February 10, 2026
Hindi Hindi
Uncategorised

Uncategorised (35122)

अन्य ख़बर

अन्य ख़बर (5908)

धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

280 जोड़ों के विवाह से ‘गोल्डन बुक’ में नाम दर्ज, लेकिन व्यवस्थागत खामियों ने बिगाड़ा आयोजन का स्वाद

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। छत्तीसगढ़ की विष्णुदेव साय सरकार प्रदेश के अंतिम व्यक्ति तक खुशहाली पहुँचाने के संकल्प के साथ काम कर रही है। मंगलवार को जगदलपुर में संपन्न हुआ मुख्यमंत्री कन्या विवाह योजना का भव्य आयोजन मुख्यमंत्री के इसी 'सुशासन' का प्रतीक था, जहाँ 280 गरीब परिवारों की बेटियों का घर बसाया गया। मुख्यमंत्री ने स्वयं वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग से जुड़कर पिता की तरह नवदंपत्तियों को आशीर्वाद दिया। लेकिन, अफ़सोस कि मुख्यमंत्री की इस पवित्र मंशा को जमीन पर उतारने वाले महिला एवं बाल विकास विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने अपनी कार्यप्रणाली से सुशासन को 'कुशासन' की ओर धकेलने में कोई कसर नहीं छोड़ी?

 मुख्यमंत्री की संवेदनशीलता बनाम अफसरों की संवेदनहीनता

एक ओर साय सरकार ने प्रदेशभर में 6,412 जोड़ों का विवाह संपन्न कराकर छत्तीसगढ़ का नाम 'गोल्डन बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड' में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराया, वहीं दूसरी ओर जगदलपुर के सिटी ग्राउंड में विभाग की घोर लापरवाही ने इस गौरवशाली क्षण को शर्मसार कर दिया। शासन की योजना तो बेटियों को सम्मान देने की थी, लेकिन विभाग के लापरवाह प्रबंधन ने कई नवविवाहित जोड़ों और उनके परिजनों को तपती धूप में खुले आसमान के नीचे जमीन पर बैठकर भोजन करने के लिए मजबूर कर दिया।

 क्या यही है सुशासन?

आयोजन स्थल पर टेंट, दरी और पानी जैसी बुनियादी व्यवस्थाओं का कमी विभाग की तैयारियों की पोल खोल रहा था। जिस आयोजन को विभाग की देखरेख में यादगार और सम्मानजनक होना चाहिए था, उसे अधिकारियों की उदासीनता ने बदइंतजामी की भेंट चढ़ा दिया। बारातियों को घंटों भोजन के लिए तरसना पड़ा, जो यह सवाल खड़ा करता है कि जब सरकार ने बजट की कोई कमी नहीं रखी, तो फिर व्यवस्थाओं में यह 'कंजूसी' और 'लापरवाही' किसके संरक्षण में हुई?

 जिम्मेदारों पर कार्रवाई की दरकार

स्थानीय जनप्रतिनिधियों की उपस्थिति के बावजूद विभाग के मैदानी अमले की निष्क्रियता साफ दिखी। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय जहाँ अपनी योजनाओं से छत्तीसगढ़ का मान बढ़ा रहे हैं, वहीं महिला एवं बाल विकास विभाग के ऐसे जिम्मेदार अधिकारी अपनी लचर व्यवस्था से सरकार की छवि धूमिल करने का काम कर रहे हैं। जनता अब यह सवाल पूछ रही है कि क्या इन लापरवाह जिम्मेदारों पर गाज गिरेगी, या फिर रिकॉर्ड की आड़ में इन व्यवस्थागत खामियों को दबा दिया जाएगा?

इस कार्यक्रम मे महापौर संजय पांडे, जिला पंचायत अध्यक्ष श्रीमती वेदवती कश्यप, नगर निगम सभापति खेमसिंह देवांगन, राजस्व सभापति संग्राम सिंह राणा, जिला पंचायत उपाध्यक्ष बलदेव मंडावी, जनपद पंचायत अध्यक्ष पदलाम नाग सहित अनेक जनप्रतिनिधि उपस्थित रहे। अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी में विवाह संस्कार संपन्न हुए, पर सामने आई व्यवस्थागत कमियों ने आयोजन की गरिमा पर प्रश्नचिह्न लगाया।

 विभाग का पक्ष

जिला महिला एवं बाल विकास अधिकारी श्री सिन्हा ने कहा कि 280 जोड़ों का सामूहिक विवाह योजनानुसार संपन्न हुआ। भोजन में दाल, चावल, पूड़ी, सब्जी और रसगुल्ला रखा गया था तथा सभी को भोजन उपलब्ध कराया गया। उनके अनुसार आयोजन स्थल पर सामूहिक रूप से भोजन कराया गया और वे स्वयं निरीक्षण किये हैं।

हालाँकि, मौके पर मौजूद कुछ नवविवाहित जोड़ों ने अव्यवस्था के चलते भोजन नहीं कर पाने की बात कही, जिससे विभागीय दावे पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

  रायपुर / शौर्यपथ / छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल में शांति, विश्वास और विकास की दिशा में एक और महत्वपूर्ण सफलता सामने आई है। जिला बीजापुर में 30 और सुकमा में 21 माओवादी कैडरों ने राज्य सरकार की पुनर्वास आधारित पहल “पूना मारगेम: पुनर्वास से पुनर्जीवन” के अंतर्गत आत्मसमर्पण कर समाज की मुख्यधारा में लौटने का निर्णय लिया। आत्मसमर्पण करने वाले इन कैडरों पर कुल 1.61 करोड़ का इनाम घोषित था।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि हथियारों का परित्याग कर संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था में आस्था व्यक्त करना यह स्पष्ट संकेत देता है कि सुरक्षा, सुशासन और समावेशी प्रगति ही किसी भी क्षेत्र के दीर्घकालिक भविष्य की सुदृढ़ नींव होते हैं। यह घटनाक्रम बस्तर में शांति स्थापना के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे निरंतर प्रयासों का सकारात्मक और ठोस परिणाम है। बीते दो वर्षों में बस्तर के दूरस्थ एवं संवेदनशील क्षेत्रों तक सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार और बुनियादी सुविधाओं का विस्तार किया गया है। इस विकासात्मक पहल ने भटके युवाओं को हिंसा का रास्ता छोड़कर लोकतांत्रिक व्यवस्था और सामाजिक जीवन से जुड़ने के लिए प्रेरित किया है।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि सरकार की सुशासन आधारित नीति का केंद्र बिंदु सुरक्षा के साथ-साथ विश्वास, पुनर्वास और भविष्य की संभावनाओं का निर्माण है। आत्मसमर्पण करने वाले युवाओं के पुनर्वास, कौशल विकास और आत्मनिर्भरता के लिए राज्य सरकार द्वारा सभी आवश्यक सहयोग प्रदान किया जाएगा।
मुख्यमंत्री साय ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी विज़न, माननीय अमित शाह के दृढ़ संकल्प तथा राज्य सरकार के सतत प्रयासों से बस्तर आज भय और हिंसा से निकलकर विश्वास, विकास और नए अवसरों की ओर तेज़ी से अग्रसर हो रहा है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि आने वाले समय में बस्तर एक विकसित, शांत और समृद्ध क्षेत्र के रूप में देश के सामने नई पहचान स्थापित करेगा।

  रायपुर / शौर्यपथ / प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम व्यापार समझौता (India–US Interim Trade Agreement) भारत की वैश्विक आर्थिक साख और सामर्थ्य को और अधिक मजबूत करने की दिशा में एक ऐतिहासिक पहल है। मुख्यमंत्री श्री विष्णुदेव साय ने कहा कि इस समझौते से छत्तीसगढ़ के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSMEs) को अमेरिकी बाजार तक नई पहुँच मिलेगी। विशेष रूप से राज्य के वन-आधारित उत्पाद, हथकरघा एवं हस्तशिल्प, वस्त्र तथा कृषि आधारित उत्पादों के लिए निर्यात, निवेश और रोजगार के नए अवसर सृजित होंगे, जिससे प्रदेश के युवाओं को व्यापक लाभ मिलेगा।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि इस व्यापारिक ढांचे में किसानों के हितों और ग्रामीण आजीविका की पूरी तरह सुरक्षा सुनिश्चित की गई है। साथ ही यह पहल महिला सशक्तिकरण को गति देने, स्थानीय उत्पादों की वैश्विक ब्रांडिंग को मजबूती प्रदान करने और मेक इन इंडिया की भावना को और सुदृढ़ करने में सहायक सिद्ध होगी।
मुख्यमंत्री श्री साय ने कहा कि भारत–अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता छत्तीसगढ़ के लिए नए आर्थिक अवसरों का द्वार खोलेगा। उन्होंने कहा कि विकसित भारत @2047 के लक्ष्य की दिशा में छत्तीसगढ़ एक सशक्त और सक्रिय भागीदार के रूप में अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध है और यह समझौता राज्य के समावेशी एवं सतत आर्थिक विकास को नई गति देगा।

बस्तर -जगदलपुर/ 
शनिवार का दिन बस्तर के इतिहास में एक अविस्मरणीय अध्याय के रूप में दर्ज हो गया, जब संभाग स्तरीय ‘बस्तर पण्डुम’ के शुभारंभ अवसर पर देश की राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने बस्तर की आदिम संस्कृति का सजीव और जीवंत स्वरूप प्रत्यक्ष रूप से देखा। इस गरिमामयी अवसर पर बास्तानार क्षेत्र के आदिवासी युवाओं द्वारा प्रस्तुत विश्व-प्रसिद्ध ‘गौर नृत्य’ ने पूरे परिसर को ढोल की थाप और घुंघरुओं की झनकार से गुंजायमान कर दिया। राष्ट्रपति ने इस मनोहारी प्रस्तुति का तन्मयता से अवलोकन करते हुए बस्तर की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को निकट से महसूस किया।

बास्तानार के युवाओं द्वारा प्रस्तुत यह नृत्य केवल एक सांस्कृतिक प्रदर्शन भर नहीं था, बल्कि ‘दंडामी माड़िया’ (बाइसन हॉर्न माड़िया) जनजाति की परंपराओं, जीवन-दर्शन और सांस्कृतिक चेतना का एक जीवंत दस्तावेज था। जैसे ही नर्तक दल मंच पर उतरा, उनकी विशिष्ट वेशभूषा ने उपस्थित जनसमूह का ध्यान सहज ही अपनी ओर आकर्षित कर लिया। पुरुष नर्तकों के सिर पर सजे गौर के सींगों वाले मुकुट, जिन्हें कौड़ियों और मोरपंखों से अलंकृत किया गया था, बस्तर की वन्य संस्कृति तथा गौर पशु के प्रति आदिवासी समाज के गहरे सम्मान और श्रद्धा को प्रतीकात्मक रूप से अभिव्यक्त कर रहे थे। वहीं पारंपरिक साड़ियों और आभूषणों से सुसज्जित महिला नर्तकियों ने जब अपने हाथों में थमी ‘तिरूडुडी’ (लोहे की छड़ी) को भूमि पर पटकते हुए ताल दी, तो एक अद्भुत, गूंजती और लयबद्ध ध्वनि ने वातावरण को मंत्रमुग्ध कर दिया।

नृत्य के दौरान पुरुष नर्तकों ने गले में टंगे भारी ‘मांदरी’ (ढोल) को बजाते हुए जंगली भैंसे की आक्रामक, चंचल और ऊर्जावान मुद्राओं की प्रभावशाली नकल प्रस्तुत की। यह दृश्य दर्शकों को ऐसा अनुभव करा रहा था, मानो वे जंगल के सजीव और प्राकृतिक परिवेश के प्रत्यक्ष साक्षी बन गए हों। उल्लास और आनंद से परिपूर्ण इस नृत्य में माड़िया जनजाति की शिकार-परंपरा, साहस और अदम्य ऊर्जा स्पष्ट रूप से परिलक्षित होती रही। गोलाकार घेरे में थिरकते युवक और उनके कदम से कदम मिलाती युवतियों ने यह सिद्ध कर दिया कि आधुनिकता के इस दौर में भी बस्तर ने अपनी सांस्कृतिक जड़ों को पूरी निष्ठा और गर्व के साथ संजोकर रखा है।

राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु की गरिमामयी उपस्थिति में बास्तानार के कलाकारों द्वारा दी गई यह सशक्त और भावपूर्ण प्रस्तुति न केवल बस्तर पण्डुम की भव्य सफलता का प्रतीक बनी, बल्कि इसने बस्तर की लोक-कला, जनजातीय परंपराओं और सांस्कृतिक वैभव को राष्ट्रीय पटल पर पुनः प्रभावशाली ढंग से रेखांकित किया।

  रायपुर /बस्तर पंडुम के शुभारंभ समारोह में शामिल होने पहुंचीं राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु ने आज बस्तर की माटी की सुगंध और आदिम जनजातीय परंपराओं पर आधारित भव्य प्रदर्शनी का अवलोकन किया। इस दौरान राष्ट्रपति ने विभिन्न स्टॉलों का भ्रमण कर वहां मौजूद स्थानीय निवासियों और कारीगरों से प्रदर्शित कलाओं एवं उत्पादों की विस्तृत जानकारी ली।

राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने बस्तर पंडुम को आदिवासी विरासत को संजोने और उसे पूरी दुनिया तक पहुंचाने का सशक्त माध्यम बताया। उन्होंने एक-एक कर ढोकरा हस्तशिल्प कला, टेराकोटा, वुड कार्विंग, सीसल कला, बांस कला, लौह शिल्प, जनजातीय वेश-भूषा एवं आभूषण, तुम्बा कला, बस्तर की जनजातीय चित्रकला, स्थानीय व्यंजन तथा लोक चित्रों पर आधारित आकर्षक प्रदर्शनी का अवलोकन किया और इसकी सराहना की।

बस्तर पंडुम आयोजन स्थल पर जनजातीय हस्तशिल्प आधारित प्रदर्शनी में ढोकरा कला से निर्मित सामग्रियों का विशेष प्रदर्शन किया गया। इस हस्तशिल्प में लॉस्ट वैक्स कास्टिंग तकनीक का उपयोग किया जाता है। यह भारत की प्राचीन जनजातीय धातु कला है, जिसमें प्रकृति, देवी-देवताओं और ग्रामीण जीवन की झलक स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। ढोकरा की प्रत्येक कृति पूर्णतः हस्तनिर्मित होती है। इसके निर्माण में समाड़ी मिट्टी, मोम वैक्स, तार, पीतल, गरम भट्टी एवं सफाई मशीन का उपयोग किया जाता है। स्थानीय टेराकोटा कला को दर्शाती मिट्टी से बनी आकृतियों का भी प्रदर्शन किया गया, जो लोक आस्था, ग्रामीण जीवन और पारंपरिक विश्वासों को सजीव रूप में प्रस्तुत करती हैं।

प्रदर्शनी में लकड़ी की नक्काशी (Wood Carving) कला के माध्यम से सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं की जीवंत अभिव्यक्ति देखने को मिली। लकड़ी की मूर्तियां बनाने के लिए सागौन, बीजा, सिवनर एवं साल लकड़ी का उपयोग किया जाता है, जिसमें कारीगर पारंपरिक औजारों से बारीक आकृतियां उकेरते हैं। इसी तरह सीसल कला से बने जूट के कपड़े एवं अन्य हस्तशिल्पों का भी राष्ट्रपति ने अवलोकन किया।

एक अन्य स्टॉल में बांस से बनी पारंपरिक उपयोगी एवं सजावटी वस्तुओं का प्रदर्शन किया गया। वहीं गढ़ा हुआ लोहे की कला (Wrought Iron Art) से निर्मित कलाकृतियों ने भी राष्ट्रपति को विशेष रूप से आकर्षित किया।

जनजातीय आभूषणों को प्रदर्शित करने वाले स्टॉल ने राष्ट्रपति का विशेष ध्यान आकर्षित किया। इस स्टॉल में चांदी, मोती, शंख एवं विभिन्न धातुओं से हाथ से बनाए गए जनजातीय आभूषण (Tribal Jewellery) प्रदर्शित किए गए। ये आभूषण आदिवासी समुदायों की पहचान, सामाजिक परंपराओं और सांस्कृतिक विरासत के प्रतीक हैं।
तुम्बा कला (Tumba Art) के अंतर्गत सूखी लौकी जैसी फली से बनाए गए पारंपरिक वाद्य यंत्र एवं सजावटी वस्तुएं भी प्रदर्शनी में रखी गई थीं। जनजातीय वेशभूषा एवं आभूषण स्टॉल में बस्तर क्षेत्र की प्रमुख जनजातियां — दंडामी माढ़िया, अबूझमाड़िया, मुरिया, भतरा एवं हल्बा — की पारंपरिक वेशभूषा और आभूषण संबंधित जनजातियों के युवक-युवतियों
द्वारा प्रदर्शित किए गए।

बस्तर पंडुम स्थल पर जनजातीय चित्रकला से जुड़ी जीवंत प्रदर्शनी का भी राष्ट्रपति श्रीमती मुर्मु ने अवलोकन किया। इस प्रदर्शनी में बस्तर की चित्रकला के माध्यम से आदिवासी जीवन, प्रकृति और परंपराओं की सजीव झलक प्रस्तुत की गई। बस्तर की कला में जंगल, लोक देवता, पर्व-त्योहार और दैनिक जीवन को सहज रंगों और प्रतीकों के माध्यम से उकेरा जाता है। यह चित्रकला पीढ़ियों से चली आ रही सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण का महत्वपूर्ण माध्यम है।

स्थानीय व्यंजन स्टॉल में जनजातीय दैनिक जीवन में उपयोग होने वाली खाद्य सामग्री एवं पेय पदार्थों का प्रदर्शन किया गया। इसमें जोंधरी लाई के लड्डू, जोंधरा, मंडिया पेज, आमट, चापड़ा चटनी, भेंडा चटनी, कुलथी दाल, पान बोबो, तीखुर जैसे पारंपरिक व्यंजनों के साथ पेय पदार्थ लांदा और सल्फी को प्रदर्शित किया गया।
लोक जीवन से संबंधित लोकचित्रों की प्रदर्शनी में बस्तर की संस्कृति और इतिहास, प्राकृतिक सौंदर्य, लोकजीवन एवं लोक परंपराओं से जुड़ी तस्वीरों के साथ-साथ बस्तर के जनजातीय समाज और लोक संस्कृति से संबंधित साहित्य भी प्रदर्शित किया गया।

  रायपुर / शौर्यपथ / राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का शनिवार को बस्तर संभाग के मुख्यालय जगदलपुर में गरिमामय आगमन हुआ। राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु के जगदलपुर स्थित मां दंतेश्वरी एयरपोर्ट पहुंचने पर राज्यपाल रमेन डेका और मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने पुष्पगुच्छ भेंट कर आत्मीय स्वागत किया। इस अवसर पर केंद्रीय राज्य मंत्री तोखन साहू, उप मुख्यमंत्री विजय शर्मा तथा वन मंत्री केदार कश्यप, सांसद महेश कश्यप, जगदलपुर विधायक किरण सिंह देव और महापौर संजय पांडे ने भी राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु का स्वागत एवं अभिवादन किया।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि मां दंतेश्वरी की पावन, ऐतिहासिक एवं आस्था से परिपूर्ण धरती पर राष्ट्रपति श्रीमती द्रौपदी मुर्मु जी का हृदय से स्वागत एवं अभिनंदन है। इनका आगमन बस्तर अंचल सहित समस्त छत्तीसगढ़ के लिए गर्व, सम्मान और प्रेरणा का क्षण है। आदिवासी संस्कृति, परंपरा और समृद्ध विरासत से सुसज्जित इस पावन क्षेत्र में उनकी गरिमामयी उपस्थिति प्रदेश के विकास, जनजातीय अस्मिता और नई संभावनाओं को और अधिक सशक्त करने का मार्ग प्रशस्त करेगी।

   

रायपुर में केंद्रीय गृह मंत्री की उच्चस्तरीय सुरक्षा व विकास समीक्षा बैठक
डबल इंजन सरकार में कभी नक्सल हिंसा का गढ़ रहा छत्तीसगढ़ बना विकास का प्रतीक

रायपुर / शौर्यपथ /
केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह ने आज छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में वामपंथी उग्रवाद पर एक उच्चस्तरीय सुरक्षा समीक्षा बैठक की अध्यक्षता की। इसके साथ ही राज्य में संचालित विभिन्न विकास कार्यों की भी विस्तृत समीक्षा की गई। बैठक में नक्सल प्रभावित राज्यों की सुरक्षा स्थिति, आपसी समन्वय, खुफिया तंत्र और भविष्य की रणनीति पर गहन मंथन हुआ।

  

बैठक में मुख्यमंत्री विष्णु देव साय, उपमुख्यमंत्री विजय शर्मा, केंद्रीय गृह सचिव, खुफिया ब्यूरो के निदेशक, गृह मंत्रालय के विशेष सचिव (आंतरिक सुरक्षा), छत्तीसगढ़ के मुख्य सचिव सहित CRPF, NIA, BSF, ITBP के महानिदेशक तथा छत्तीसगढ़, तेलंगाना, झारखंड, ओडिशा और महाराष्ट्र के गृह सचिव एवं पुलिस महानिदेशक उपस्थित रहे।

बैठक को संबोधित करते हुए अमित शाह ने कहा कि केंद्र और छत्तीसगढ़ सरकार की सुरक्षा-केंद्रित रणनीति, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर विकास, नक्सल फाइनेंशियल नेटवर्क पर निर्णायक प्रहार तथा प्रभावी आत्मसमर्पण नीति के ठोस और सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं। उन्होंने दृढ़ विश्वास व्यक्त किया कि 31 मार्च 2026 से पहले देश पूरी तरह नक्सल-मुक्त हो जाएगा।

गृह मंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ कभी नक्सली हिंसा का गढ़ माना जाता था, लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में चल रही डबल इंजन सरकार के कारण आज यह राज्य विकास का पर्याय बन चुका है। उन्होंने कहा कि राज्य के युवा अब खेल, फॉरेंसिक विज्ञान और तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में आगे बढ़ रहे हैं और साथ ही अपनी संस्कृति व परंपराओं को भी सहेजकर रख रहे हैं।

अमित शाह ने स्पष्ट किया कि माओवाद के विरुद्ध लड़ाई किसी एक राज्य या बिखरे प्रयासों तक सीमित नहीं होनी चाहिए। उन्होंने सभी नक्सल प्रभावित राज्यों और केंद्रीय एजेंसियों के बीच सतत, सशक्त और निर्बाध समन्वय पर जोर देते हुए कहा कि शेष बचे माओवादी तत्वों को एक राज्य से दूसरे राज्य में भागने का अवसर नहीं मिलना चाहिए।

उन्होंने कहा कि मोदी सरकार में नक्सलवाद अब अपने अंतिम चरण में है। यह वही नक्सलवाद है जिसने दशकों तक देश की कई पीढ़ियों को गरीबी, अशिक्षा और भय के अंधकार में धकेल दिया। अब देश उस दौर से निर्णायक रूप से बाहर निकल रहा है।

गृह मंत्री ने कहा कि छत्तीसगढ़ ने सुरक्षा और विकास — दोनों मोर्चों पर उल्लेखनीय प्रगति की है और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के नागरिकों को भी विकास के समान अवसर, शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की सुविधाएं मिलें।

उन्होंने विश्वास जताया कि सुरक्षा, विकास और विश्वास — इन तीन स्तंभों पर आधारित रणनीति से भारत शीघ्र ही नक्सलवाद के कलंक से पूरी तरह मुक्त होगा।

  रायपुर / शौर्यपथ / पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी), भारत सरकार, रायपुर के नेतृत्‍व में अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह में भारत सरकार प्रवर्तित लोक कल्‍याणकारी योजनाओं के कार्यान्‍वयन एवं प्रगति के अवलोकन के साथ ही साथ इस केन्‍द्र शासित प्रदेश की कला, संस्‍कृति और विरासत को जानने व समझने के लिए छत्‍तीसगढ़ की 12 सदस्‍यीय मीडिया टीम आज, 08 फरवरी, 2026 को रायपुर से पोर्ट ब्‍लेयर के लिए रवाना हो रही है ।
इस मीडिया टीम में हरिभूमि से श्री ब्रम्‍हवीर सिंह, नवप्रदेश से श्री यशवंत धोटे, स्‍वदेश से श्री जयप्रकाश मिश्रा, पिपुल्‍स समाचार से श्री वरूण कुमार चौहान, पत्रिका से श्री राहुल जैन, नवभारत से श्री जितेन्‍द्र मिश्रा, छत्‍तीसगढ़ से श्री पी. श्रीनिवास राव, दि हितवाद से श्री अभिषेक कुमार, आईबीसी-24 टीवी से श्री सौरभ सिंह परिहार, लल्‍लुराम डॉट कॉम से श्री प्रतीक चौहान और पीआईबी-रायपुर के दो ऑफिशियल्‍स श्री रमेश जायभाये तथा श्री परमानन्‍द साहू शामिल हैं ।

छत्‍तीसगढ़ की मीडिया टीम 09 से 14 फरवरी, 2026 तक केन्‍द्र शासित प्रदेश का भ्रमण करेगी । इस दौरान मीडिया टीम 20 मेगावाट एनएलसी सोलर पावर प्‍लांट, डालीगंज, सेंट्रल आईलैंड एग्रीकल्‍चर रिसर्च इंस्टीट्यूट, प्राणीशास्‍त्र संग्रहालय, मानव विज्ञान संग्रहालय, सेलुलर जेल, नार्थ-बे एवं नार्थ-बे लाइटहाऊस, एनएच-4 अपग्रेडेशन परियोजना, स्‍मार्ट सिटी परियोजना, भारतीय अं‍तरिक्ष अनुसंधान संगठन, नेशनल इंस्‍टीट्यूट ऑफ ओशन टेक्‍नोलॉजी, मि‍डिल स्‍ट्रेट क्रीक ब्रिज, बाराटांग लाइमस्‍टोन गुफाएं, मड वाल्‍केनो (गारामुखी), हम्‍प्रे स्‍ट्रेट ब्रिज, अमकुंज ईको-डेवलपमेंट साइट, धानी नल्‍ला मैंग्रेाव, कालीपुर ईको-टूरिज्‍म परियोजना, रॉस एवं स्मिथ द्वीप, चेन्‍नई-अंडमान सबमरीन ओएफसी परियोजना, बीएसएनएल केबल लैंडिंग स्‍टेशन, लालाजी बे इको-टूरिज्‍म रिसार्ट परियोजना, प्रस्‍तावित सी-प्‍लेन जेट्टी साइट, ताज एक्‍सोटिका एवं न्‍यू ईको-टूरज्मि स्‍थल और राधानगर बीच का भ्रमण करेगी ।
इसके अलावा मीडिया टीम अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह के उपराज्‍यपाल, मुख्‍य सचिव, मत्‍स्‍य एवं पर्यटन सचिव, फिशरी सर्वे ऑफ इंडिया, भारतीय नौसेना, भारतीय कोस्‍ट गार्ड और भारत संचार निगम लिमिटेड के वरिष्‍ठ अधिकारियों से मुलाकात करेगी ।

 

जगदलपुर/बस्तर।
“मां दंतेश्वरी की जय… सियान-सज्जन, दादा-दीदी मनके जोहार।”
इन्हीं आत्मीय शब्दों के साथ भारत की राष्ट्रपति ने बस्तर पंडुम महोत्सव में अपने ऐतिहासिक संबोधन की शुरुआत की। मां दंतेश्वरी के पावन धाम में उपस्थित होकर राष्ट्रपति ने इसे अपना सौभाग्य बताया और कहा कि छत्तीसगढ़ आना उन्हें अपने घर आने जैसा लगता है। यहां के लोगों से मिलने वाला अपनत्व और स्नेह उनके लिए अमूल्य है।

राष्ट्रपति ने बस्तर को वीरों की धरती बताते हुए उन सभी सपूतों को नमन किया जिन्होंने भारत माता की रक्षा के लिए अपने प्राण न्योछावर किए। उन्होंने कहा कि बस्तर की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक वैभव देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो मां दंतेश्वरी ने स्वयं इस धरती को संवारा हो।

जीवन को उत्सव की तरह जीता है बस्तर

राष्ट्रपति ने बस्तर की जनजातीय जीवन-शैली की सराहना करते हुए कहा कि यहां हर मौसम, हर फसल और हर ऋतु एक पंडुम है। बीज बोने से लेकर आम के मौसम तक, बस्तर के लोग जीवन को उत्सव के रूप में जीते हैं। यह जीवन-दर्शन पूरे देश के लिए प्रेरणास्रोत है।

उन्होंने बताया कि पिछले वर्ष बस्तर पंडुम के माध्यम से देशभर के लोगों ने जनजातीय संस्कृति की झलक देखी थी और इस वर्ष 50 हजार से अधिक कलाकारों व प्रतिभागियों द्वारा जनजातीय संस्कृति और जीवन-शैली के विविध रूपों का प्रदर्शन किया जा रहा है। इसके लिए उन्होंने छत्तीसगढ़ सरकार की प्रशंसा की।

पर्यटन की अपार संभावनाएं, होम-स्टे को मिलेगा बढ़ावा

राष्ट्रपति ने कहा कि बस्तर क्षेत्र एक प्रमुख पर्यटन स्थल बनने की पूरी क्षमता रखता है। यहां की प्राचीन संस्कृति, जलप्रपात, गुफाएं और प्रकृति पर्यटकों को आकर्षित करने में सक्षम हैं। उन्होंने होम-स्टे जैसे नए पर्यटन मॉडल की सराहना करते हुए कहा कि इससे स्थानीय लोगों को रोजगार और आत्मनिर्भरता मिलेगी।

माओवाद से मुक्ति, विकास की ओर निर्णायक कदम

अपने संबोधन में राष्ट्रपति ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि चार दशकों तक बस्तर माओवाद की हिंसा से पीड़ित रहा, जिसका सबसे अधिक नुकसान युवाओं, आदिवासियों और दलित समुदायों को हुआ। लेकिन अब भारत सरकार और राज्य सरकार की निर्णायक कार्रवाई से भय और असुरक्षा का माहौल समाप्त हो रहा है।

उन्होंने बताया कि बड़ी संख्या में माओवाद से प्रभावित लोगों ने आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में वापसी की है और सरकार यह सुनिश्चित कर रही है कि वे सम्मानजनक और सामान्य जीवन जी सकें। ‘नियद नेल्लानार योजना’ को उन्होंने ग्रामीण सशक्तिकरण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।

गांव-गांव विकास का उजास

राष्ट्रपति ने कहा कि आज बस्तर में विकास का नया सूर्योदय हो रहा है। गांव-गांव बिजली, सड़क और पानी पहुंच रहा है। वर्षों से बंद पड़े स्कूल फिर से खुल रहे हैं और बच्चे शिक्षा की ओर लौट रहे हैं। यह बदलाव पूरे देश के लिए आशा और विश्वास का संदेश है।

लोकतंत्र की ताकत का उदाहरण

हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटे लोगों की सराहना करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि लोकतंत्र और संविधान में आस्था रखकर ही आगे बढ़ा जा सकता है। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र की यही ताकत है कि ओडिशा के एक छोटे से गांव की बेटी आज भारत की राष्ट्रपति बनकर बस्तर की जनता को संबोधित कर रही है।

जनजातीय उत्थान और शिक्षा पर विशेष जोर

राष्ट्रपति ने बताया कि पीएम जनमन योजना और धरती आबा जनजातीय ग्राम उत्कर्ष अभियान के माध्यम से सबसे पिछड़ी जनजातियों को विकास से जोड़ा जा रहा है। शिक्षा को उन्होंने व्यक्तिगत और सामुदायिक विकास की आधारशिला बताया और माता-पिता से अपील की कि वे अपने बच्चों को जरूर पढ़ाएं। जनजातीय क्षेत्रों में एकलव्य आदर्श आवासीय विद्यालयों की स्थापना को उन्होंने भविष्य निर्माण की दिशा में अहम कदम बताया।

पद्म पुरस्कारों से बस्तर का गौरव बढ़ा

राष्ट्रपति ने वर्ष 2026 के पद्म पुरस्कार विजेताओं का उल्लेख करते हुए बताया कि इस क्षेत्र के डॉक्टर बुधरी ताती, डॉक्टर रामचंद्र गोडबोले एवं सुनीता गोडबोले को समाज सेवा, महिला सशक्तिकरण, आदिवासी उत्थान और दूरस्थ क्षेत्रों में नि:शुल्क चिकित्सा सेवा के लिए सम्मानित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि ऐसे निस्वार्थ सेवाभावी लोग ही समाज को संवेदनशील और समावेशी बनाते हैं।

विरासत के साथ विकास का संकल्प

अपने संबोधन के समापन में राष्ट्रपति ने कहा कि मां दंतेश्वरी को समर्पित बस्तर दशहरा हमारी प्राचीन परंपराओं और भाईचारे का प्रतीक है। विकास का वही मॉडल सफल होता है जो विरासत को संजोते हुए आगे बढ़े। उन्होंने युवाओं से आह्वान किया कि वे आधुनिक विकास के साथ अपनी संस्कृति और परंपराओं का संरक्षण करें।

राष्ट्रपति ने बस्तरवासियों से केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं का लाभ उठाने की अपील करते हुए कहा कि आपकी प्रगति ही छत्तीसगढ़ और विकसित भारत की नींव है।

“जय जय छत्तीसगढ़ महतारी” के उद्घोष के साथ उन्होंने मां दंतेश्वरी से देशवासियों के कल्याण की प्रार्थना की।

 

 लेखक -डॉ. दीपक जायसवाल


          पीढ़ियों से, भारत के श्रमिकों ने एक पुरानी और टुकड़ों में बंटी श्रम प्रणाली का बोझ उठाया है, जो अक्सर उनके वेतन, सुरक्षा और कार्यस्थल पर गरिमा की रक्षा करने में विफल रही है। असंगठित, संविदा और उभरते गिग क्षेत्रों के करोड़ों श्रमिक नीति-परिदृश्य में अदृश्य रहे हैं और बुनियादी सामाजिक सुरक्षा से वंचित रहे हैं। चार श्रम संहिताएँ इन ऐतिहासिक अन्यायों का सुधार करने के लिए लंबे समय से प्रतीक्षित प्रयास का प्रतिनिधित्व करती हैं। लगभग तीन दर्जन अलग-अलग कानूनों को एक सुसंगत, एकल ढांचे में लाकर, ये संहिताएँ न्यायसंगत वेतन, सुरक्षित कार्यस्थल और उन लोगों के लिए सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करती हैं, जो लंबे समय से वंचित रहे हैं। वर्षों के परामर्श और बहस के बाद इनका कार्यान्वयन, श्रमिकों के अधिकारों को मजबूत करने तथा अधिक स्थिर और मानवतापूर्ण रोजगार वातावरण बनाने में निर्णायक क्षण का प्रतीक है।

एक जिम्मेदार ट्रेड यूनियन संगठन के रूप में, भारतीय ट्रेड यूनियनों का राष्ट्रीय मोर्चा (एनएफआईटीयू), कामगारों की दीर्घकालिक भलाई, गरिमा और सामाजिक सुरक्षा के लिए प्रतिबद्ध है। मोर्चा दृढ़ता से मानता है कि 12 फरवरी को श्रम संहिताओं के खिलाफ हड़ताल में भाग लेना न तो आवश्यक है और न ही वर्तमान समय में श्रमिक वर्ग के सर्वोत्तम हित में है।

श्रम संहिताएं कोई अचानक या एकतरफा हस्तक्षेप नहीं हैं। ये दो दशकों से अधिक समय तक चली सुधार प्रक्रिया का परिणाम हैं। 29 अलग-अलग श्रम कानूनों को चार व्यापक संहिताओं में समेकित करने की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी, ताकि अनुपालन को सरल बनाया जा सके, अस्पष्टता को कम किया जा सके तथा कार्य और रोजगार की बदलती वास्तविकताओं के अनुरूप भारत की श्रम रूपरेखा को आधुनिक बनाया जा सके।

श्रम संहिताओं को पूरी तरह खारिज करना उन मौलिक लाभों की उपेक्षा करता है, जो वे श्रमिकों को प्रदान करने का प्रयास करती हैं। वेतन संहिता सार्वभौमिक न्यूनतम वेतन कवरेज और समय पर वेतन भुगतान सुनिश्चित करती है, जिससे विभिन्न क्षेत्रों में लंबे समय से मौजूद वेतन सुरक्षा के अंतर को दूर किया जा सकता है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, पहली बार, असंगठित, संविदा, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के लिए सामाजिक सुरक्षा की विधायी रूपरेखा तैयार करती है। इन श्रमिकों की संख्या लगभग 40 करोड़ है और पहले ये श्रमिक औपचारिक सुरक्षा व्यवस्था से बाहर थे। ये प्रावधान भारत में श्रमिकों के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा कवरेज का ऐतिहासिक विस्तार प्रस्तुत करते हैं।

औद्योगिक संबंध संहिता तथा पेशे से जुड़ी सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य-परिस्थिति संहिता का उद्देश्य औद्योगिक सद्भाव, तेज विवाद निवारण और सुरक्षित, स्वस्थ व अधिक सम्मानजनक कार्यस्थलों को बढ़ावा देना है। कुछ प्रावधानों को लेकर चिंताएँ हो सकती हैं, अनुभव बताते हैं कि व्यापक विरोध और हड़तालों से शायद ही रचनात्मक परिणाम मिलते हैं। संवाद, नियम-आधारित सुधार और मुद्दा-विशेष पर चर्चा के जरिये श्रमिकों के हित बेहतर तरीके से पूरे किये जा सकते हैं, बजाय इसके कि आपस में टकराव हो, जिससे पारिश्रमिक हानि, उत्पादन में रुकावट और रोजगार असुरक्षा का जोखिम पैदा होता है—विशेष रूप से श्रम बल के सबसे कमजोर वर्गों के लिए।

यह दावा करना भी गलत है कि श्रम संहिताएँ बिना परामर्श के लागू की गई हैं। सुधार प्रक्रिया में त्रिपक्षीय चर्चाओं के कई दौर, संसद की स्थायी समितियों में विचार-विमर्श और विभिन्न हितधारकों के साथ संवाद शामिल थे। एक लोकतांत्रिक प्रणाली में, मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन इन्हें बातचीत और संस्थागत संवाद के माध्यम से हल किया जाना चाहिए, न कि उन व्यवधानों के द्वारा जो अंततः स्वयं श्रमिकों को ही नुकसान पहुंचाते हैं।

जब भारतीय अर्थव्यवस्था संरचनात्मक रूपांतरण के दौर से गुजर रही है और राष्ट्र विकसित भारत के लक्ष्य की दिशा में आगे बढ़ रहा है, श्रमिक संघों को विघटन के बजाय जिम्मेदार कार्रवाई का चयन करना चाहिए। हमारी भूमिका केवल सुधारों का विरोध करना नहीं है, बल्कि उन्हें इस तरह आकार देना है कि श्रमिकों के अधिकार, सामाजिक सुरक्षा और कार्यस्थल पर गरिमा को प्रभावी क्रियान्वयन और सतत सुधार के माध्यम से व्यावहारिक तौर पर मजबूत किया जा सके।

श्रमिक संघों की वास्तविक जिम्मेदारी केवल विरोध करना नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि मजदूरों को वास्तविक रूप में जमीनी स्तर पर लाभ हो। अब ध्यान इस बात पर होना चाहिए कि श्रम संहिताओं को न्यायपूर्ण तरीके से लागू किया जाए और इन्हें हर उस मजदूर तक पहुँचाया जाए, जिसे सुरक्षा की आवश्यकता है। हड़ताल की बजाय संवाद, सहयोग और निरंतर सुधार चुनकर, श्रमिक संघ एक ऐसा प्रणाली बनाने में मदद कर सकते हैं, जो श्रमिकों के लिए नौकरी की सुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा और गरिमा प्रदान करती हो और साथ ही 2047 तक विकसित भारत की ओर देश की यात्रा का भी समर्थन करती हो।
............

(लेखक, भारतीय ट्रेड यूनियनों के राष्ट्रीय मोर्चा (एनएफआईटीयू) के अध्यक्ष हैं)

Page 1 of 2509

हमारा शौर्य

हमारे बारे मे

whatsapp-image-2020-06-03-at-11.08.16-pm.jpeg
 
CHIEF EDITOR -  SHARAD PANSARI
CONTECT NO.  -  8962936808
EMAIL ID         -  shouryapath12@gmail.com
Address           -  SHOURYA NIWAS, SARSWATI GYAN MANDIR SCHOOL, SUBHASH NAGAR, KASARIDIH - DURG ( CHHATTISGARH )
LEGAL ADVISOR - DEEPAK KHOBRAGADE (ADVOCATE)