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विशेष लेख
छत्तीसगढ़ की पावन धरती ने समय-समय पर ऐसे महान व्यक्तित्वों को जन्म दिया है, जिन्होंने अपने कर्म, सेवा और त्याग से समाज को नई दिशा दी। इन्हीं महान विभूतियों में एक नाम अत्यंत श्रद्धा और सम्मान से लिया जाना चाहिए—महादानी दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल का।
4 अप्रैल 1876 को जन्मे दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल न केवल अपने समय के अत्यंत समृद्ध उद्यमी थे, बल्कि उससे कहीं बढ़कर वे समाज सेवा, परोपकार और मानव कल्याण के प्रतीक थे। आज भी रायपुर और आसपास के अनेक महत्वपूर्ण संस्थान उनकी दानशीलता के प्रमाण हैं, लेकिन दुर्भाग्य यह है कि समय के साथ उनका नाम धीरे-धीरे जनस्मृति से ओझल होता चला गया।
डी.के. अस्पताल से जुड़ा नाम, लेकिन योगदान उससे कहीं बड़ा
रायपुर का प्रतिष्ठित डी.के. (दाऊ कल्याण) अस्पताल आज भी उनके नाम से जाना जाता है। बहुत से लोग उन्हें केवल इसी अस्पताल की जमीन के दानदाता के रूप में जानते हैं, जबकि उनकी दानशीलता का दायरा इससे कहीं अधिक विशाल था।
1944 में दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने डी.के. अस्पताल के लिए जमीन के साथ भवन निर्माण हेतु 1,25,000 रुपये नकद दान किए, जो आज के मूल्यांकन में लगभग 70 करोड़ रुपये के बराबर माने जाते हैं।
एम्स सहित कई संस्थानों की नींव में उनका योगदान
रायपुर में स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) भी उसी भूमि पर बना है, जिसे दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल ने समाज के हित में दान किया था। यह तथ्य उनकी दूरदर्शिता और समाज के प्रति समर्पण को दर्शाता है।
शिक्षा और कृषि के क्षेत्र में भी उदार योगदान
दाऊ जी ने केवल स्वास्थ्य सेवाओं तक ही अपने दान को सीमित नहीं रखा।
उन्होंने लभांडी क्षेत्र की जमीन के साथ कृषि महाविद्यालय और गरीब छात्रों के लिए छात्रावास निर्माण हेतु 1,12,000 रुपये दान किए, जो आज के मूल्य में लगभग 62 करोड़ रुपये के बराबर माने जाते हैं।
इसके अतिरिक्त उन्होंने—
टीबी अस्पताल के लिए 323 एकड़ भूमि दान की
बरोंडा ग्राम में कृषि अनुसंधान के लिए भूमि प्रदान की
भाटापारा में कृषि विज्ञान के लिए विशाल भूमि दान दी
धार्मिक और सामाजिक सेवा में भी अग्रणी
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल की आस्था और सेवा भाव धार्मिक और सामाजिक क्षेत्र में भी दिखाई देता है।
उन्होंने रायपुर के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के संचालन हेतु पूरा खैरा गांव दान कर दिया।
भाटापारा में अकाल के समय लोगों की पीड़ा को देखते हुए उन्होंने “कल्याण सागर” जलाशय का निर्माण कराया, जिससे हजारों लोगों और पशुओं को पानी की सुविधा मिली।
पशु सेवा और ज्ञान के प्रसार में योगदान
भाटापारा में विशाल पशु चिकित्सालय का निर्माण
गरीबों और विद्यार्थियों के लिए पुस्तकालय की स्थापना
ये सभी कार्य इस बात का प्रमाण हैं कि दाऊ जी का दृष्टिकोण केवल तत्कालीन समाज तक सीमित नहीं था, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के कल्याण की सोच से जुड़ा था।
छत्तीसगढ़ से बाहर भी उदार दान
उनकी परोपकारिता केवल छत्तीसगढ़ तक सीमित नहीं रही। देश के विभिन्न हिस्सों में भी उन्होंने जरूरत के समय उदारतापूर्वक सहयोग किया।
प्रमुख योगदानों में शामिल हैं—
नागपुर के लेडी इरविन अस्पताल के निर्माण में सहयोग
सेंट्रल महिला कॉलेज के निर्माण में प्रमुख दान
बिहार के भूकंप पीड़ितों के लिए सहायता
वर्धा की भीषण बाढ़ में उदार दान
अपने समय के अत्यंत समृद्ध उद्यमी
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल अपने समय के अत्यंत संपन्न उद्यमियों में गिने जाते थे।
1937 में उन्होंने लगभग 70,000 रुपये का राजस्व भुगतान किया, जो आज की गणना में लगभग 39 करोड़ रुपये से अधिक के बराबर माना जा सकता है।
आज क्यों धुंधला पड़ गया यह नाम?
इतने विशाल और ऐतिहासिक योगदान के बावजूद आज यह विडंबना है कि छत्तीसगढ़ की नई पीढ़ी तो दूर, बहुत से लोग इस महान माटीपुत्र के नाम और कार्यों से परिचित भी नहीं हैं।
यह केवल इतिहास की भूल नहीं, बल्कि उस विरासत के प्रति हमारी उपेक्षा भी है जिसने इस प्रदेश की सामाजिक, शैक्षणिक और स्वास्थ्य व्यवस्था की मजबूत नींव रखी।
स्मरण और सम्मान की आवश्यकता
आज आवश्यकता है कि छत्तीसगढ़ की जनता, सामाजिक संस्थाएं और सरकार मिलकर दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल जैसे महादानी व्यक्तित्वों को पुनः जनस्मृति में स्थापित करें।
क्योंकि किसी भी समाज की पहचान केवल उसकी वर्तमान उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन महान व्यक्तियों से होती है जिन्होंने अपना सर्वस्व समाज के कल्याण के लिए समर्पित कर दिया।
दाऊ कल्याण सिंह अग्रवाल न केवल छत्तीसगढ़ के गौरव हैं, बल्कि वे भारतीय परोपकार की परंपरा के एक उज्ज्वल अध्याय भी हैं।
(मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के जन्मदिवस विशेष)
लेखक : शरद पंसारी
संपादक – शौर्यपथ दैनिक समाचार
21 फरवरी—छत्तीसगढ़ के वर्तमान मुख्यमंत्री माननीय विष्णु देव साय का जन्मदिन—सिर्फ एक राजनीतिक व्यक्तित्व का जन्मदिवस नहीं, बल्कि उस नेतृत्व का उत्सव है जिसने बीते ढाई वर्षों में छत्तीसगढ़ की पहचान को राष्ट्रीय स्तर पर नए सिरे से परिभाषित किया है।
आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व जब मुख्यमंत्री विष्णु देव साय ने प्रदेश की कमान संभाली, तब उनके सामने अनेक चुनौतियाँ थीं—किसानों की उम्मीदें, महिलाओं का सशक्तिकरण, आवासहीन गरीबों की पीड़ा और सबसे बड़ी चुनौती, वर्षों से नक्सलवाद की छाया में जी रहा बस्तर।
मुख्यमंत्री साय की सरकार ने सत्ता संभालते ही यह स्पष्ट कर दिया कि यह सरकार केवल घोषणाओं की नहीं, बल्कि कार्यान्वयन की सरकार होगी।
किसानों से ₹3100 प्रति क्विंटल की दर से धान खरीदी कर अन्नदाता के सम्मान को पुनर्स्थापित किया गया।
महतारी वंदन योजना के तहत महिलाओं को प्रतिमाह ₹1000 की आर्थिक सहायता देकर महिला सशक्तिकरण को जमीनी मजबूती दी गई।
प्रधानमंत्री आवास योजना के माध्यम से हजारों परिवारों को पक्की छत का सपना साकार हुआ।
ये सभी वादे केवल कागज़ों तक सीमित नहीं रहे, बल्कि धरातल पर उतरते हुए सरकार की नीयत और नेतृत्व की प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं।
परंतु इन उपलब्धियों के बीच एक ऐसा ऐतिहासिक कार्य है, जो मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व को अमर पहचान दिलाता है—
? छत्तीसगढ़ को नक्सलवाद से मुक्त करने की दिशा में ठोस और निर्णायक पहल।
वर्षों तक छत्तीसगढ़ के नागरिकों को अन्य राज्यों में एक ही सवाल का सामना करना पड़ता था—
“आप छत्तीसगढ़ में कैसे रह लेते हैं? वह तो नक्सली क्षेत्र है।”
मुख्यमंत्री साय के नेतृत्व में डबल इंजन सरकार ने इस मानसिकता को जड़ से बदलने का काम किया। सुरक्षा बलों के मनोबल को बढ़ाना, विकास को सुरक्षा के साथ जोड़ना और संवाद व आत्मसमर्पण नीति को प्रभावी बनाना—इन सभी कदमों ने नक्सलवाद के मजबूत किले को कमजोर किया है।
जो बस्तर कभी “नक्सलगढ़” कहा जाता था, आज वही बस्तर विकास की नई कहानी लिख रहा है।
दूरदराज के गांवों तक शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार की योजनाएं पहुंच रही हैं।
बड़ी संख्या में नक्सलियों का आत्मसमर्पण, समाज की मुख्यधारा में लौटने की ऐतिहासिक प्रक्रिया का प्रमाण है।
सड़क, संचार, मोबाइल नेटवर्क और प्रशासनिक पहुंच ने दशकों पुरानी दूरी को समाप्त किया है।
यह सब संभव हुआ है मुख्यमंत्री विष्णु देव साय की उस सोच से, जिसमें सुरक्षा और संवेदनशीलता दोनों का संतुलन है।
आज बस्तर केवल शाही दशहरे तक सीमित नहीं रहा।
प्राकृतिक सौंदर्य, जनजातीय संस्कृति, जलप्रपात, वन संपदा और शांत वातावरण—बस्तर अब देश के प्रमुख पर्यटन स्थलों में अपनी पहचान बना रहा है।
यह बदलाव बताता है कि बस्तर अब बंदूक नहीं, भविष्य की संभावनाओं से पहचाना जाएगा।
निस्संदेह, भविष्य में जब छत्तीसगढ़ से नक्सलवाद के अंत की चर्चा होगी, तो मुख्यमंत्री विष्णु देव साय का नाम प्रमुखता से लिया जाएगा।
उन्होंने यह सिद्ध किया कि मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति, संवेदनशील प्रशासन और विकासोन्मुख दृष्टि से असंभव दिखने वाले लक्ष्य भी संभव हो सकते हैं।
आज, मुख्यमंत्री के जन्मदिन के अवसर पर, बस्तर की धरती—जिसने सबसे अधिक दर्द सहा—उन्हें सबसे अधिक दुआएं दे रही है।
यह दुआ कि शासन की योजनाएं अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे,
यह दुआ कि विकास की यह यात्रा कभी न रुके,
और यह दुआ कि छत्तीसगढ़ हमेशा शांति, समृद्धि और सम्मान के मार्ग पर आगे बढ़ता रहे।
21 फरवरी केवल जन्मदिन नहीं,
यह उस नेतृत्व का उत्सव है जिसने छत्तीसगढ़ को नई पहचान दी।
दुर्ग। शौर्यपथ।
शहर की राजनीति में कई बार छोटी दिखने वाली घटनाएँ भी बड़े सवाल खड़े कर जाती हैं। गंजपारा चौक के नामकरण को लेकर हालिया घटनाक्रम ने यही साबित किया है। चौक का नाम “महेश चौक” घोषित होते ही शहर की फिजा में चर्चा का दौर तेज हो गया—क्या यह महज़ एक नामकरण है, या फिर शहरी सरकार की कार्यप्रणाली और प्राथमिकताओं का आईना?
लंबित आवेदन और अचानक निर्णय
पूर्व महापौर धीरज बाकलीवाल के कार्यकाल में साहू समाज द्वारा “कर्मा माता चौक” और राजस्थानी ब्राह्मण समाज द्वारा “परशुराम चौक” नामकरण के लिए आवेदन दिए गए थे। दोनों प्रस्ताव एमआईसी में लंबित रहे। इसके अतिरिक्त, समीप निर्माणाधीन जगन्नाथ मंदिर को देखते हुए “जगन्नाथ चौक” नाम की भी चर्चा थी।
लेकिन परिषद के औपचारिक निर्णय से पहले ही गंजपारा चौक को “महेश चौक” के रूप में संबोधित किए जाने की खबर सामने आई। कार्यक्रम में राम रसोई के संरक्षक चतुर्भुज राठी की उपस्थिति ने इस पूरे घटनाक्रम को और राजनीतिक रंग दे दिया।
सवालों के घेरे में शहरी सरकार
वर्तमान महापौर अलका बाघमार ने पूर्व सरकार की त्रुटियों को सुधारने का संकल्प लेकर पदभार संभाला था। शपथ ग्रहण के समय निष्पक्षता और पारदर्शिता की जो बात कही गई थी, वह अब गंजपारा चौक के नामकरण प्रकरण में सवालों के घेरे में है।
यदि परिषद द्वारा अब तक औपचारिक निर्णय नहीं हुआ, तो “महेश चौक” नाम की घोषणा किस अधिकार से और किस प्रक्रिया के तहत हुई?
क्या यह निर्णय प्रशासनिक प्रक्रिया से गुजरकर लिया गया, या फिर प्रभावशाली वर्गों के दबाव में जल्दबाजी में?
राम रसोई और दोहरे मापदंड का आरोप
बस स्टैंड स्थित राम रसोई के अनुबंध को लेकर भी पूर्व में अनियमितताओं की चर्चा रही है। स्वयं महापौर ने पूर्व सरकार की गलतियों का उल्लेख करते हुए दूरी बनाई थी। किंतु वर्तमान कार्यकाल में भी अनुबंध की शर्तों के पालन पर सवाल उठ रहे हैं। इसके बावजूद संचालन जारी है और निगम की प्रेस विज्ञप्ति में संचालक को “समाजसेवी” के रूप में प्रस्तुत किया जाना विरोधाभास पैदा करता है।
यही कारण है कि गंजपारा चौक के नामकरण को लेकर यह धारणा बल पकड़ रही है कि कहीं न कहीं प्रभावशाली और संपन्न वर्ग की आवाज़ अन्य समाजों की अपेक्षा अधिक प्रभावी रही।
भावनाएँ बनाम राजनीति
साहू समाज, राजस्थानी ब्राह्मण समाज और उड़िया समाज की ओर से लंबे समय से चली आ रही मांगों पर विचार न करते हुए अचानक एक नाम को आगे बढ़ाना सामाजिक संतुलन पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है। शहर की विविध सामाजिक संरचना में संतुलन बनाए रखना शहरी सरकार की जिम्मेदारी है।
नामकरण मात्र औपचारिकता नहीं—यह भावनाओं, पहचान और सम्मान का विषय होता है। ऐसे में यदि प्रक्रिया पारदर्शी न हो, तो अविश्वास जन्म लेता है।
निष्पक्षता की कसौटी पर बाघमार सरकार
पिछले एक वर्ष में कई ऐसे प्रसंग सामने आए हैं, जिनमें शहरी सरकार की कार्यप्रणाली को लेकर आलोचना हुई है। गंजपारा चौक प्रकरण ने इन चर्चाओं को और हवा दे दी है।
क्या यह निर्णय प्रशासनिक पारदर्शिता के तहत हुआ?
क्या परिषद की सहमति ली गई?
क्या सभी समाजों की भावनाओं का सम्मान किया गया?
इन सवालों के जवाब अभी भी स्पष्ट नहीं हैं।
गंजपारा चौक का नाम चाहे जो भी हो, शहर की जनता निष्पक्ष और पारदर्शी शासन की अपेक्षा रखती है। यदि निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट और सर्वसम्मति से हो, तो विवाद की गुंजाइश कम होती है। लेकिन यदि जल्दबाजी और प्रभाव का आरोप लगे, तो चर्चा का बाजार गर्म होना स्वाभाविक है।
अब देखना होगा कि शहरी सरकार इन उठते सवालों का जवाब कैसे देती है—और क्या निष्पक्षता की कसौटी पर स्वयं को सिद्ध कर पाती है, या यह प्रकरण भी राजनीतिक गलियारों में एक और बहस बनकर रह जाएगा।
रायपुर। छत्तीसगढ़ की परती भूमि अब सोना उगलने लगी है। धान का कटोरा कहे जाने वाले इस राज्य में किसानों का रुझान राई-सरसों की खेती की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इससे न केवल किसानों को अतिरिक्त आमदनी मिलना शुरू हुई है, बल्कि देश को खाद्य तेल में आत्मनिर्भर बनाने की राह भी आसान होती नजर आ रही है। बता दें कि यहां के किसान धान कटाई के बाद खेतों को खाली छोड़ देते हैं, यानी रबी फसल की बुवाई नहीं करते हैं।
इस कारण उनकी आर्थिक स्थिति ज्यादा अच्छी नहीं है। किसानों के इन हालातों को देखते हुए आईसीएआर-राष्ट्रीय जैविक स्ट्रेस प्रबंधन संस्थान, रायपुर ने ठोस रोडमैप के साथ प्रयास शुरू किए। परिणामस्वरूप परती भूमि पर अब सरसों की फसल लहलहाने लगी है। संस्थान के वैज्ञानिकों का कहना है कि राज्य की भूमि में खजाना छिपा हुआ है। यदि किसान धान कटाई के बाद देर से पकने वाली राई-सरसों किस्मों की बुवाई करें तो उनकी आर्थिक स्थिति में असम के किसानों के समान बदलाव देखने को मिल सकता है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में कुल कृषि क्षेत्र 4.78 मिलियन हेक्टेयर है। इसमें केवल 23 प्रतिशत क्षेत्र सिंचित है। वार्षिक वर्षा लगभग 1190 मिमी है, जिसमें लगभग 88 प्रतिशत वर्षा मानसून (मध्य जून से सितंबर) के दौरान होती है। इस दौरान किसान धान का बड़े पैमाने पर उत्पादन लेते हैं। वहीं रबी में गेहूं और थोड़े क्षेत्रफल में दलहनों की बुवाई करते हैं, लेकिन राई-सरसों का उत्पादन हाशिए पर है। वैज्ञानिकों का कहना है कि परती भूमि, बस्तर के पठारी और उत्तरी पहाड़ी क्षेत्रों में राई-सरसों की खेती की अच्छी संभावनाएं हैं। उन्होंने बताया कि संस्थान का यह शुरुआती प्रयास है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आए हैं।
उन्होंने बताया कि धान कटाई के बाद कृषि भूमि परती रह जाती है, जिससे प्राकृतिक संसाधनों का पूर्ण उपयोग नहीं हो पाता और किसानों की आय बढ़ाने के अवसर सीमित हो जाते हैं। राई-सरसों की फसल परती भूमि को उत्पादक बनाने में मददगार बन सकती है।
परती भूमि की चुनौती
छत्तीसगढ़ में लगभग 3.9 मिलियन हेक्टेयर में धान की खेती होती है, जबकि धान उत्पादन लगभग 9.8 मिलियन टन है। खरीफ में अधिक वर्षा और चिकनी मिट्टी के कारण धान का उत्पादन भरपूर होता है, लेकिन रबी में यही खेती सीमित रह जाती है। धान के कुल क्षेत्र का लगभग 32 प्रतिशत भाग ही सिंचित है, जिससे कटाई के बाद पठारी और पहाड़ी क्षेत्रों के लगभग 40–60 प्रतिशत खेत परती रह जाते हैं। इस स्थिति में राई-सरसों का बुवाई क्षेत्र बढ़ाया जा सकता है।
31 हजार हेक्टेयर में खेती
संस्थान के संयुक्त निदेशक डॉ. पंकज शर्मा ने बताया कि यहां की जलवायु रबी तिलहन के लिए अनुकूल है, बशर्ते खरीफ के बाद मृदा में नमी का संरक्षण और उचित कृषि तकनीकों का प्रभावी उपयोग किया जाए। क्योंकि राई-सरसों को कम पानी में उगाया जा सकता है और यह कम समय में पक जाती है।
गौरतलब है कि छत्तीसगढ़ में महज 31 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में सरसों की खेती होती है। करीब 17,260 टन उत्पादन और उत्पादकता 563 किग्रा प्रति हेक्टेयर है, जिसे वैज्ञानिक तकनीकों के समावेश से और बढ़ाया जा सकता है।
20 प्रतिशत ज्यादा उपज
उन्होंने बताया कि अनुसंधान परीक्षण के आधार पर धान के परती खेतों में राई-सरसों की अच्छी पैदावार मिलती है। इस फसल की लगभग 20 प्रतिशत अधिक पैदावार प्राप्त हुई है। प्रदर्शन के दौरान सरसों की किस्म डीआरएमआर-150-35 ने उत्साहजनक परिणाम दिए। यह किस्म 95–110 दिनों में पक जाती है, जिससे धान की कटाई के बाद मध्य नवंबर से दिसंबर के प्रथम सप्ताह तक इसकी बुवाई सहजता से की जा सकती है। इसके अलावा किसान छत्तीसगढ़ सरसों, टीबीएम, एनआरसीएचबी-101 और बीबीएम-1 जैसी किस्मों का उपयोग कर सकते हैं।
किसानों को आजीविका सुरक्षा
धान परती क्षेत्रों में राई-सरसों को शामिल करने से किसानों की आय और आजीविका सुरक्षा में उल्लेखनीय सुधार संभव है। वर्षा आधारित धान पारिस्थितिकी तंत्र में किए गए प्रदर्शनों से यह सिद्ध हुआ है कि शून्य जुताई के तहत राई-सरसों से 8–14 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त की जा सकती है। इससे प्रति हेक्टेयर 27 हजार रुपये से अधिक का शुद्ध लाभ प्राप्त होता है। साथ ही सरसों के साथ मधुमक्खी पालन करके किसान अपनी आमदनी को और भी बढ़ा सकते हैं।
छत्तीसगढ़ में राई-सरसों की खेती किसानों को त्रिस्तरीय लाभ दे सकती है, जिसमें आय वृद्धि, परती भूमि का उपयोग और खाद्य तेल उत्पादन में बढ़ोतरी शामिल है। इस फसल से राज्य के कृषि परिदृश्य को बदला जा सकता है। इस फसल पर अनुसंधान के काफी उत्साहजनक परिणाम सामने आए हैं।
डॉ. पी.के. राय, निदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद –राष्ट्रीय जैविक तनाव प्रबंधन संस्थान
साभार - लेखक सौरभ गर्ग
महंगाई देश के सबसे अहम आर्थिक संकेतकों में से एक है, जिसे आम लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सीधे महसूस करते हैं, जैसे घर का राशन, किराया और पेट्रोल-डीज़ल के खर्च में बढ़ोतरी से।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) इसी महंगाई को मापता है। यह उन चीज़ों और सेवाओं के दाम देखता है, जिनका इस्तेमाल आम परिवार रोज़ करता है। सरल शब्दों में, सीपीआई आम आदमी की ज़िंदगी का आईना है। यह बताता है कि थाली में खाने का खर्च कितना बढ़ा, घर का किराया कितना हुआ, और काम पर जाने के लिए ईंधन कितना महंगा हुआ।
सीपीआई भले ही एक आंकड़ा लगता हो, लेकिन यह सरकार को यह समझने में मदद करता है कि लोगों पर महंगाई का असली असर क्या है। इसी आधार पर वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े फैसले किए जाते हैं, ताकि ज़रूरी चीज़ें आम लोगों की पहुंच में बनी रहें।
भारतीय रिज़र्व बैंक भी ब्याज दर और महंगाई को नियंत्रित करने जैसे फैसलों के लिए सीपीआई आधारित महंगाई को ही सबसे मुख्य पैमाना मानता है। इसलिए जब सीपीआई ज़मीन की हकीकत सही तरीके से दिखाता है, तब सरकार और आरबीआई की नीतियाँ भी लोगों की असली परेशानियों के अनुसार बेहतर बन पाती हैं।
महंगाई सिर्फ दाम बढ़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह भी है कि दामों में बदलाव से घर के बजट पर कितना असर पड़ता है। इसलिए जितना ज़रूरी दामों को मापना है, उतना ही ज़रूरी यह भी है कि महंगाई का सूचकांक लोगों की आज की खर्च करने की आदतों को सही तरीके से दिखाए। इसी संदर्भ में भारत में सीपीआई के आधार वर्ष को 2012 से बदलकर 2024 किया जा रहा है।
पिछली बार आधार बदले जाने के बाद देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बदलाव आया है। शहरों की आबादी बढ़ी है, सेवाओं का क्षेत्र बढ़ा है, डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण खरीदारी का तरीका बदला है और घरों का खर्च अब कई नई चीजों पर होने लगा है।
इसीलिए नया सीपीआई 2024 तैयार करने में 2023-24 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
समय के साथ लोगों की ज़रूरतें और खर्च बदलते हैं, इसलिए सीपीआई में अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं को दी जाने वाली अहमियत भी बदली गई है। जिन चीजों पर अब परिवार ज़्यादा खर्च करते हैं, उन्हें सीपीआई में ज़्यादा महत्व दिया गया है,
और जिन पर खर्च कम हो गया है, उन्हें कम महत्व दिया गया है।
इससे सीपीआई वही महंगाई दिखाता है, जो सच में आम परिवार के बजट को प्रभावित करती है। साथ ही, उपभोग की टोकरी (कंजम्पशन बास्केट) को भी बदला गया है, ताकि सेवाओं पर बढ़ते खर्च जैसे नए रुझान दिखाई दे सकें, जो बढ़ती आय और बदलती जीवनशैली की वजह से बढ़ रहे हैं। सीपीआई को मापने का तरीका अपडेट करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना यह तय करना कि उसमें क्या-क्या शामिल किया जाए।
नया संशोधित सीपीआई अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के ज्यादा करीब है, लेकिन इसमें भारत से जुड़ी खास बातें भी बनी हुई हैं। इससे भारत की महंगाई की तुलना दूसरे देशों से करना आसान हो जाता है।
आम परिवार के लिए इसका मतलब यह है कि सरकार और नीति बनाने वाले लोग यह बेहतर समझ पाते हैं कि भारत में दामों में होने वाला बदलाव दुनिया के हालात से कैसे जुड़ा है, और साथ ही यह भी ध्यान रहता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ रहा है।
सीपीआई के लिए आंकड़े जुटाने का तरीका भी अब लोगों की बदलती खरीदारी और खर्च की आदतों के अनुसार बेहतर बनाया गया है। जहां पहले की तरह बाजारों से दाम इकट्ठा किए जाते रहेंगे, खासकर खाने-पीने और ज़रूरी चीज़ों के, वहीं 2024 के नए ढांचे में अब कुछ सेवाओं के ऑनलाइन दाम भी शामिल किए जा रहे हैं। जैसे मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं, हवाई टिकट और कुछ अन्य सेवाओं के दाम अब ऑनलाइन स्रोतों से भी लिए जाएंगे।
नई सीपीआई श्रृंखला में अब कंप्यूटर की मदद से दाम इकट्ठा किए जा रहे हैं। इससे हाथ से होने वाली गलतियाँ कम हुई हैं और तुरंत जाँच भी हो जाती है। इससे दामों से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता और समय पर उपलब्धता दोनों बेहतर हुई हैं। सीपीआई के आंकड़े सही और समय पर मिलना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इसी के आधार पर ऐसे फैसले होते हैं, जो सीधे आम आदमी की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं, जैसे कर्ज कितना महंगा होगा, बचत पर कितना ब्याज मिलेगा, और बढ़ती महंगाई से घर का बजट कैसे प्रभावित होगा।
नए आधार वर्ष की सीपीआई में अब कई मामलों में सरकारी स्रोतों से मिलने वाले आधिकारिक आंकड़ों का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे रेल किराया, डाक शुल्क, ईंधन के दाम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बिकने वाली चीजें। इससे इन दामों को पहले से ज्यादा सही तरीके से दर्ज किया जा रहा है और बाजार सर्वे में होने वाली गलती या पक्षपात की संभावना भी कम हो जाती है।
अब सर्वे के आंकड़े, सरकारी रिकॉर्ड और डिजिटल माध्यमों से मिलने वाले दाम, तीनों को मिलाकर सीपीआई तैयार की जा रही है। यह पुरानी व्यवस्था की तुलना में बड़ा सुधार है और इससे दामों में होने वाले बदलाव की ज्यादा भरोसेमंद तस्वीर मिलती है।
इतने बड़े स्तर पर सीपीआई के आधार वर्ष में बदलाव करना एक बहुत बड़ा संस्थागत प्रयास होता है। इसमें देश भर के फील्ड दफ्तरों, सांख्यिकी विभागों और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ संस्थाओं के बीच तालमेल जरूरी होता है। इस पूरी प्रक्रिया में मेथडोलॉजी की गहराई से जाँच की जाती है, अलग-अलग विकल्पों को परखा जाता है और अर्थशास्त्रियों व विषय-विशेषज्ञों से सलाह ली जाती है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने विशेषज्ञ समूहों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अन्य संबंधित पक्षों से बातचीत की है, ताकि किए गए बदलाव साफ, समझने में आसान और वैज्ञानिक रूप से सही हों।
टोकरी, वेटेज और आंकड़ों के स्रोत बदलने के बाद भी सीपीआई का मूल उद्देश्य वही रहता है-यानी एक परिवार की नज़र से दामों में होने वाले बदलाव को दिखाना। यह निरंतरता इसलिए ज़रूरी है, ताकि हम समय के साथ महंगाई की तुलना कर सकें।
सीधे शब्दों में, सीपीआई को बेहतर बनाया जा रहा है, लेकिन उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़कर ही रखा गया है, ताकि वह नीति बनाने वालों के लिए एक भरोसेमंद मार्गदर्शक बना रहे।सीपीआई हमें यह याद दिलाता है कि हर आंकड़े के पीछे करोड़ों लोगों की असली ज़िंदगी छिपी होती है। आखिरकार, आंकड़े लोगों के लिए ही होते हैं। यह चुपचाप यह दिखाता है कि दामों में बदलाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कैसे प्रभावित करता है और सरकार की नीतियों को दिशा देता है।
आधार वर्ष में चल रहे संशोधन के ज़रिये सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने यह सुनिश्चित किया है कि सीपीआई सही, समय के अनुसार अपडेट और लंबे समय तक एक-जैसे तरीके से मापा गया रहे। ताकि सीपीआई सिर्फ एक संख्या न होकर, पूरे देश के लोगों की असली ज़िंदगी की सच्चाई दिखाने वाला आईना बना रहे।
(लेखक सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव हैं, यह उनके निजी विचार हैं)
व्यापार केवल आयात–निर्यात का खेल नहीं होता, वह राष्ट्रों की रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक हैसियत और भविष्य की दिशा तय करता है।
3 फरवरी 2026 को अमेरिका और भारत के बीच हुआ नया व्यापार समझौता इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।
यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में लगाए गए 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय निर्यात की रीढ़ तोड़ दी थी। उस पृष्ठभूमि में 18 प्रतिशत पर पहुँचना निश्चित रूप से राहत है—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भारत की जीत है, या हालात के आगे झुककर निकाला गया रास्ता?
इस समझौते के बाद अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क पूरी तरह हट गया है और पारस्परिक टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।
कपड़ा, रत्न-आभूषण, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह जीवनदान से कम नहीं।
लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
2024 तक यही टैरिफ मात्र 3 प्रतिशत के आसपास था।
इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत आज भी उस स्थिति से नीचे खड़ा है, जहाँ वह दो साल पहले था।
संपादकीय दृष्टि से इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि टैरिफ 18 प्रतिशत हुआ,
बल्कि यह है कि भारत 50 प्रतिशत के दंडात्मक व्यापार युद्ध से बाहर निकल पाया।
2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब व्यापार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।
ऐसे माहौल में भारत का समझौते की मेज़ पर लौटना एक व्यावहारिक निर्णय था।
यह समझौता भारत को एक ऐसे लाभकारी मोड़ पर ले आया है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती—
चीन पर आज भी 30–35% या उससे अधिक अमेरिकी टैरिफ लागू है
वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर लगभग 20% शुल्क है
जबकि भारत अब 18% पर है
यह स्थिति भारतीय निर्यात को अमेरिकी बाज़ार में स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है।
यह बढ़त 2024 में भारत के पास नहीं थी।
हर समझौते की एक कीमत होती है—और यह डील भी अपवाद नहीं।
भारत ने:
रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे बंद करने
अमेरिकी LNG और तकनीक के आयात बढ़ाने
तथा लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता ली है
यह सब भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ा सकता है।
सस्ती ऊर्जा छोड़कर महँगे विकल्प अपनाना, अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।
यह समझौता भारत की उस रणनीतिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करता है,
जिस पर वह लंबे समय से गर्व करता आया है।
क्या वैश्विक दबावों के सामने भारत को बार-बार आर्थिक रियायतें देनी पड़ेंगी?
और क्या भविष्य में व्यापारिक फैसले विदेश नीति के दबाव में लिए जाते रहेंगे?
इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं।
यह कहना गलत होगा कि भारत इस समझौते में हार गया।
यह कहना भी सच नहीं होगा कि भारत ने सब कुछ जीत लिया।
सच्चाई यह है कि—
भारत ने टकराव के दौर से निकलकर समझौते का रास्ता चुना है।
यह रास्ता महँगा है, समझौतों से भरा है,
लेकिन वैश्विक व्यापार की वर्तमान वास्तविकताओं में
शायद यही सबसे व्यावहारिक विकल्प भी था।
अब चुनौती यह है कि भारत इस मिली हुई प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को
निर्यात विस्तार, घरेलू उद्योग संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा में बदल पाए—
वरना यह समझौता केवल राहत बनकर रह जाएगा, उपलब्धि नहीं।
lwriter - श्री पंकज जोशी
कुशल शासन की दिशा में भारत की यात्रा अक्सर एक विशाल संघीय ढांचे के तहत कार्यान्वयन से जुड़ी विभिन्न चुनौतियों को रेखांकित करती है। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा 2015 में स्थापित ‘प्रगति’ [सक्रिय शासन और समयबद्ध कार्यान्वयन (प्रो-एक्टिव गवर्नेंस एंड टाइमली इम्प्लीमेंटेशन)] नामक पहल, नौकरशाही की पेचीदगियों को दूर करने के एक शक्तिशाली तंत्र के रूप में कार्य करती है। एक ओर जहां यह विभिन्न राष्ट्रीय परियोजनाओं को गति प्रदान करती है, वहीं इसका प्रभाव शायद राज्य स्तर पर सबसे अधिक स्पष्ट होता है। आर्थिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण विशिष्ट क्षेत्रीय परियोजनाओं की सटीक निगरानी राज्य स्तर पर की जाती है। गुजरात में, ‘प्रगति’ के तहत की गई समीक्षाओं ने बुनियादी ढांचे, ऊर्जा तथा सामाजिक कल्याण से जुड़ी प्रमुख परियोजनाओं में आने वाली अड़चनों को व्यवस्थित रूप से दूर किया है और सहकारी संघवाद के एक मजबूत मॉडल को मूर्त रूप दिया है।
‘प्रगति’ ने न सिर्फ समीक्षा के एक मंच, बल्कि एक पूर्वानुमानित शासन के रूप में भी कार्य किया है। महीने की शुरुआत में अग्रिम रूप से एजेंडा का वितरण राज्य के संबंधित विभागों, जिला प्रशासन और कार्यान्वयन एजेंसियों की केन्द्रित भागीदारी को बढ़ावा देने में सहायक रहा। सक्रिय अनुवर्ती कार्रवाई के परिणामस्वरूप, ‘प्रगति’ की निर्धारित बैठकों से पहले ही कई समस्याओं का निराकरण हो गया। लिहाजा, ऐसे एजेंडा मदों को अंतिम समीक्षा से हटा दिया गया। यह उच्चस्तरीय हस्तक्षेप से पहले ही राज्य स्तर पर उनके समाधान को दर्शाता है।
राज्य-आधारित तेजी हेतु एक डिजिटल समन्वय
‘प्रगति’ की सफलता का मूल राज्य और केन्द्रीय प्रशासन के शीर्ष स्तरों को जवाबदेही-आधारित एक ही डिजिटल प्लेटफॉर्म पर लाने की इसकी क्षमता में निहित है। हर महीने, यह इंटरफ़ेस उन परियोजनाओं की विस्तृत समीक्षा को संभव बनाता है जो अंतर-विभागीय मतभेदों या भूमि अधिग्रहण संबंधी अड़चनों की वजह से रुक सकती हैं।
रणनीतिक विकास हेतु विभागीय सीमाओं को तोड़ना: दिल्ली मुंबई औद्योगिक गलियारा (डीएमआईसी)
डीएमआईसी को सीधे प्रधानमंत्री की समीक्षा के अधीन रखकर, ‘प्रगति’ ने धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्रीय विकास प्राधिकरण, विभिन्न केन्द्रीय मंत्रालयों और निजी हितधारकों से जुड़ी समस्याओं पर वास्तविक समय में चर्चा किया जाना सुनिश्चित किया। इस प्रक्रिया ने निर्णय लेने की कवायद को गति दी, नौकरशाही में व्याप्त लालफीताशाही को कम किया और सभी संबंधित पक्षों को स्पष्ट व समयबद्ध दिशा-निर्देश प्रदान किए, जिससे भारत के औद्योगिक भविष्य की बुनियाद मानी जाने वाली इस परियोजना को गति मिली।
‘प्रगति’ के तहत होने वाली समीक्षाओं ने धोलेरा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और अहमदाबाद-धोलेरा एक्सप्रेसवे के बुनियादी ढांचे के समयबद्ध विकास को सुनिश्चित किया है। यह 109 किलोमीटर लंबी एक महत्वपूर्ण ग्रीनफील्ड परियोजना है, जिसे अहमदाबाद को धोलेरा विशेष निवेश क्षेत्र (एसआईआर) से जोड़ने के उद्देश्य से डिजाइन किया गया है। सेमीकंडक्टर निर्माण संयंत्र हेतु कुल 91,000 करोड़ रुपये के मुख्य परियोजना निवेश के साथ, यह इलाका भारत का सेमीकंडक्टर हब बनने के लिए तैयार है और यहां देश के पहले स्वदेशी चिप्स का उत्पादन होगा। इस राज्य की सीमाओं के भीतर संचालित होने वाली ऐसी उच्च-मूल्य वाली केन्द्रीय परियोजनाएं उस ‘प्रगति’ तंत्र का हिस्सा बनने की आदर्श हकदार हैं, जो राज्य के कार्यान्वयन और राष्ट्रीय दृष्टिकोण के बीच तालमेल सुनिश्चित करती हैं।
गुजरात की हरित ऊर्जा क्रांति को गति
गुजरात नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में अग्रणी है और ‘प्रगति’ इसकी विशाल क्षमता को मूर्त रूप देने में अहम भूमिका निभा रही है। बड़े पैमाने की विविध सौर एवं पवन परियोजनाएं इस लक्ष्य को रेखांकित करती हैं। कुल 1200 मेगावाट क्षमता वाली खावड़ा सौर पीवी परियोजना (6284 करोड़ रुपये) और 1255 मेगावाट क्षमता वाली खावड़ा सौर पीवी परियोजना (7180 करोड़ रुपये) इस पहल की प्रमुख घटक हैं। कुल 300 मेगावाट क्षमता वाली भुज सौर पीवी परियोजना (1443 करोड़ रुपये) और खावड़ा नवीकरणीय ऊर्जा पार्क से अतिरिक्त 7 गीगावाट बिजली की निकासी से संबंधित पारेषण प्रणाली (4231 करोड़ रुपये) की भी समीक्षा की गई। इस समीक्षा में ऊर्जा, राजस्व और वन एवं पर्यावरण विभागों ने भाग लिया।
इस प्लेटफॉर्म की व्यवस्थित निगरानी प्रणाली राज्य के विभिन्न विभागों और केन्द्रीय संस्थाओं के बीच निर्बाध समन्वय सुनिश्चित करती है, जोकि भूमि और पर्यावरण संबंधी जटिल मंजूरियों की जरूरत वाली परियोजनाओं के लिए बेहद अहम है।
सरदार सरोवर कमान क्षेत्र के विकास को सुव्यवस्थित करना
सरदार सरोवर परियोजना (एसएसपी) और व्यापक राष्ट्रीय सिंचाई परियोजनाओं के संदर्भ में, माननीय प्रधानमंत्री द्वारा ‘प्रगति’ के तहत की गई समीक्षा पारंपरिक बाढ़ सिंचाई से हटकर सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों की दिशा में बदलाव में निर्णायक कारक साबित हुई है। ‘प्रगति’ के नीति निर्देशों के अनुसार, ड्रिप और स्प्रिंकलर जैसी सूक्ष्म सिंचाई प्रणालियों का परियोजना अनुमोदन और वित्तपोषण अनिवार्य कर दिया गया। साथ ही, सरदार सरोवर परियोजना, जिसे जल संकट को दूर करने में इसकी भूमिका के कारण अक्सर गुजरात की जीवनरेखा कहा जाता है, ने ‘प्रगति’ के तहत होने वाली समीक्षाओं के परिणामस्वरूप भूमिगत पाइपलाइन (यूजीपीएल) प्रणाली को अपनाया। पारंपरिक खुली नहरों से हटकर हुए इस बदलाव का उद्देश्य जल संरक्षण, भूमि विखंडन को कम करने और निर्माण में लगने वाले समय को घटाकर दक्षता एवं जलापूर्ति को बेहतर बनाना था।
बुनियादी ढांचे से परे: सामाजिक दायित्व
‘प्रगति’ का दायरा भौतिक बुनियादी ढांचे से कहीं आगे जाता है। यह पहल समाज कल्याण की प्रमुख योजनाओं के कार्यान्वयन की निगरानी करने और अंतिम छोर तक उनकी सुलभता सुनिश्चित करने में भी समान रूप से प्रभावी है।
* प्रधानमंत्री-आयुष्मान भारत स्वास्थ्य अवसंरचना मिशन (पीएम-अभीम): स्वास्थ्य संबंधी इस महत्वपूर्ण पहल की समयबद्ध और प्रभावी कवरेज सुनिश्चित करने हेतु निगरानी की गई। नागरिकों को मिलने वाले प्रमुख लाभ हैं: उन्नत आयुष्मान आरोग्य मंदिरों (एएएम) के जरिए स्वास्थ्य सेवा तक बेहतर पहुंच; देखभाल की बेहतर गुणवत्ता; वित्तीय बोझ में कमी; आईटी-आधारित रोग निगरानी प्रणाली तथा प्रयोगशालाओं के नेटवर्क के विकास द्वारा महामारी से निपटने की बेहतर तैयारी एवं प्रतिक्रिया; व्यापक प्राथमिक देखभाल; और डिजिटल स्वास्थ्य एकीकरण।
* पीएम स्कूल्स फॉर राइजिंग इंडिया (पीएमश्री): स्कूली अवसंरचना के आधुनिकीकरण की दृष्टि से महत्वपूर्ण इस योजना की प्रगति की समीक्षा ‘प्रगति’ के जरिए की जाती है। परिणामस्वरूप, गुजरात के 448 सरकारी स्कूलों में स्कूल अवसंरचना का तेजी से उन्नयन हो रहा है।
* “लखपति दीदी” योजना: ग्रामीण विकास के जरिए महिला सशक्तिकरण के उद्देश्य से शुरू की गई इस महत्वपूर्ण पहल की निगरानी भी ‘प्रगति’ प्लेटफॉर्म पर की जाती है। गुजरात में 6 लाख से अधिक लखपति दीदियों को कौशल विकास, वित्तीय समावेशन, डिजिटल साक्षरता और बाजार के संपर्क जैसे विभिन्न उपायों के जरिए स्थायी आय प्राप्त हो रही है।
शीर्ष स्तर पर इन योजनाओं की समीक्षा करके, ‘प्रगति’ जवाबदेही तय करती है और गुजरात के लक्षित लाभार्थियों को समय पर सरकारी सेवाएं सुलभ होना सुनिश्चित करती है।
गुजरात का सशक्तिकरण: प्रगति के जरिए भारत सरकार का परिवर्तनकारी समर्थन
राष्ट्रीय स्तर पर प्रगति की सफलता के बाद, गुजरात सरकार ने शिकायतों एवं परियोजनाओं के प्रबंधन हेतु एक उन्नत प्रणाली के रूप में ‘स्वागत 2.0’ की शुरुआत की। यह ऑटो एस्केलेशन मैट्रिक्स से लैस है, जो महत्वपूर्ण बाधाओं से संबंधित ‘प्रगति’ की व्यवस्थित एस्केलेशन प्रणाली पर आधारित है। ‘प्रगति’ की परियोजना निगरानी संबंधी खूबियों से प्रेरित, संशोधित ‘स्वागत’ में अब समर्पित निगरानी और प्रदर्शन डैशबोर्ड शामिल हैं। ये डैशबोर्ड मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) को अधिकारियों की व्यक्तिगत कार्यकुशलता का आकलन करने और उन जिलों की पहचान करने में सक्षम बनाते हैं जहां बड़ी संख्या में अनसुलझी शिकायतें हैं। परियोजना संबंधी समीक्षाओं के जरिए प्रणालीगत सुधार लाने की ‘प्रगति’ की क्षमता की तरह, नई ‘स्वागत’ प्रणाली डैशबोर्ड डेटा का उपयोग करके बार-बार उभरने वाली उन समस्याओं की पहचान करती है जिनके लिए सिर्फ शिकायत समाधान के बजाय नीति-स्तर पर बदलाव की जरूरत होती है। ‘स्वागत 2.0’ के जरिए, गुजरात के मुख्यमंत्री व्यक्तिगत रूप से मासिक रूप से जटिल मामलों - जैसे आवास परियोजनाएं और बुनियादी ढांचे में देरी - की समीक्षा करते हैं और समाधान के लिए सख्त व समयबद्ध निर्देश जारी करते हैं, जो ‘प्रगति’ के “समयबद्ध कार्यान्वयन” के मूल उद्देश्य का अभिन्न अंग है।
गुजरात की उल्लेखनीय विकास यात्रा माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रदान किए गए दूरदर्शी समर्थन और सहयोगात्मक नेतृत्व का उत्कृष्ट प्रमाण है। ‘प्रगति’ नामक एक अग्रणी कदम के जरिए, केन्द्र सरकार ने इस राज्य को अमूल्य सहयोग प्रदान किया है। इससे इस राज्य को अपनी पूरी क्षमता का दोहन करने हेतु आवश्यक तकनीकी अवसंरचना और रणनीतिक मार्गदर्शन हासिल हुआ है।
(लेखक आईएएस (सेवानिवृत्त), जीईआरसी के अध्यक्ष/गुजरात के पूर्व मुख्य सचिव हैं)
✍️ शौर्यपथ लेख:
दुर्ग की धरती पर आज एक ऐसी घटना घटी, जिसने यह साबित कर दिया कि अगर सत्ता में बैठा व्यक्ति संवेदनशील हो, तो वह सिर्फ आदेश नहीं देता, बल्कि किसी का भविष्य भी संवार देता है।
महर्षि दयानंद स्कूल का 8 वर्षीय छात्र ओजश चक्रधारी… उम्र इतनी कम कि सपनों की दुनिया अभी रंग भरना सीख ही रही थी। लेकिन अचानक फीस न भर पाने की मजबूरी ने उसके सपनों पर ताला जड़ दिया। स्कूल से बाहर कर दिए जाने की टीस जब एक मासूम दिल तक पहुँची, तो वह रोते हुए अपनी माँ विजयी लक्ष्मी से बस इतना कह सका—
“माँ, मैं पढ़ना चाहता हूँ…”
माँ के लिए इससे बड़ा दर्द और क्या हो सकता है? बेटे के भविष्य की चिंता लिए वह सेवा सदन मंत्री गजेंद्र यादव के पास पहुँचीं। यह मुलाकात किसी औपचारिकता की नहीं थी, यह एक माँ की आख़िरी उम्मीद थी।
मंत्री गजेंद्र यादव ने न सिर्फ पूरे मामले को ध्यान से सुना, बल्कि उसी क्षण यह साबित कर दिया कि संवेदनशीलता आज भी राजनीति में ज़िंदा है। उन्होंने तुरंत स्कूल प्रबंधन से फोन पर बात की और दो टूक शब्दों में कहा—
“बच्चे की फीस मैं भरूंगा, लेकिन उसकी पढ़ाई नहीं रुकनी चाहिए।”
यह सिर्फ फीस भरने का निर्णय नहीं था, यह एक बच्चे के आत्मविश्वास को वापस देने का संकल्प था। वह एक वाक्य—
“मैं हूँ ना, चिंता क्यों करते हो”
ओजश और उसके परिवार के लिए किसी वरदान से कम नहीं था।
जब यही शब्द प्रदेश के स्कूल शिक्षा मंत्री के मुख से निकलते हैं, तो वे सिर्फ आश्वासन नहीं रहते, बल्कि पीड़ित व्यक्ति के भीतर ऐसा आत्मबल भर देते हैं, जो जीवन की दिशा बदल देता है। एक पल में डर, निराशा और असहायता—आशा और विश्वास में बदल जाती है।
इस संवेदनशील पहल ने समाज को यह संदेश दिया कि शिक्षा कोई विशेषाधिकार नहीं, बल्कि हर बच्चे का अधिकार है, और कोई भी बच्चा सिर्फ आर्थिक कारणों से अपने सपनों से दूर नहीं किया जा सकता।
आज ओजश की आँखों में फिर से पढ़ाई की चमक है, उसकी माँ के चेहरे पर सुकून है, और समाज के सामने एक उदाहरण है—
कि जब जनप्रतिनिधि दिल से सोचते हैं, तब शासन सिर्फ व्यवस्था नहीं, बल्कि सहारा बन जाता है।
यह कहानी सिर्फ एक बच्चे की नहीं, बल्कि उस “मैं हूँ ना” की है, जो किसी के जीवन में उजाला भर देता है। ?
(एक संपादकीय दृष्टि)
कैसे स्वीकार कर लूँ कि विकास की वीरांगना हैं दुर्ग नगर निगम की महापौर श्रीमती अलका बाघमार?
यह अलग बात है कि 31 जनवरी को महापौर श्रीमती अलका बाघमार का जन्मदिन है और समर्थकों द्वारा अतिशयोक्ति से भरे पोस्टर शहर भर में लगाए जा रहे हैं। राजनीतिक दल से जुड़ी होने के कारण यह उनका राजनीतिक धर्म भी हो सकता है, लेकिन प्रश्न यह है कि शहर की जनता इन पोस्टरों पर आखिर किस आधार पर विश्वास करे?
कचरे, बदबू और बदहाली का विकास मॉडल
शहर के मध्य सुराना कॉलेज के सामने कचरों का अंबार और उससे उठती दुर्गंध आज भी जनता को मुंह ढकने पर मजबूर कर रही है। भारतीय जनता पार्टी के ही शासनकाल में बनी चौपाटी आज बदहाली की मिसाल बन चुकी है।
सड़कों पर अवैध बाजार लगातार अपने आकार का विस्तार कर रहा है। बस स्टैंड क्षेत्र में संचालित राम रसोई सड़क पर कब्जा कर खुलेआम व्यापार कर रही है। व्यापार में नफा हो या नुकसान—वह अलग विषय है—लेकिन तथ्य यह है कि व्यापार जारी है, और वह भी शहरी सरकार की मौन स्वीकृति के साथ।
अनुबंध समाप्त, कार्रवाई शून्य
बस स्टैंड स्थित राम रसोई का निर्धारित अनुबंध समाप्त हो चुका है, इसके बावजूद नगर निगम द्वारा कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई। इससे भी अधिक आपत्तिजनक यह है कि शहरी सरकार की मुखिया उसी संचालक के साथ मंच साझा करती नजर आती हैं।
मंच से यह जरूर कहा जा रहा है कि “शहरी सरकार ईमानदारी से काम कर रही है”, लेकिन यह ईमानदारी शहर में बढ़ते अतिक्रमण के सामने पूरी तरह अदृश्य हो जाती है।
अतिक्रमण में भेदभाव के आरोप
अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई में भेदभाव अब छिपा नहीं रह गया है।
कपड़ा लाइन में एक विशेष समुदाय पर निरंतर कार्रवाई
वहीं, कपड़ा लाइन के समीप चौक पर अतिक्रमण की भरमार पर चुप्पी
वार्ड क्रमांक 59 में रोहित जैन के ठेले पर की गई तथाकथित कार्रवाई को कई लोग महापौर की निजी जिद का प्रत्यक्ष उदाहरण बता रहे हैं। सवाल यह है कि नियम सबके लिए एक समान क्यों नहीं?
पोस्टर वार में ठेकेदारों की एंट्री
इस बार महापौर के जन्मदिन पर एक नया दृश्य देखने को मिल रहा है—नगर निगम के ठेकेदारों की फौज भी पोस्टर वार में शामिल हो चुकी है।
सभी की अपनी-अपनी राजनीतिक और व्यावसायिक मजबूरियाँ हो सकती हैं, लेकिन शहर की जनता आज जिन समस्याओं से जूझ रही है, वे किसी पोस्टर से छिप नहीं सकतीं।
जमीनी हकीकत बनाम मंचीय भाषण
आज शहर की वास्तविक तस्वीर यह है—
जगह-जगह कचरे के ढेर
अंधेरे रास्ते
सफाई व्यवस्था बदहाल
जल व्यवस्था चरमराई
अतिक्रमण से अस्त-व्यस्त शहर
आवारा पशुओं से आमजन त्रस्त
विकास कार्य कई स्थानों पर ठप
ऐसे में विकास की बात करना कहीं न कहीं चुनावी वादों से जनता को ठगने जैसा प्रतीत होता है, जो महापौर प्रत्याशी के रूप में श्रीमती अलका बाघमार ने किए थे।
निजी संस्थाओं के भरोसे शहर
यदि कुछ निजी संस्थाएँ चौराहों और चौक-चौराहों के सौंदर्यीकरण की जिम्मेदारी न उठातीं, तो आज शहर की स्थिति और भी भयावह होती।
वित्त आयोग से मिलने वाले फंड से सड़कों का संधारण हो रहा है, लेकिन यह कोई निजी उपलब्धि नहीं बल्कि एक सतत प्रशासनिक प्रक्रिया है—सरकार किसी की भी हो, यह राशि आती ही है।
शहरी सरकार की कोई ठोस, मौलिक उपलब्धि आज भी ढूंढे नहीं मिलती।
एक अपवाद: नरेन्द्र बंजारे
हाँ, वित्त विभाग प्रभारी नरेन्द्र बंजारे ने उपादान जैसे मामलों में निगम के पूर्व कर्मचारियों के लिए पहल कर एक सकारात्मक उदाहरण जरूर प्रस्तुत किया है। लेकिन समग्र व्यवस्था आज भी शर्मसार नजर आती है।
प्रोटोकॉल और किराए की गाड़ी
विडंबना यह भी है कि महापौर के लिए निगम वाहन आवंटित होने के बावजूद किराए के वाहन में यात्रा की जा रही है—मानो प्रोटोकॉल का आनंद भी सत्ता का एक अलग ही सुख हो।
जन्मदिन, भव्य आयोजन और मीडिया प्रबंधन
सूत्रों के अनुसार, 31 जनवरी का जन्मदिन समारोह अत्यंत भव्य बनाया जाएगा, जिसकी जिम्मेदारी विभागीय अधिकारियों को सौंप दी गई है।
कुछ तथाकथित पत्रकारों को साधकर झूठी वाहवाही वाली खबरें भी प्रकाशित कराई जा सकती हैं—ऐसी चर्चाएँ शहर में आम हैं।
20–25 साल में सबसे बदहाल दौर
यदि जमीनी हकीकत देखी जाए, तो शहर पिछले 20–25 वर्षों में अपने सबसे बदहाल दौर से गुजर रहा है।
इस स्थिति की जिम्मेदारी से नगर निगम प्रशासन और शहरी सरकार दोनों नहीं बच सकते।
शहरी सरकार और निगम प्रशासन के बीच समन्वय की कमी साफ दिखाई देती है। वहीं स्थानीय विधायक—जो कि प्रदेश के शिक्षा मंत्री भी हैं—के साथ बढ़ती दूरी भी शहरी सरकार की कार्यप्रणाली पर प्रश्नचिह्न लगाती है।
एक ओर बस स्टैंड को नया स्वरूप देने की योजना, दूसरी ओर बस स्टैंड में राम रसोई के अवैध अनुबंध पर पुरानी सरकार को दोष देकर अपनी जिम्मेदारी से बचने की कोशिश—यह विरोधाभास शहर की जनता भली-भांति समझ रही है।
अंत में…
खैर, जैसा भी हो—
महापौर हैं, तो जन्मदिन धूमधाम से मनाया जाएगा।
जब सत्ता है, तो उसका लाभ भी उठाया जाएगा।
फिर भी औपचारिकता निभाते हुए—
महापौर श्रीमती अलका बाघमार को जन्मदिन की अग्रिम बधाई एवं शुभकामनाएँ।
बस इतना निवेदन है कि अगला जन्मदिन पोस्टरों में नहीं, बल्कि शहर की सूरत में विकास के रूप में नजर आए।
यह उस सोच का अंत है, जो स्वयं को पत्रकारिता का पर्याय और शेष सभी को नगण्य समझ बैठी थी।
सवाल सीधा और असहज है—
क्या पत्रकारिता किसी क्लब की बपौती है?
क्या किसी पत्रकार की पहचान कुछ लोगों की मोहर से तय होगी?
यदि जवाब “नहीं” है,
तो फिर दुर्ग में वह स्थिति क्यों बनी, जहाँ राष्ट्रीय और प्रतिष्ठित मीडिया संस्थानों से जुड़े पत्रकारों को भी बार-बार “पत्रकार” साबित करना पड़ा?
इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता कि पुराने प्रेस क्लब में अनुभव है, वरिष्ठता है और पत्रकारिता का इतिहास है।
लेकिन जब यही वरिष्ठता—
नए पत्रकारों के लिए दीवार बन जाए
सदस्यता वर्षों तक लटकाई जाए
बैठकों से लोकतांत्रिक संवाद गायब हो जाए
और संगठन कुछ गिने-चुने लोगों की सुविधा व वसूली का माध्यम बन जाए
तो सवाल उठना स्वाभाविक ही नहीं, आवश्यक हो जाता है।पत्रकारिता में सबसे खतरनाक नज़दीकी होती है— सत्ता से नहीं, आत्ममुग्धता से।
दुर्ग में वर्षों तक प्रशासन और राजनीतिक तंत्र के भीतर यह भ्रम बैठाया गया कि—“प्रेस क्लब मतलब यही लोग,इनके बाहर कोई पत्रकार नहीं।”
यह भ्रम इतना गहरा था कि कई अवसरों पर अन्य पत्रकारों को सार्वजनिक रूप से नकारा गया,जबकि वे ज़मीनी पत्रकारिता कर रहे थेऔर बड़े मीडिया संस्थानों से जुड़े हुए थे।
यह पत्रकारिता नहीं थी— यह सूचना पर कब्ज़े की मानसिकता थी।
नया प्रेस क्लब किसी सत्ता-समर्थित षड्यंत्र का परिणाम नहीं है। यह उन पत्रकारों की आख़िरी चुप्पी-तोड़ प्रतिक्रिया है,जिन्हें वर्षों तक यही सुनाया गया—
“जगह नहीं है, नियम नहीं है, ज़रूरत नहीं है।”
जब संगठन परिवार न रहे,तो नए घर बनते ही हैं।
यहाँ एक सच नए प्रेस क्लब के लिए भी उतना ही ज़रूरी है—पत्रकारिता जितनी बँटेगी,उतनी ही कमज़ोर होगी।दो प्रेस क्लब,दो मंच,दो ध्रुव—इस बंटवारे का सीधा लाभ पत्रकारों को नहीं, सत्ता और प्रशासन को मिलेगा।
जो आज तालियाँ बजा रहे हैं,वही कल इसी विभाजन का इस्तेमाल पत्रकारों की आवाज़ दबाने में करेंगे।
वरिष्ठ पत्रकारों की — कि संगठन को निजी जागीर न बनाएं
नए पत्रकारों की — कि विद्रोह मर्यादा से बाहर न जाए
पत्रकारिता में न वरिष्ठ छोटा होता है,न कनिष्ठ कमज़ोर— कमज़ोर होती है केवल नीयत।
क्या दुर्ग का पत्रकार क्लब से बड़ा बनेगा,या क्लब के नाम पर खुद को छोटा करता रहेगा? यदि पुराने प्रेस क्लब ने आत्ममंथन नहीं किया और नया प्रेस क्लब आत्मसंयम नहीं अपनाता—
तो इतिहास साफ़ है—
अहंकार से बना संगठन और जल्दबाज़ी से जन्मा विद्रोह,दोनों ही ज़्यादा देर तक नहीं टिकते। दुर्ग की पत्रकारिता आज चौराहे पर खड़ी है। अब फैसला पत्रकारों को करना है—
✒️ कलम एकजुट रखनी है
या
✒️ क्लबों में बाँट देनी है।
व्यंगात्मक लेख
दुर्ग। नगर पालिका निगम में इन दिनों विकास, स्वच्छता या जनसमस्याओं की नहीं, बल्कि "चाय पहले क्यों नहीं आई" जैसे गूढ़ प्रशासनिक मुद्दे की चर्चा जोरों पर है। बताया जा रहा है कि मात्र चाय समय पर न पहुँचने की ‘गंभीर चूक’ पर एक चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को निलंबन और ट्रांसफर की धमकी दे दी गई। कर्मचारी भले निलंबित न हुआ हो, पर उसकी कुर्सी ज़रूर खिसका दी गई—और यही साबित करता है कि चाय हल्की हो सकती है, पर सत्ता की चुस्की भारी होती है।
नगर निगम में यह कोई पहला मामला नहीं है। हाल ही में आयुक्त द्वारा अधीनस्थ कर्मचारियों से घरेलू कार्य कराए जाने का मामला जब अदालत की दहलीज़ तक पहुँचा, तब प्रदेश भर में बहस छिड़ी। अब उसी बहस की आँच में यह पुराना किस्सा फिर से उबल पड़ा है—इस बार चाय के उबाल के साथ।
व्यंग्य यह है कि पाँच साल के लिए चुने गए जनप्रतिनिधि यदि चाय के कप से ही प्रशासनिक ताकत का प्रदर्शन करने लगें, तो शहर की दशा-दिशा का अंदाज़ा लगाना कठिन नहीं। सवाल यह नहीं कि चाय पहले क्यों नहीं आई, सवाल यह है कि अहंकार पहले क्यों आ गया?
नैतिकता की किताब में शायद यह अध्याय नहीं मिलता कि किसी चपरासी को ‘मेरी चाय’ के नाम पर धमकाया जाए। पर निगम की अनकही पाठ्यक्रम में यह अध्याय पढ़ाया जा रहा है—जहाँ हँसी-मज़ाक में कहा जाता है, “काम कर दे, नहीं तो नौकरी से निकलवा दूँगा।” मज़ाक की आड़ में यह वाक्य, कर्मचारियों के लिए डर का स्थायी पोस्टर बन जाता है।
चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी वैसे ही सत्ता के गलियारों में सहमे रहते हैं। ऐसे में यदि जनप्रतिनिधि अपने कार्यकाल को चाय-ट्रांसफर मॉडल से चलाएँ, तो प्रशासनिक अनुशासन नहीं, तानाशाही की सुगंध आती है—भले ही कप में इलायची पड़ी हो।
जिस कर्मचारी का ट्रांसफर हुआ, उसने प्रतिरोध नहीं किया। चुपचाप नई जगह काम संभाल लिया। शायद इसलिए कि उसे मालूम था—यह शहर है, यहाँ चाय ठंडी हो सकती है, पर सत्ता का मिज़ाज नहीं।
आज जब निगम और कर्मचारी के बीच के मामले अदालत तक पहुँच चुके हैं, तब यह किस्सा फिर से हँसी-मज़ाक में उछाला जा रहा है। पर हँसी के पीछे जो कड़वाहट है, वह यह सवाल छोड़ जाती है—
अगर चाय के लिए धमकी है, तो शहर के लिए क्या?
व्यंग्य यहीं खत्म होता है, जवाब शहर को देना है।
शरद पंसारी - संपादक शौर्यपथ दैनिक समाचार
भारत की अर्थव्यवस्था को लेकर हाल के दिनों में एक अजीब-सी बहस सार्वजनिक विमर्श में छा गई है — “भारत में एक डॉलर में छह समोसे मिल जाते हैं, जबकि अमेरिका में एक डॉलर में केवल एक पेन।” यह तुलना सुनने में भले ही चुटीली लगे, लेकिन यह आर्थिक यथार्थ को समझने के बजाय उसे सरलीकरण और भावनात्मक तर्कों में उलझाने का प्रयास अधिक प्रतीत होती है। असल सवाल समोसे या पेन का नहीं, बल्कि आय, गरीबी, क्रय शक्ति और जीवन स्तर का है।
भारत सरकार के सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय (MoSPI) द्वारा 7 जनवरी 2026 को जारी प्रथम अग्रिम अनुमान इस वास्तविकता को स्पष्ट रूप से सामने रखते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में स्थिर मूल्यों पर भारत की प्रति व्यक्ति वास्तविक जीडीपी ₹1,42,119 रहने का अनुमान है, जो बीते वर्ष की तुलना में 6.5 प्रतिशत की वृद्धि अवश्य दर्शाता है। यह वृद्धि स्वागतयोग्य है, किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि वित्त वर्ष 2024-25 में प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय (NNI) ₹1,14,710 रही — एक ऐसा आंकड़ा जो भारत की विशाल आबादी के जीवन स्तर की सीमाओं को उजागर करता है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तुलना और भी अधिक स्पष्ट हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) के अनुसार 2026 में भारत की नॉमिनल प्रति व्यक्ति आय लगभग $3,051 रहने का अनुमान है। क्रय शक्ति समानता (PPP) के आधार पर यह आंकड़ा $12,964 तक पहुँचता है, किंतु इसके बावजूद नॉमिनल प्रति व्यक्ति आय के मामले में भारत का वैश्विक स्थान 144वां है। यह रैंकिंग इस तथ्य की ओर संकेत करती है कि भारत की आर्थिक वृद्धि अभी भी औसत नागरिक की आय में पर्याप्त रूप से परिलक्षित नहीं हो पा रही है।
देश के भीतर आय की असमानता और भी गहरी है। गोवा, सिक्किम और महाराष्ट्र जैसे राज्य प्रति व्यक्ति आय में आगे हैं, जहाँ महाराष्ट्र की अनुमानित प्रति व्यक्ति आय ₹2.89 लाख तक पहुँचने वाली है। इसके विपरीत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य आज भी राष्ट्रीय औसत से काफी पीछे हैं। यह क्षेत्रीय असंतुलन भारत की आर्थिक संरचना की एक बड़ी चुनौती बना हुआ है।
अब यदि तुलना अमेरिका से की जाए, तो अंतर लगभग खाई का रूप ले लेता है। IMF के अनुसार 2026 में अमेरिका की प्रति व्यक्ति नॉमिनल आय लगभग $92,880 (करीब ₹77.5 लाख) रहने का अनुमान है। अमेरिका दुनिया के शीर्ष 10 देशों में शामिल है, जहाँ औसत मासिक आय $5,000 और औसत घरेलू आय $78,538 के आसपास है। वहीं 2026 में अमेरिकी अर्थव्यवस्था की कुल जीडीपी $30.50 ट्रिलियन को पार करने की संभावना है। यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि भारत और अमेरिका की तुलना केवल वस्तुओं की कीमत से नहीं, बल्कि आय और अवसरों की संरचना से होनी चाहिए।
सबसे चिंताजनक पहलू गरीबी का अंतर है। भारत में आज भी अनुमानतः लगभग 80 करोड़ लोग गरीबी रेखा के आसपास या नीचे जीवन यापन कर रहे हैं। अत्यधिक गरीबी — जहाँ प्रतिदिन की आय कुछ ही रुपयों तक सीमित है — में जीवन बिताने वाली आबादी करीब 12 प्रतिशत बताई जाती है। इसके विपरीत अमेरिका में गरीबी रेखा के नीचे रहने वालों की संख्या 10–12 प्रतिशत के आसपास है, लेकिन वहाँ गरीबी की परिभाषा ही $15,000 वार्षिक आय जैसे स्तर से जुड़ी है। यह तुलना बताती है कि प्रतिशत के आंकड़े समान दिख सकते हैं, पर जीवन की वास्तविक परिस्थितियाँ पूरी तरह अलग हैं।
अर्थशास्त्रियों की राय में भारत की समस्या केवल विकास दर नहीं, बल्कि आय असमानता, रोजगार की गुणवत्ता और वास्तविक क्रय शक्ति है। जब तक आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के अंतिम पायदान पर खड़े व्यक्ति तक नहीं पहुँचेगा, तब तक समोसे और पेन जैसी तुलना केवल हकीकत से ध्यान भटकाने वाला शोर बनी रहेगी।
आज जरूरत इस बात की है कि भारत अपनी आर्थिक बहस को प्रतीकों और जुमलों से निकालकर आम आदमी की आय, रोजगार और जीवन स्तर पर केंद्रित करे। सवाल यह नहीं कि एक डॉलर में क्या मिलता है, सवाल यह है कि एक भारतीय की मेहनत की कीमत क्या है — और क्या वह उसे सम्मानजनक जीवन दे पा रही है या नहीं। यही बहस भारत को आगे ले जाएगी, बाकी सब केवल दिखावटी तर्क हैं।
मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया है कि नक्सलवाद उन्मूलन अब निर्णायक चरण में है और मार्च 2026 तक इसे पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य है।
सुरक्षा शिविरों का विस्तार: दिसंबर 2023 से अब तक 65 नए सुरक्षा शिविर स्थापित किए गए हैं, जिससे दूरस्थ और दुर्गम क्षेत्रों में सरकारी उपस्थिति मजबूत हुई।
नक्सली नेटवर्क पर प्रभावी कार्रवाई: प्रमुख माओवादी विचारकों और कमांडरों को निष्क्रिय कर उनके नेटवर्क को पूरी तरह कमजोर किया गया।
सटीक आंकड़े:
आत्मसमर्पण: 2,386+ नक्सली
गिरफ्तार: 1,901+ नक्सली
निष्क्रिय/मारे गए: 505+ नक्सली
इन कदमों से नक्सलियों की कमांड और नियंत्रण प्रणाली टूट चुकी है और स्थानीय लोग अब खुले तौर पर सरकारी पहलों का समर्थन कर रहे हैं।
सरकार ने नक्सलियों के “कोर एरिया” (अबूझमाड़ और घोर जंगली इलाके) में सक्रिय रूप से अभियान चलाकर उनके गढ़ों को निशाना बनाया।
फॉरवर्ड लिंक कैंप: पिछले दो वर्षों में 50+ नए कैंप स्थापित, जिन्हें विकास केंद्र के रूप में विकसित किया गया।
इंटेलिजेंस आधारित ऑपरेशन: अब मुठभेड़ें केवल गश्त पर नहीं होतीं, बल्कि सटीक खुफिया जानकारी के आधार पर विशेष ऑपरेशन किए जाते हैं।
आधुनिक हथियार और तकनीक: ड्रोन, एन्टी-माइन वाहन, और अत्याधुनिक संचार उपकरणों से जवानों की सुरक्षा सुनिश्चित की गई, हताहत दर में भारी कमी आई।
इन रणनीतियों के परिणामस्वरूप नक्सलियों के बीच भय और अविश्वास का माहौल उत्पन्न हुआ और कई कमांडर आत्मसमर्पण कर मुख्यधारा में लौट आए।
मुख्यमंत्री की प्रमुख पहल ‘नियद नेल्लानार’ (आपका अच्छा गाँव) योजना ने सुरक्षा शिविरों के आसपास के गांवों में शत-प्रतिशत विकास की दिशा में काम किया।
सुविधाओं का विस्तार: राशन दुकान, स्कूल, आंगनबाड़ी, खेल का मैदान, मुफ्त बिजली, पक्के आवास, स्वास्थ्य क्लिनिक और 25+ बुनियादी सुविधाओं का वितरण।
शिक्षा और स्वास्थ्य: बंद 300+ स्कूलों को पुनः खोला गया, और ‘छू लो आसमान’ जैसी कोचिंग संस्थाओं के माध्यम से IIT/NEET जैसी प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी उपलब्ध।
स्थानीय सहभागिता: ग्रामीण अब स्वयं सुरक्षा शिविरों की मांग करने लगे हैं, जिससे यह स्पष्ट हो रहा है कि विकास और सुरक्षा का मॉडल सफल हुआ है।
बस्तर को केवल सुरक्षा के मोर्चे तक सीमित नहीं रखा गया; सरकार ने इसे स्थानीय उद्यमिता, वनोपज और पर्यटन से जोड़ा।
वनोपज आधारित समर्थन: इमली, महुआ, कोसा वनोपजों का MSP बढ़ाया गया और बिचौलियों को खत्म किया गया।
स्थानीय रोजगार: ‘बस्तर कैफे’ ब्रांड और फूड प्रोसेसिंग यूनिट्स में महिलाओं और युवाओं को रोजगार मिला।
पर्यटन और इको-टूरिज्म: ‘बस्तर पांडुम’, ‘बस्तर ओलंपिक’ और सुरक्षित पर्यटन स्थलों से स्थानीय आजीविका को बढ़ावा।
कौशल विकास: आत्मसमर्पित नक्सलियों और युवाओं को ट्रैक्टर रिपेयरिंग, मोबाइल रिपेयरिंग, सोलर पंप तकनीशियन और अन्य व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान।
भरोसे का संकेत: 2025 में ‘लोन वर्राटू’ अभियान के तहत 2,000+ नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया, जिनमें कई अब ‘बस्तर फाइटर्स’ के रूप में पुलिस और प्रशासन की मदद कर रहे हैं।
राजनीतिक भागीदारी: ग्राम सभाओं और स्थानीय चुनावों में मतदान प्रतिशत में वृद्धि, जो लोकतंत्र में विश्वास की बढ़ती दर को दर्शाती है।
सड़कों और पुलों का निर्माण: इंद्रावती नदी पर नए पुल और ग्रामीण सड़कों का निर्माण, जिससे मानसून के दौरान भी बस्तर का संपर्क टूटने का खतरा नहीं।
स्वास्थ्य सेवाएं: ‘हाट बाजार क्लिनिक’ योजना के तहत जंगलों और दुर्गम इलाकों में डॉक्टर और दवाइयां उपलब्ध।
शिक्षा और कौशल: बच्चों के लिए गुणवत्ता शिक्षा और प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी का मार्गदर्शन।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में बस्तर में दो वर्षों में सुरक्षा, विकास और विश्वास का त्रिकोणीय मॉडल सफल हुआ है। नक्सलियों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई और विकास की मुख्यधारा के प्रति स्थानीय लोगों के विश्वास ने बस्तर को 'लाल आतंक' से मुक्त कर 'हरी-भरी संस्कृति और तेजी से बढ़ते विकास' की पहचान दिलाई है।
मार्च 2026 तक बस्तर को पूर्ण नक्सल मुक्त बनाने का लक्ष्य अब within reach है, और यह स्पष्ट है कि मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और उनकी सरकार ने बस्तर को न केवल सुरक्षित, बल्कि आत्मनिर्भर और विकसित बनाने का मार्ग प्रशस्त किया है।
माननीय नरेंद्र मोदी (प्रधानमन्त्री जी के कलम से )
पीआईबी रायपुर से संकलित
शौर्यपथ विशेष
सोमनाथ... ये शब्द सुनते ही हमारे मन और हृदय में गर्व और आस्था की भावना भर जाती है। भारत के पश्चिमी तट पर गुजरात में, प्रभास पाटन नाम की जगह पर स्थित सोमनाथ, भारत की आत्मा का शाश्वत प्रस्तुतिकरण है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्रम में भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों का उल्लेख है। ज्योतिर्लिंगों का वर्णन इस पंक्ति से शुरू होता है...“सौराष्ट्रे सोमनाथं च...यानि ज्योतिर्लिंगों में सबसे पहले सोमनाथ का उल्लेख आता है। ये इस पवित्र धाम की सभ्यतागत और आध्यात्मिक महत्ता का प्रतीक है। शास्त्रों में ये भी कहा गया है:
“सोमलिङ्गं नरो दृष्ट्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते।
लभते फलं मनोवाञ्छितं मृतः स्वर्गं समाश्रयेत्॥”
अर्थात्, सोमनाथ शिवलिंग के दर्शन से व्यक्ति अपने सभी पापों से मुक्त हो जाता है। मन में जो भी पुण्य कामनाएं होती हैं, वो पूरी होती हैं और मृत्यु के बाद आत्मा स्वर्ग को प्राप्त होती है।
दुर्भाग्यवश, यही सोमनाथ, जो करोड़ों लोगों की श्रद्धा और प्रार्थनाओं का केंद्र था, विदेशी आक्रमणकारियों का निशाना बना, जिनका उद्देश्य विध्वंस था।
वर्ष 2026 सोमनाथ मंदिर के लिए बहुत महत्व रखता है क्योंकि इस महान तीर्थ पर हुए पहले आक्रमण के 1000 वर्ष पूरे हो रहे हैं। जनवरी 1026 में गजनी के महमूद ने इस मंदिर पर बड़ा आक्रमण किया था, इस मंदिर को ध्वस्त कर दिया था। यह आक्रमण आस्था और सभ्यता के एक महान प्रतीक को नष्ट करने के उद्देश्य से किया गया एक हिंसक और बर्बर प्रयास था।
सोमनाथ हमला मानव इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में शामिल है। फिर भी, एक हजार वर्ष बाद आज भी यह मंदिर पूरे गौरव के साथ खड़ा है। साल 1026 के बाद समय-समय पर इस मंदिर को उसके पूरे वैभव के साथ पुन:निर्मित करने के प्रयास जारी रहे। मंदिर का वर्तमान स्वरूप 1951 में आकार ले सका। संयोग से 2026 का यही वर्ष सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण के 75 वर्ष पूरे होने का भी वर्ष है। 11 मई 1951 को इस मंदिर का पुनर्निर्माण सम्पन्न हुआ था। तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में हुआ वो समारोह ऐतिहासिक था, जब मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए खोले गए थे।
1026 में एक हजार वर्ष पहले सोमनाथ पर हुए पहले आक्रमण, वहां के लोगों के साथ की गई क्रूरता और विध्वंस का वर्णन अनेक ऐतिहासिक स्रोतों में विस्तार से मिलता है। जब इन्हें पढ़ा जाता है तो हृदय कांप उठता है। हर पंक्ति में क्रूरता के निशान मिलते हैं, ये ऐसा दुःख है जिसकी पीड़ा इतने समय बाद भी महसूस होती है।
हम कल्पना कर सकते हैं कि इसका उस दौर में भारत पर और लोगों के मनोबल पर कितना गहरा प्रभाव पड़ा होगा। सोमनाथ मंदिर का आध्यात्मिक महत्व बहुत ज्यादा था। ये बड़ी संख्या में लोगों को अपनी ओर खींचता था। ये एक ऐसे समाज की प्रेरणा था जिसकी आर्थिक क्षमता भी बहुत सशक्त थी। हमारे समुद्री व्यापारी और नाविक इसके वैभव की कथाएं दूर-दूर तक ले जाते थे।
सोमनाथ पर हमले और फिर गुलामी के लंबे कालखंड के बावजूद आज मैं पूरे विश्वास के साथ और गर्व से ये कहना चाहता हूं कि सोमनाथ की गाथा विध्वंस की कहानी नहीं है। ये पिछले 1000 साल से चली आ रही भारत माता की करोड़ों संतानों के स्वाभिमान की गाथा है, ये हम भारत के लोगों की अटूट आस्था की गाथा है।
1026 में शुरू हुई मध्यकालीन बर्बरता ने आगे चलकर दूसरों को भी बार-बार सोमनाथ पर आक्रमण करने के लिए प्रेरित किया। यह हमारे लोगों और हमारी संस्कृति को गुलाम बनाने का प्रयास था। लेकिन हर बार जब मंदिर पर आक्रमण हुआ, तब हमारे पास ऐसे महान पुरुष और महिलाएं भी थीं जिन्होंने उसकी रक्षा के लिए खड़े होकर सर्वोच्च बलिदान दिया। और हर बार, पीढ़ी दर पीढ़ी, हमारी महान सभ्यता के लोगों ने खुद को संभाला, मंदिर को फिर से खड़ा किया और उसे पुनः जीवंत किया।
महमूद गजनवी लूटकर चला गया, लेकिन सोमनाथ के प्रति हमारी भावना को हमसे छीन नहीं सका। सोमनाथ से जुड़ी हमारी आस्था, हमारा विश्वास और प्रबल हुआ। उसकी आत्मा लाखों श्रद्धालुओं की भीतर सांस लेती रही। साल 1026 के हजार साल बाद आज 2026 में भी सोमनाथ मंदिर दुनिया को संदेश दे रहा है, कि मिटाने की मानसिकता रखने वाले खत्म हो जाते हैं, जबकि सोमनाथ मंदिर आज हमारे विश्वास का मजबूत आधार बनकर खड़ा है। वो आज भी हमारी प्रेरणा का स्रोत है, वो आज भी हमारी शक्ति का पुंज है।
ये हमारा सौभाग्य है कि हमने उस धरती पर जीवन पाया है, जिसने देवी अहिल्याबाई होलकर जैसी महान विभूति को जन्म दिया। उन्होंने ये सुनिश्चित करने का पुण्य प्रयास किया कि श्रद्धालु सोमनाथ में पूजा कर सकें।
1890 के दशक में स्वामी विवेकानंद भी सोमनाथ आए थे, वो अनुभव उन्हें भीतर तक आंदोलित कर गया। 1897 में चेन्नई में दिए गए एक व्याख्यान के दौरान उन्होंने अपनी भावना व्यक्त की।
उन्होंने कहा, “दक्षिण भारत के प्राचीन मंदिर और गुजरात के सोमनाथ जैसे मंदिर आपको ज्ञान के अनगिनत पाठ सिखाएंगे। ये आपको किसी भी संख्या में पढ़ी गई पुस्तकों से अधिक हमारी सभ्यता की गहरी समझ देंगे।
इन मंदिरों पर सैकड़ों आक्रमणों के निशान हैं, और सैकड़ों बार इनका पुनर्जागरण हुआ है। ये बार बार नष्ट किए गए, और हर बार अपने ही खंडहरों से फिर खड़े हुए। पहले की तरह सशक्त। पहले की तरह जीवंत। यही राष्ट्रीय मन है, यही राष्ट्रीय जीवन धारा है। इसका अनुसरण आपको गौरव से भर देता है। इसको छोड़ देने का मतलब है, मृत्यु। इससे अलग हो जाने पर विनाश ही होगा।”
ये सर्वविदित है कि आजादी के बाद सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण का पवित्र दायित्व सरदार वल्लभभाई पटेल के सक्षम हाथों में आया। उन्होंने आगे बढ़कर इस दायित्व के लिए कदम बढ़ाया। 1947 में दीवाली के समय उनकी सोमनाथ यात्रा हुई। उस यात्रा के अनुभव ने उन्हें भीतर तक झकझोर दिया, उसी समय उन्होंने घोषणा की कि यहीं सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण होगा। अंततः 11 मई 1951 को सोमनाथ में भव्य मंदिर के द्वार श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए।
उस अवसर पर तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद उपस्थित थे। महान सरदार साहब इस ऐतिहासिक दिन को देखने के लिए जीवित नहीं थे, लेकिन उनका सपना राष्ट्र के सामने साकार होकर भव्य रूप में उपस्थित था।
तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू इस घटना से अधिक उत्साहित नहीं थे। वो नहीं चाहते थे कि माननीय राष्ट्रपति और मंत्री इस समारोह का हिस्सा बनें। उन्होंने कहा कि इस घटना से भारत की छवि खराब होगी। लेकिन राजेंद्र बाबू अडिग रहे, और फिर जो हुआ, उसने एक नया इतिहास रच दिया।
सोमनाथ मंदिर का कोई भी उल्लेख के.एम. मुंशी जी के योगदानों को याद किए बिना अधूरा है। उन्होंने उस समय सरदार पटेल का प्रभावी रूप से समर्थन किया था। सोमनाथ पर उनका कार्य, विशेष रूप से उनकी पुस्तक ‘सोमनाथ, द श्राइन इटरनल’, अवश्य पढ़ी जानी चाहिए।
जैसा कि मुंशी जी की पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट होता है, हम एक ऐसी सभ्यता हैं जो आत्मा और विचारों की अमरता में अटूट विश्वास रखती है। हम विश्वास करते हैं- नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः। सोमनाथ का भौतिक ढांचा नष्ट हो गया, लेकिन उसकी चेतना अमर रही।
इन्हीं विचारों ने हमें हर कालखंड में, हर परिस्थिति में फिर से उठ खड़े होने, मजबूत बनने और आगे बढ़ने का सामर्थ्य दिया है। इन्हीं मूल्यों और हमारे लोगों के संकल्प की वजह से आज भारत पर दुनिया की नजर है। दुनिया भारत को आशा और विश्वास की दृष्टि से देख रही है। वो हमारे इनोवेटिव युवाओं में निवेश करना चाहती है। हमारी कला, हमारी संस्कृति, हमारा संगीत और हमारे अनेक पर्व आज वैश्विक पहचान बना रहे हैं। योग और आयुर्वेद जैसे विषय पूरी दुनिया में प्रभाव डाल रहे हैं। ये स्वस्थ जीवन को बढ़ावा दे रहे हैं। आज कई वैश्विक चुनौतियों के समाधान के लिए दुनिया भारत की ओर देख रही है।
अनादि काल से सोमनाथ जीवन के हर क्षेत्र के लोगों को जोड़ता आया है। सदियों पहले जैन परंपरा के आदरणीय मुनि कलिकाल सर्वज्ञ हेमचंद्राचार्य यहां आए थे और कहा जाता है कि प्रार्थना के बाद उन्होंने कहा,
“भवबीजाङ्कुरजनना रागाद्याः क्षयमुपगता यस्य।
अर्थात्, उस परम तत्व को नमन जिसमें सांसारिक बंधनों के बीज नष्ट हो चुके हैं। जिसमें राग और सभी विकार शांत हो गए हैं।
आज भी दादा सोमनाथ के दर्शन से ऐसी ही अनुभूति होती है। मन में एक ठहराव आ जाता है, आत्मा को अंदर तक कुछ स्पर्श करता है, जो अलौकिक है, अव्यक्त है।
1026 के पहले आक्रमण के एक हजार वर्ष बाद 2026 में भी सोमनाथ का समुद्र उसी तीव्रता से गर्जना करता है और तट को स्पर्श करती लहरें उसकी पूरी गाथा सुनाती हैं। उन लहरों की तरह सोमनाथ बार-बार उठता रहा है।
अतीत के आक्रमणकारी आज समय की धूल बन चुके हैं। उनका नाम अब विनाश के प्रतीक के तौर पर लिया जाता है। इतिहास के पन्नों में वे केवल फुटनोट हैं, जबकि सोमनाथ आज भी अपनी आशा बिखेरता हुआ प्रकाशमान खड़ा है। सोमनाथ हमें ये बताता है कि घृणा और कट्टरता में विनाश की विकृत ताकत हो सकती है, लेकिन आस्था में सृजन की शक्ति होती है। करोड़ों श्रद्धालुओं के लिए सोमनाथ आज भी आशा का अनंत नाद है। ये विश्वास का वो स्वर है, जो टूटने के बाद भी उठने की प्रेरणा देता है।
अगर हजार साल पहले खंडित हुआ सोमनाथ मंदिर अपने पूरे वैभव के साथ फिर से खड़ा हो सकता है, तो हम हजार साल पहले का समृद्ध भारत भी बना सकते हैं। आइए, इसी प्रेरणा के साथ हम आगे बढ़ते हैं। एक नए संकल्प के साथ, एक विकसित भारत के निर्माण के लिए। एक ऐसा भारत, जिसका सभ्यतागत ज्ञान हमें विश्व कल्याण के लिए प्रयास करते रहने की प्रेरणा देता है।
जय सोमनाथ !
(नरेंद्र मोदी भारत के प्रधानमंत्री हैं और श्री सोमनाथ ट्रस्ट के अध्यक्ष भी हैं।)
Feb 09, 2021 Rate: 4.00
