गंजपारा चौक का नाम चाहे जो भी हो, शहर की जनता निष्पक्ष और पारदर्शी शासन की अपेक्षा रखती है। यदि निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट और सर्वसम्मति से हो, तो विवाद की गुंजाइश कम होती है। लेकिन यदि जल्दबाजी और प्रभाव का आरोप लगे, तो चर्चा का बाजार गर्म होना स्वाभाविक है।

अब देखना होगा कि शहरी सरकार इन उठते सवालों का जवाब कैसे देती है—और क्या निष्पक्षता की कसौटी पर स्वयं को सिद्ध कर पाती है, या यह प्रकरण भी राजनीतिक गलियारों में एक और बहस बनकर रह जाएगा।

रायपुर। छत्तीसगढ़ की परती भूमि अब सोना उगलने लगी है। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस राज्य में किसानों का रुझान राई-सरसों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इससे न केवल किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलना शुरू हुई है, बल्कि देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने की राह भी आसान होती नजर आ रही है। बता दें कि यहां के किसान धान कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ देते हैं, यानी रबी फसल की बुवाई नहीं करते हैं।
इस कारण उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। किसानों के इन हालातों को देखते हुए आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर ने ठोस रोडमैप के साथ प्रयास शुरू किए। परिणामस्वरूप परती भूमि पर अब सरसों की फसल लहलहाने लगी है। संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि राज्य की भूमि में खजाना छिपा हुआ है। यदि किसान धान कटाई के बाद देर से पकने वाली राई-सरसों किस्मों की बुवाई करें तो उनकी आर्थिक स्थिति में असम के किसानों के समान बदलाव देखने को मिल सकता है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में कुल कृषि क्षेत्र 4.78 मिलियन हेक्टेयर है। इसमें केवल 23 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है। वार्षिक वर्षा लगभग 1190 मिमी है, जिसमें लगभग 88 प्रतिशत वर्षा मानसून (मध्य जून से सितंबर) के दौरान होती है। इस दौरान किसान धान का बड़े पैमाने पर उत्पादन लेते हैं। वहीं रबी में गेहूं और थोड़े क्षेत्रफल में दलहनों की बुवाई करते हैं, लेकिन राई-सरसों का उत्पादन हाशिए पर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि परती भूमि, बस्तर के पठारी और उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में राई-सरसों की खेती की अच्छी संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान का यह शुरुआती प्रयास है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
उन्होंने बताया कि धान कटाई के बाद कृषि भूमि परती रह जाती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता और किसानों की आय बढ़ाने के अवसर सीमित हो जाते हैं। राई-सरसों की फसल परती भूमि को उत्पादक बनाने में मददगार बन सकती है।
परती भूमि की चुनौती
छत्तीसगढ़ में लगभग 3.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है, जबकि धान उत्पादन लगभग 9.8 मिलियन टन है। खरीफ में अधिक वर्षा और चिकनी मिट्टी के कारण धान का उत्पादन भरपूर होता है, लेकिन रबी में यही खेती सीमित रह जाती है। धान के कुल क्षेत्र का लगभग 32 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, जिससे कटाई के बाद पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों के लगभग 40–60 प्रतिशत खेत परती रह जाते हैं। इस स्थिति में राई-सरसों का बुवाई क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।
31 हजार हेक्टेयर में खेती
संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि यहां की जलवायु रबी तिलहन के लिए अनुकूल है, बशर्ते खरीफ के बाद मृदा में नमी का संरक्षण और उचित कृषि तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जाए। क्योंकि राई-सरसों को कम पानी में उगाया जा सकता है और यह कम समय में पक जाती है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में महज 31 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों की खेती होती है। करीब 17,260 टन उत्पादन और उत्पादकता 563 किग्रा प्रति हेक्टेयर है, जिसे वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश से और बढ़ाया जा सकता है।
20 प्रतिशत ज्यादा उपज
उन्होंने बताया कि अनुसंधान परीक्षण के आधार पर धान के परती खेतों में राई-सरसों की अच्छी पैदावार मिलती है। इस फसल की लगभग 20 प्रतिशत अधिक पैदावार प्राप्त हुई है। प्रदर्शन के दौरान सरसों की किस्म डीआरएमआर-150-35 ने उत्साहजनक परिणाम दिए। यह किस्म 95–110 दिनों में पक जाती है, जिससे धान की कटाई के बाद मध्य नवंबर से दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक इसकी बुवाई सहजता से की जा सकती है। इसके अलावा किसान छत्तीसगढ़ सरसों, टीबीएम, एनआरसीएचबी-101 और बीबीएम-1 जैसी किस्मों का उपयोग कर सकते हैं।
किसानों को आजीविका सुरक्षा
धान परती क्षेत्रों में राई-सरसों को शामिल करने से किसानों की आय और आजीविका सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार संभव है। वर्षा आधारित धान पारिस्थितिकी तंत्र में किए गए प्रदर्शनों से यह सिद्ध हुआ है कि शून्य जुताई के तहत राई-सरसों से 8–14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इससे प्रति हेक्टेयर 27 हजार रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। साथ ही सरसों के साथ मधुमक्खी पालन करके किसान अपनी आमदनी को और भी बढ़ा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में राई-सरसों की खेती किसानों को त्रिस्तरीय लाभ दे सकती है, जिसमें आय वृद्धि, परती भूमि का उपयोग और खाद्य तेल उत्पादन में बढ़ोतरी शामिल है। इस फसल से राज्य के कृषि परिदृश्य को बदला जा सकता है। इस फसल पर अनुसंधान के काफी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं।

डॉ. पी.के. राय, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद –राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान

 

लेख / 
भारत जब 2047 में अपनी स्वतंत्रता के शताब्दी वर्ष की ओर अग्रसर है, तब प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत सरकार ने महिला-नेतृत्वित विकास को राष्ट्रीय प्रगति का केंद्र बिंदु बनाया है। महिलाओं की समावेशी आर्थिक वृद्धि में निर्णायक भूमिका को स्वीकार करते हुए सरकार ने ऐसा सुरक्षित, सम्मानजनक और संवेदनशील कार्य वातावरण तैयार करने पर विशेष ध्यान दिया है, जिससे महिलाएं आत्मविश्वास के साथ कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ सकें। इसी दिशा में कार्यस्थल पर महिलाओं का उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 एक महत्वपूर्ण आधार स्तंभ के रूप में कार्य करता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र सरकार ने बीते एक दशक में महिला सशक्तिकरण को केवल एक नारा नहीं, बल्कि नीति, संरचना और प्रभावी क्रियान्वयन का विषय बनाया है। “नारी शक्ति” को राष्ट्र की उन्नति का आधार मानते हुए शिक्षा, स्वास्थ्य, आजीविका और सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में व्यापक संस्थागत सुधार किए गए हैं। इसी दूरदर्शी दृष्टिकोण का एक महत्वपूर्ण और व्यावहारिक उदाहरण है महिला एवं बाल विकास मंत्रालय द्वारा वर्ष 2017 में प्रारंभ किया गया SHe-Box पोर्टल, जो कार्यस्थल पर महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और न्याय तक सहज पहुंच सुनिश्चित करने के लिए एक सशक्त डिजिटल मंच के रूप में उभरा है।

आज भारत में महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी लगातार बढ़ रही है। महिला श्रम बल भागीदारी दर 2017-18 में 23.3% से बढ़कर 2023-24 में 41.7% हो गई। सरकारी और निजी क्षेत्रों के साथ-साथ स्टार्टअप्स, सेवा क्षेत्र, शिक्षा, स्वास्थ्य और असंगठित क्षेत्रों में भी महिलाएँ बड़ी संख्या में कार्यरत हैं। ऐसे में यह अनिवार्य हो जाता है कि कार्यस्थल सुरक्षित, सम्मानजनक और भय-मुक्त हों। कार्यस्थल पर महिलाओं का उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 (POSH Act) इसी उद्देश्य से बनाया गया था। मोदी सरकार ने कानून के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए डिजिटल गवर्नेंस के तहत SHe-Box पोर्टल को 29 अगस्त 2024 को तकनीकी सुधारों के साथ पुनः लॉन्च किया, जिससे यह अधिक उपयोगकर्ता-अनुकूल और पारदर्शी बन सके।

यह पोर्टल देशभर में गठित आंतरिक समितियों (Internal Committees – IC) और स्थानीय समितियों (Local Committees – LC) से संबंधित सूचनाओं का एक केंद्रीकृत भंडार (Central Repository) प्रदान करता है।

SHe-Box पोर्टल का उन्नत संस्करण महिलाओं को सीधे संबंधित IC या LC के पास शिकायत दर्ज करने की सुविधा देता है। इससे शिकायत प्रक्रिया में होने वाली देरी और अनावश्यक मानवीय हस्तक्षेप में कमी आती है। शिकायतकर्ता अपनी शिकायत की स्थिति को ऑनलाइन ट्रैक भी कर सकती हैं। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह मंच सरकारी या निजी, संगठित या असंगठित - हर क्षेत्र में कार्यरत महिलाओं के लिए समान रूप से सुलभ है। इससे यह स्पष्ट होता है कि मोदी सरकार की महिला सुरक्षा की नीति किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं, बल्कि समावेशी है।

प्रधानमंत्री मोदी के “डिजिटल इंडिया” विज़न के अनुरूप, SHe-Box महिलाओं को सुरक्षित, सरल और गोपनीय तरीके से शिकायत दर्ज करने और उसकी प्रगति ट्रैक करने की सुविधा देता है। पोर्टल पर दर्ज की गई शिकायत सीधे संबंधित कार्यस्थल की आंतरिक समिति या जिले की स्थानीय समिति तक पहुँचती है। गोपनीयता सुनिश्चित करने के लिए यह व्यवस्था की गई है कि आंतरिक समिति की अध्यक्ष के अलावा कोई अन्य व्यक्ति शिकायत का विवरण नहीं देख सकता, जिससे पीड़िता की पहचान सुरक्षित रहती है।

POSH Act के तहत सरकार का दायित्व है कि वह शिकायतों से संबंधित आंकड़ों का संधारण और निगरानी करे। इस अधिनियम के अंतर्गत किसी भी शिकायत की जाँच के लिए 90 दिनों की समय-सीमा निर्धारित की गई है, जिसका पालन सुनिश्चित करने में SHe-Box पोर्टल महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। समयबद्ध निपटारे को सुनिश्चित करने के लिए मंत्रालय द्वारा डैशबोर्ड अलर्ट, ईमेल और मेसेज के माध्यम से नियमित रिमाइंडर भेजे जा रहे हैं। यह सक्रिय प्रणाली मोदी सरकार की उत्तरदायित्व और परिणाम आधारित शासन की सोच को दर्शाती है।

SHe-Box की प्रभावशीलता में नोडल अधिकारियों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रत्येक कार्यस्थल पर नियुक्त नोडल अधिकारी, नियोक्ता, आंतरिक/स्थानीय समिति और शिकायतकर्ता के बीच समन्वय स्थापित करते हैं। यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करती है कि शिकायतें केवल दर्ज न हों, बल्कि उन पर समय पर और नियमानुसार कार्रवाई भी हो।

महिला-केंद्रित नीतियों के व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखें तो आज देश में 10 करोड़ से अधिक महिलाएँ स्वयं सहायता समूहों से जुड़ी हैं, और लखपति दीदी जैसी पहल के माध्यम से लाखों महिलाएँ आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन रही हैं। वहीं नमो ड्रोन दीदी जैसी अभिनव योजनाएँ महिलाओं को आधुनिक तकनीक, कृषि सेवाओं और उद्यमिता से जोड़ते हुए उन्हें नए और औपचारिक कार्यक्षेत्रों में प्रवेश का अवसर दे रही हैं। ऐसे में जब बड़ी संख्या में महिलाएँ पहली बार संगठित और औपचारिक कार्यस्थलों का हिस्सा बन रही हैं, SHe-Box जैसे प्लेटफॉर्म उन्हें यह भरोसा देते हैं कि सरकार उनके साथ खड़ी है - न केवल कानून बनाकर, बल्कि उसे ज़मीन पर प्रभावी और जवाबदेह ढंग से लागू करके।

बहुभाषी समर्थन, रीयल-टाइम ट्रैकिंग और पारदर्शी प्रक्रिया के माध्यम से SHe-Box पोर्टल कार्यस्थल पर महिलाओं की सुरक्षा को केवल एक कानूनी प्रावधान तक सीमित नहीं रखता, बल्कि उसे एक व्यवस्थित, भरोसेमंद और जवाबदेह संस्थागत ढांचे में परिवर्तित करता है।

SHe-Box वास्तव में एक दूरदर्शी विज़न का सशक्त प्रतिबिंब है, जहाँ नारी शक्ति को भय से मुक्त कर, सम्मान और आत्मविश्वास के साथ कार्यस्थलों में आगे बढ़ने का अवसर दिया जा रहा है, ताकि महिलाएँ अपनी पूरी क्षमता के साथ विकसित भारत के निर्माण में अपनी भूमिका निभा सकें।

सावित्री ठाकुर
(लेखक महिला एवं बाल विकास राज्य मंत्री, भारत सरकार, हैं)

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