February 11, 2026
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धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

साभार - लेखक सौरभ गर्ग

महंगाई देश के सबसे अहम आर्थिक संकेतकों में से एक है, जिसे आम लोग रोज़मर्रा की ज़िंदगी में सीधे महसूस करते हैं, जैसे घर का राशन, किराया और पेट्रोल-डीज़ल के खर्च में बढ़ोतरी से।
उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) इसी महंगाई को मापता है। यह उन चीज़ों और सेवाओं के दाम देखता है, जिनका इस्तेमाल आम परिवार रोज़ करता है। सरल शब्दों में, सीपीआई आम आदमी की ज़िंदगी का आईना है। यह बताता है कि थाली में खाने का खर्च कितना बढ़ा, घर का किराया कितना हुआ, और काम पर जाने के लिए ईंधन कितना महंगा हुआ।

सीपीआई भले ही एक आंकड़ा लगता हो, लेकिन यह सरकार को यह समझने में मदद करता है कि लोगों पर महंगाई का असली असर क्या है। इसी आधार पर वेतन, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा से जुड़े फैसले किए जाते हैं, ताकि ज़रूरी चीज़ें आम लोगों की पहुंच में बनी रहें।

भारतीय रिज़र्व बैंक भी ब्याज दर और महंगाई को नियंत्रित करने जैसे फैसलों के लिए सीपीआई आधारित महंगाई को ही सबसे मुख्य पैमाना मानता है। इसलिए जब सीपीआई ज़मीन की हकीकत सही तरीके से दिखाता है, तब सरकार और आरबीआई की नीतियाँ भी लोगों की असली परेशानियों के अनुसार बेहतर बन पाती हैं।

महंगाई सिर्फ दाम बढ़ने का नाम नहीं है, बल्कि यह भी है कि दामों में बदलाव से घर के बजट पर कितना असर पड़ता है। इसलिए जितना ज़रूरी दामों को मापना है, उतना ही ज़रूरी यह भी है कि महंगाई का सूचकांक लोगों की आज की खर्च करने की आदतों को सही तरीके से दिखाए। इसी संदर्भ में भारत में सीपीआई के आधार वर्ष को 2012 से बदलकर 2024 किया जा रहा है।

पिछली बार आधार बदले जाने के बाद देश की अर्थव्यवस्था में बहुत बदलाव आया है। शहरों की आबादी बढ़ी है, सेवाओं का क्षेत्र बढ़ा है, डिजिटल प्लेटफॉर्म के कारण खरीदारी का तरीका बदला है और घरों का खर्च अब कई नई चीजों पर होने लगा है।

इसीलिए नया सीपीआई 2024 तैयार करने में 2023-24 के घरेलू उपभोग व्यय सर्वेक्षण के आंकड़ों का इस्तेमाल किया गया है।
समय के साथ लोगों की ज़रूरतें और खर्च बदलते हैं, इसलिए सीपीआई में अलग-अलग वस्तुओं और सेवाओं को दी जाने वाली अहमियत भी बदली गई है। जिन चीजों पर अब परिवार ज़्यादा खर्च करते हैं, उन्हें सीपीआई में ज़्यादा महत्व दिया गया है,
और जिन पर खर्च कम हो गया है, उन्हें कम महत्व दिया गया है।

इससे सीपीआई वही महंगाई दिखाता है, जो सच में आम परिवार के बजट को प्रभावित करती है। साथ ही, उपभोग की टोकरी (कंजम्पशन बास्केट) को भी बदला गया है, ताकि सेवाओं पर बढ़ते खर्च जैसे नए रुझान दिखाई दे सकें, जो बढ़ती आय और बदलती जीवनशैली की वजह से बढ़ रहे हैं। सीपीआई को मापने का तरीका अपडेट करना भी उतना ही ज़रूरी है, जितना यह तय करना कि उसमें क्या-क्या शामिल किया जाए।

नया संशोधित सीपीआई अब अंतरराष्ट्रीय मानकों के ज्यादा करीब है, लेकिन इसमें भारत से जुड़ी खास बातें भी बनी हुई हैं। इससे भारत की महंगाई की तुलना दूसरे देशों से करना आसान हो जाता है।

आम परिवार के लिए इसका मतलब यह है कि सरकार और नीति बनाने वाले लोग यह बेहतर समझ पाते हैं कि भारत में दामों में होने वाला बदलाव दुनिया के हालात से कैसे जुड़ा है, और साथ ही यह भी ध्यान रहता है कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी पर क्या असर पड़ रहा है।

सीपीआई के लिए आंकड़े जुटाने का तरीका भी अब लोगों की बदलती खरीदारी और खर्च की आदतों के अनुसार बेहतर बनाया गया है। जहां पहले की तरह बाजारों से दाम इकट्ठा किए जाते रहेंगे, खासकर खाने-पीने और ज़रूरी चीज़ों के, वहीं 2024 के नए ढांचे में अब कुछ सेवाओं के ऑनलाइन दाम भी शामिल किए जा रहे हैं। जैसे मोबाइल और इंटरनेट सेवाएं, हवाई टिकट और कुछ अन्य सेवाओं के दाम अब ऑनलाइन स्रोतों से भी लिए जाएंगे।

नई सीपीआई श्रृंखला में अब कंप्यूटर की मदद से दाम इकट्ठा किए जा रहे हैं। इससे हाथ से होने वाली गलतियाँ कम हुई हैं और तुरंत जाँच भी हो जाती है। इससे दामों से जुड़े आंकड़ों की गुणवत्ता और समय पर उपलब्धता दोनों बेहतर हुई हैं। सीपीआई के आंकड़े सही और समय पर मिलना बहुत ज़रूरी है, क्योंकि इसी के आधार पर ऐसे फैसले होते हैं, जो सीधे आम आदमी की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं, जैसे कर्ज कितना महंगा होगा, बचत पर कितना ब्याज मिलेगा, और बढ़ती महंगाई से घर का बजट कैसे प्रभावित होगा।

नए आधार वर्ष की सीपीआई में अब कई मामलों में सरकारी स्रोतों से मिलने वाले आधिकारिक आंकड़ों का ज्यादा इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे रेल किराया, डाक शुल्क, ईंधन के दाम और सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत बिकने वाली चीजें। इससे इन दामों को पहले से ज्यादा सही तरीके से दर्ज किया जा रहा है और बाजार सर्वे में होने वाली गलती या पक्षपात की संभावना भी कम हो जाती है।

अब सर्वे के आंकड़े, सरकारी रिकॉर्ड और डिजिटल माध्यमों से मिलने वाले दाम, तीनों को मिलाकर सीपीआई तैयार की जा रही है। यह पुरानी व्यवस्था की तुलना में बड़ा सुधार है और इससे दामों में होने वाले बदलाव की ज्यादा भरोसेमंद तस्वीर मिलती है।

इतने बड़े स्तर पर सीपीआई के आधार वर्ष में बदलाव करना एक बहुत बड़ा संस्थागत प्रयास होता है। इसमें देश भर के फील्ड दफ्तरों, सांख्यिकी विभागों और राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञ संस्थाओं के बीच तालमेल जरूरी होता है। इस पूरी प्रक्रिया में मेथडोलॉजी की गहराई से जाँच की जाती है, अलग-अलग विकल्पों को परखा जाता है और अर्थशास्त्रियों व विषय-विशेषज्ञों से सलाह ली जाती है। सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने विशेषज्ञ समूहों, अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं और अन्य संबंधित पक्षों से बातचीत की है, ताकि किए गए बदलाव साफ, समझने में आसान और वैज्ञानिक रूप से सही हों।

टोकरी, वेटेज और आंकड़ों के स्रोत बदलने के बाद भी सीपीआई का मूल उद्देश्य वही रहता है-यानी एक परिवार की नज़र से दामों में होने वाले बदलाव को दिखाना। यह निरंतरता इसलिए ज़रूरी है, ताकि हम समय के साथ महंगाई की तुलना कर सकें।

सीधे शब्दों में, सीपीआई को बेहतर बनाया जा रहा है, लेकिन उसे रोज़मर्रा की ज़िंदगी से जोड़कर ही रखा गया है, ताकि वह नीति बनाने वालों के लिए एक भरोसेमंद मार्गदर्शक बना रहे।सीपीआई हमें यह याद दिलाता है कि हर आंकड़े के पीछे करोड़ों लोगों की असली ज़िंदगी छिपी होती है। आखिरकार, आंकड़े लोगों के लिए ही होते हैं। यह चुपचाप यह दिखाता है कि दामों में बदलाव हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी को कैसे प्रभावित करता है और सरकार की नीतियों को दिशा देता है।

आधार वर्ष में चल रहे संशोधन के ज़रिये सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय ने यह सुनिश्चित किया है कि सीपीआई सही, समय के अनुसार अपडेट और लंबे समय तक एक-जैसे तरीके से मापा गया रहे। ताकि सीपीआई सिर्फ एक संख्या न होकर, पूरे देश के लोगों की असली ज़िंदगी की सच्चाई दिखाने वाला आईना बना रहे।


(लेखक सांख्यिकी और कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के सचिव हैं, यह उनके निजी विचार हैं)

 बिलासपुर / शौर्यपथ /
राष्ट्र निर्माण की दिशा में कौशल विकास को एक सशक्त माध्यम के रूप में स्थापित करते हुए एनटीपीसी लारा, जिला रायगढ़ ने अपनी कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व (कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी) पहल के अंतर्गत स्थानीय बेरोजगार युवाओं के लिए एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। इस क्रम में एनटीपीसी लारा द्वारा गुरुवार को युवाओं के पहले बैच को रोजगारोन्मुख व्यावसायिक प्रशिक्षण हेतु सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी (सीआईपीईटी), कोरबा के लिए रवाना किया गया।
प्रशासनिक परिसर में आयोजित कार्यक्रम में इस पहल को औपचारिक रूप से श्री सुभाष ठाकुर, परियोजना प्रमुख, एनटीपीसी लारा द्वारा हरी झंडी दिखाकर शुभारंभ किया गया। इस अवसर पर श्री केशव चंद्र सिंघा रॉय, महाप्रबंधक (प्रचालन एवं अनुरक्षण), श्री हेमंत पावगी, महाप्रबंधक (परियोजना), श्री जाकिर खान, अपर महाप्रबंधक (मानव संसाधन), श्री मनीष कुमार, अपर महाप्रबंधक (तकनीकी सेवाएं) सहित एनटीपीसी के अन्य वरिष्ठ अधिकारी, प्रशिक्षुओं के अभिभावक एवं चयनित युवा उपस्थित रहे।
तीन माह की अवधि का यह गहन प्रशिक्षण कार्यक्रम सेंट्रल इंस्टीट्यूट ऑफ पेट्रोकेमिकल्स इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी, कोरबा में “असिस्टेंट मशीन ऑपरेटर – इंजेक्शन मोल्डिंग” ट्रेड में संचालित किया जाएगा। इस प्रशिक्षण का उद्देश्य युवाओं को उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यावहारिक एवं रोजगारपरक कौशल प्रदान करना है, जिससे वे शिक्षा और रोजगार के बीच की खाई को पाटते हुए आत्मनिर्भर बन सकें तथा औद्योगिक क्षेत्र में प्रभावी योगदान दे सकें।
प्रशिक्षुओं को संबोधित करते हुए श्री सुभाष ठाकुर, परियोजना प्रमुख, एनटीपीसी लारा ने कहा कि कौशल विकास आज के समय में केवल रोजगार प्राप्त करने का साधन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण, आत्मनिर्भरता और दीर्घकालीन रोजगार क्षमता का मजबूत आधार है। उन्होंने युवाओं से अनुशासन, समर्पण और सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ प्रशिक्षण का पूर्ण लाभ उठाने का आह्वान किया।
एनटीपीसी लारा की यह पहल कॉरपोरेट सामाजिक दायित्व के माध्यम से स्थानीय समुदायों के सतत एवं समावेशी विकास की प्रतिबद्धता को दर्शाती है। ऐसे प्रयासों से न केवल युवाओं को कौशल और अवसर प्राप्त हो रहे हैं, बल्कि क्षेत्रीय विकास को गति देते हुए राष्ट्र की प्रगति को भी सुदृढ़ आधार मिल रहा है।

 

वन विभाग की ‘नैतिक दबाव’ रणनीति पर संवैधानिक बहस, कांग्रेस ने बताया तानाशाही फरमान

रायपुर, 05 फरवरी 2026।
छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों के अवैध शिकार को रोकने के लिए वन विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘सामाजिक बहिष्कार’ की रणनीति अब एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक विवाद का रूप ले चुकी है। जहां वन विभाग इसे समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल बता रहा है, वहीं कांग्रेस ने इसे संविधान विरोधी, जंगलराज और भीड़तंत्र को बढ़ावा देने वाला फैसला करार दिया है।


वन विभाग का पक्ष: कानून के साथ नैतिक दबाव की नीति

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के अनुसार, केवल जेल और जुर्माने के डर से शिकार पूरी तरह नहीं रुक पा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में विभाग ने Community for Conservation मॉडल के तहत सामाजिक दबाव की अवधारणा सामने रखी है।

वन विभाग की रणनीति के प्रमुख उद्देश्य:

  • नैतिक दबाव: गांव-समाज में शिकारी की पहचान उजागर होने से लोक-लाज का डर पैदा करना

  • सामुदायिक निगरानी: ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण में भागीदार बनाना

  • युवाओं में संदेश: शिकार को ‘वीरता’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक अपराध’ के रूप में स्थापित करना

प्रस्तावित कदमों में शामिल हैं:

  • सार्वजनिक कार्यक्रमों में शिकारियों की भागीदारी सीमित करना

  • शिकार में पकड़े गए व्यक्तियों के नाम सार्वजनिक करना

  • शिकार बढ़ने पर संबंधित गांव की संयुक्त वन प्रबंधन समिति (JFMC) को मिलने वाले लाभों में कटौती

वन विभाग स्पष्ट कर रहा है कि यह कोई आधिकारिक दंडात्मक आदेश नहीं, बल्कि सामुदायिक संकल्प के रूप में लागू किया जाएगा।


कांग्रेस का हमला: ‘संविधान का अपमान और तानाशाही सोच’

प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने इस फैसले पर तीखा हमला बोलते हुए वन मंत्री केदार कश्यप से सवाल किया—
“क्या छत्तीसगढ़ में अब कानून नहीं, जंगलराज चलेगा? क्या शिकारियों को अदालत नहीं, गांव की भीड़ सजा देगी?”

कांग्रेस का आरोप है कि:

  • सामाजिक बहिष्कार संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ है

  • यह व्यवस्था घृणा, तिरस्कार, जातिगत भेदभाव और हिंसा को जन्म दे सकती है

  • बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के संविधान में सामाजिक बहिष्कार जैसी कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प था, ऐसे में यह फैसला संविधान का अपमान है

धनंजय ठाकुर ने कहा कि वन विभाग अपनी प्रशासनिक विफलता छुपाने के लिए सामाजिक दंड जैसी व्यवस्था थोपना चाहता है। दिसंबर 2025 की विभागीय बैठक में धर्मगुरुओं, गांव के मुखिया और समाजसेवियों के जरिए बहिष्कार कराने का निर्णय वैमनस्य फैलाने वाला है।


कानूनी बनाम सामाजिक दंड: मूल टकराव

यह पूरा विवाद दो विचारधाराओं के बीच टकराव को उजागर करता है—

वन विभाग का दृष्टिकोण कांग्रेस का दृष्टिकोण
समुदाय आधारित संरक्षण संविधान आधारित दंड
नैतिक व सामाजिक दबाव न्यायालय द्वारा सजा
सामूहिक जिम्मेदारी व्यक्तिगत अधिकार
रोकथाम पर जोर कानून के सख्त पालन पर जोर

कांग्रेस की मांग

कांग्रेस ने सरकार से मांग की है कि:

  • सामाजिक बहिष्कार जैसे फैसले पर तत्काल रोक लगाई जाए

  • शिकारियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कड़ी कानूनी सजा दी जाए

  • ऐसे निर्णय लेने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए

  • वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए ठोस और संवैधानिक उपाय किए जाएं


वन विभाग का उद्देश्य भले ही वन्यजीव संरक्षण हो, लेकिन अपनाया गया तरीका अब संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सौहार्द पर सवाल खड़े कर रहा है।
अब यह देखना अहम होगा कि सरकार समुदाय आधारित संरक्षण और संविधान आधारित शासन के बीच किस संतुलन का रास्ता चुनती है।

   रायपुर/ शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि भाजपा सरकार एवं मिलरों के सांठ-गांठ के चलते गरीबों को इस माह चावल देने गोदामों में चावल नहीं है। कस्टम मिलिंग के बाद मिलरों के द्वारा पूरा चावल जमा नहीं कराना सरकार की कमजोरी है। सरकार ने इस माह एकमुश्त दो माह का चावल देने का आदेश जारी किया लेकिन वास्तविकता यह दो माह दूर की बात एक माह का चावल देने लायक स्टॉक सरकारी गोदाम में नहीं है। राशन दुकान में गुणवत्ताहीन खराब चावल मिलने की शिकायत लगातार हो रही है। बस्तर में 30 हजार टन सड़ा चावल वितरण करने दिया गया। जिसका विरोध हुआ, अकेले रायपुर जिला में 75 राईस मिलर ने 7,500 टन कस्टम मिलिंग का जमा नहीं किया गया। पूरे प्रदेश में यही स्थिति है। सरकार ने चावल जमा नहीं करने वाले राईस मिलर पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की? उन्हें ब्लैक लिस्टेड क्यों नहीं किया गया? उनसे चावल की रिकवरी क्यां नहीं की गई? इससे समझ में आ रहा है दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल काली है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि सरकारी गोदाम में चावल नहीं है, फोर्टिफाइड राइस का टेंडर नहीं हुआ है, फिर गरीबों को दो माह का चावल एकमुश्त देने का आदेश क्यों दिया गया? ये आदेश गरीबों के साथ भद्दा मजाक है, अपमान है। क्या खाद्य संचालनालय के अधिकारी बेसुध रहते है? उन्हें अपने विभाग की स्टॉक के बारे में जानकारी नहीं है? बड़ी अराजक स्थिति है? राशन कार्डधारी पहले ही खराब क्वालिटी की सड़ा हुआ चावल राशन दुकानों से मिलने की शिकायत कर रहे है। जिस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। क्या विभाग, खाद्य मंत्री के बिना जानकारी इस प्रकार से आदेश दिया है? क्या ये आदेश विभागीय मंत्री के अनुमोदन से हुआ है? लाखों टन चावल जिसमें फोर्टिफाइड चावल कैसे मिलेगा?

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि जिस प्रकार से खाद्य विभाग की कार्यशैली है इस बात का प्रमाण है विभागीय मंत्री के नियंत्रण में कुछ भी नहीं है? खाद्य मंत्री को इसका जवाब देना चाहिए कि खाली गोदाम से गरीबों के घर तक दो माह का चावल कब पहुंचेगा? सरकार के अजीबोगरीब फरमान से खाद्य अधिकारी एवं राशन दुकान संचालक सभी परेशान है। गरीबों को चावल देने के नाम से भाजपा सरकार गुमराह कर रही है। सरकार तत्काल फोर्टिफाइड मिला चावल की व्यवस्था कर, राशन कार्डधारियों को दे।

नक्सल ऑपरेशन की जानकारी लीक करने के आरोप, IPS अधिकारियों के नाम भी रिपोर्ट में दर्ज कारोबारी दीपक टंडन से विवाद अब राष्ट्रीय सुरक्षा के घेरे में रायपुर/दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ पुलिस…

By - नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। "शौर्यपथ अख़बार" में प्रकाशित खबर के बाद प्रशासन की संवेदनशीलता और कार्यकुशलता का सराहनीय उदाहरण सामने आया है। मामले को गंभीरता से लेते हुए नवपदस्थ कलेक्टर ने बिना विलंब संज्ञान लिया और स्पष्ट निर्देश दिए कि गरीब व विकलांग महिला को शासन की किसी भी पात्र योजना से वंचित न रहने दिया जाए।

कलेक्टर के निर्देश मिलते ही जनपद पंचायत तोकापाल के सीईओ ने सक्रिय भूमिका निभाते हुए पूरी टीम के साथ त्वरित कार्रवाई शुरू की। जमीनी हकीकत को समझते हुए जनपद स्तर पर न केवल फाइलों में सुधार की पहल की गई, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण के साथ समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में काम किया गया।

वहीं खाद्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यशैली भी प्रशंसनीय रही। मामला संज्ञान में आते ही विभागीय अमला बिना किसी औपचारिक देरी के सक्रिय हुआ और राशन कार्ड से जुड़ी त्रुटियों को सुधारने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। अधिकारियों और कर्मचारियों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि शासन की योजनाएं काग़ज़ों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़रूरतमंद तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी उनकी है।

जनपद सीईओ, खाद्य विभाग के अधिकारियों और उनकी पूरी टीम ने आपसी समन्वय के साथ जिस तत्परता और संवेदनशीलता का परिचय दिया, वह प्रशासनिक व्यवस्था की सकारात्मक तस्वीर पेश करता है। विकलांग महिला को चावल, पेंशन और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं से जोड़ने की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ाई जा रही है। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही महिला को चावल, पेंशन और आवास जैसी सभी बुनियादी सुविधाओं का नियमित लाभ मिलेगा और भविष्य में ऐसी संवेदनहीनता की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

यह कार्रवाई न केवल एक गरीब और असहाय महिला के जीवन में राहत लेकर आई है, बल्कि यह भी साबित करती है कि जब प्रशासन इच्छाशक्ति और मानवीय सोच के साथ काम करता है, तो शासन की योजनाएं सचमुच ज़मीन पर उतरती हैं। क्षेत्र में जनपद पंचायत तोकापाल और खाद्य विभाग की इस तत्पर कार्यशैली की सराहना की जा रही है। यह कदम न केवल एक गरीब विकलांग महिला के लिए राहत बना है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि मीडिया में उठी आवाज़ और प्रशासनिक संवेदनशीलता मिलकर ज़मीन पर बदलाव ला सकती है।

*रेट प्रिंट से ऊपर बिक रहा ज़हर!

कोंडागांव में गुटखा-सिगरेट की अवैध बिक्री,
नए टैक्स से पहले थोक व्यापारियों की जमाखोरी,
विभागीय चुप्पी से पनप रहा काला कारोबार**

कोंडागांव | दीपक वैष्णव की  विशेष रिपोर्ट

एक ओर आम आदमी महंगाई की मार से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर कोंडागांव का बाजार नए नियम लागू होने से पहले ही मनमानी महंगाई और कालाबाजारी का गवाह बन चुका है। नगर में गुटखा, जर्दा और सिगरेट बिना रेट प्रिंट, तय मूल्य से कहीं अधिक दामों पर खुलेआम बेचे जा रहे हैं, जबकि संबंधित विभाग कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ नजर आ रहा है।

नए नियम से पहले ही ‘लूट का लाइसेंस’!

भारत सरकार द्वारा 1 फरवरी 2026 से तंबाकू उत्पादों पर नए उत्पाद शुल्क, स्वास्थ्य उपकर और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर लागू किया जाना है। साथ ही चबाने वाले तंबाकू, जर्दा व पान-मसाला के लिए नए पैकिंग नियम अधिसूचित किए जा चुके हैं।

लेकिन कोंडागांव में नियम लागू होने से पहले ही
? थोक व्यापारियों ने जमाखोरी शुरू कर दी है
? पुराने स्टॉक को नए दामों पर खपाया जा रहा है
? छोटे दुकानदार मजबूरी में अधिक कीमत पर बेचने को विवश हैं

यह स्थिति केवल महंगाई नहीं, बल्कि संगठित कालाबाजारी का संकेत देती है।

प्रतिबंध के बावजूद धड़ल्ले से गुटखा बिक्री

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देश के कई राज्यों में गुटखा के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद कोंडागांव के हर चौक-चौराहे, ठेले-गुमटी और किराना दुकानों में
थोक और चिल्लर दोनों स्तर पर प्रतिबंधित गुटखा खुलेआम बिक रहा है।

यह सवाल खड़ा करता है कि
➡️ यह माल आ कहां से रहा है?
➡️ किसकी मिलीभगत से बाजार तक पहुंच रहा है?
➡️ और विभाग की निगाहें आखिर कहां टिकी हैं?

**त्योहारों में मिठाई दुकानों पर छापे,

लेकिन गुटखा पर ‘अघोषित संरक्षण’?**

विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है।
त्योहारी सीजन में
✔️ मिठाई दुकानों पर लगातार दबिश
✔️ सैंपल लेकर ‘खाना-पूर्ति’ की कार्रवाई

लेकिन शहर भर में चल रहे गुटखा-सिगरेट के अवैध कारोबार पर न कोई छापा, न कोई कार्रवाई।
यह चयनात्मक सक्रियता स्पष्ट रूप से विभागीय लापरवाही या मौन सहमति की ओर इशारा करती है।

राजस्व चोरी और सुशासन की पोल

बिना रेट प्रिंट, बिना वैध टैक्स और तय मूल्य से अधिक दामों पर बिक्री
? सीधे-सीधे सरकारी राजस्व की चोरी है
? स्वास्थ्य कानूनों की खुली अवहेलना है
? और सुशासन के दावों पर करारा तमाचा है

प्रदेश सरकार भले ही सुशासन की बात करे,
लेकिन कोंडागांव की जमीनी हकीकत बताती है कि नियम सिर्फ कागजों में जिंदा हैं।

सबसे बड़ा सवाल — जिम्मेदार कौन?

अब सवाल यह नहीं कि
❓ गुटखा बिक रहा है या नहीं
बल्कि सवाल यह है कि
कब जागेगा संबंधित विभाग?
किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय होगी?
या फिर यह अवैध कारोबार यूं ही फलता-फूलता रहेगा?

यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ कानून की हार नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और राजस्व दोनों के साथ खुला अपराध माना जाएगा।

राजनांदगांव /शौर्यपथ / 90s स्टूडियो एवं गिल्टी इंजीनियर्स प्रोडक्शन के बैनर तले बनी छत्तीसगढ़ी फीचर फिल्म 06 फरवरी को छत्तीसगढ़ी के सिनेमा घरों में रिलीज हो रही है ।इस फिल्म के निर्माता दीपेश साहू एवं नीरज ग्वाल फिल्म के निर्देशक एवं निर्माता है। फिल्म में मुख्य रूप से यशवंतानंद, सुरभि कृष्ण श्रीवास्तव, अनिल शर्मा, हीरा मानिकपुरी, अंजली सिंह चौहान, उपासना वैष्णव, नरेंद्र पटनारे ने अभिनय किया है । फिल्म के को प्रोड्यूसर दानेश साहू, विश्वनाथ साहू है और एसोसिएट प्रोड्यूसर अभिषेक ग्वाल और योगेश्वर साहू है ।

0 सामाजिक विषय पर बनी फिल्म

फिल्म सरकारी दमाद की कहानी एक सामाजिक मुद्दे पर आधारित है । फिल्म में सरकारी नौकरी न होने के कारण युवा वर्ग को विवाह में हो रही समस्या को दिखाने का प्रयास किया गया है। फिल्म की कहानी यशवंतानंद और रोहित राव ने लिखी है। फिल्म के स्क्रीनप्ले अथवा डायलॉग के लेखक क्रमशः यशवंतानंद, रोहित राव , मयंक आदिल, गिरधारी आर्यन है।

0 कॉमेडी, फैमिली ड्रामा, रोमांस, इमोशंस से लबरेज

इस फिल्म में सामाजिक मुद्दे को उठाने के साथ साथ भरपूर एंटरटेनमेंट भी देखने को मिलेगा। फिल्म को कॉमेडी , फैमिली ड्रामा , रोमांस , इमोशंस सब कुछ का एक कंप्लीट पैकेज माना जा सकता है।

0 ट्रेलर व गाने है खास

फिल्म का ट्रेलर और गाने अमारा म्यूजिक छत्तीसगढ़ के यूट्यूब चैनल में रिलीज हो गए है । गाने और ट्रेलर को दर्शकों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है। फिल्म का साउंड नीलेश जाटवा एवं म्यूजिक नीलेश पातंगे ने किया है।

0 फिल्म की स्क्रीनिंग को छालीवुड ने सराहा

सरकारी दमाद की स्क्रीनिंग बीते दिनों रायपुर के पी वी आर मैग्नेटो मॉल में सम्पन्न हुई । स्क्रीनिंग में उपस्थित छालीवुड के नामचीन कलाकार निर्देशक, निर्माताओं जैसे सतीश जैन, मनोज वर्मा, अनुज शर्मा, राज वर्मा ने फिल्म की कहानी, म्यूजिक , एक्टिंग, निर्देशन को काफी सराहा है।

0 सरकारी दमाद है राजनांदगांव के लिए खास

इस फिल्म की शूटिंग राजनांदगांव में हुई है। फिल्म में राजनांदगांव शहर अथवा पास के गांव को खूबसूरती से दिखाया है। फिल्म के लेखक अथवा अधिकांश कलाकार राजनांदगांव से है। फिल्म के मुख्य कलाकार यशवंतानंद एवं सुरभि कृष्ण श्रीवास्तव भी राजनांदगांव के है। भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान FTII पुणे से अध्ययनरत सुरभि कृष्ण श्रीवास्तव ने प्रसिद्ध फिल्म बंगाल 1947 जैसे बड़ी फिल्मों में पूर्व में अभिनय किया है तो दूसरी ओर कई वर्षों से थिएटर करने के साथ साथ यशवंतानंद चमन बहार जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके है। फिल्म में राजनांदगांव के कई दिग्गज कलाकारों जैसे शरद श्रीवास्तव, आमोद श्रीवास्तव, विनोद गौतम, भोलाराम बक्शी, सुरेंद्र चंद्राकर , सुदेश यादव , रितेश सिंघाड़े , पूजा शर्मा , देवेश वर्मा, नागेश पठारी ने अभिनय किया है । 0 टीम ने किया प्रशासन और राजनांदगांव वासियों का धन्यवाद फिल्म की शूटिंग राजनांदगांव शहर, ग्राम सुंदरा, जंगलेसर, मनघटा, मुड़ीपार में सम्पन्न हुई है। सफल शूटिंग के लिए टीम ने जिला प्रशासन और जनता को विशेष धन्यवाद ज्ञापित किया ।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ । न्यू बस स्टैंड पर महापौर की तस्वीर को लेकर "शौर्यपथ" में प्रमुखता से प्रकाशित खबर का असर तुरंत देखने को मिला। खबर सामने आने के बाद निगम स्तर पर संज्ञान लिया गया और बस स्टैंड परिसर में लगे पोस्टर से पूर्व महापौर का फोटो हटा दिया गया।

अख़बार के माध्यम से उठे सवाल ने उस स्थिति की ओर ध्यान खींचा, जहां अन्य नेताओं की तस्वीरें तो समय के साथ बदली जा चुकी थीं, लेकिन महापौर की तस्वीर अपडेट होना जैसे यादों के भरोसे छोड़ दिया गया था। सवाल सामने आते ही तस्वीर हटाई गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सुधार की ज़रूरत पहले से थी, बस उसे रेखांकित किया जाना बाकी था।

यह संयोग ही कहा जाएगा कि जो बात लंबे समय तक नजरअंदाज होती रही, वह खबर प्रकाशित होते ही स्मरण में आ गई। कार्रवाई की गति ने यह भी दिखा दिया कि जब मुद्दा प्रमुखता से सामने आता है, तो समाधान में देर नहीं लगती।

फिलहाल, इस त्वरित सुधार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक स्थलों पर लगी तस्वीरें केवल सजावट नहीं होतीं, बल्कि वे व्यवस्था की सजगता और सतर्कता का भी संकेत देती हैं। जनहित से जुड़े विषयों को जब जिम्मेदारी से उजागर किया जाता है, तो व्यवस्था भी उसी जिम्मेदारी के साथ प्रतिक्रिया देती है।

संपादकीय |( शरद पंसारी )

व्यापार केवल आयात–निर्यात का खेल नहीं होता, वह राष्ट्रों की रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक हैसियत और भविष्य की दिशा तय करता है।
3 फरवरी 2026 को अमेरिका और भारत के बीच हुआ नया व्यापार समझौता इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में लगाए गए 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय निर्यात की रीढ़ तोड़ दी थी। उस पृष्ठभूमि में 18 प्रतिशत पर पहुँचना निश्चित रूप से राहत है—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भारत की जीत है, या हालात के आगे झुककर निकाला गया रास्ता?


राहत को जीत कह देना जल्दबाज़ी होगी

इस समझौते के बाद अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क पूरी तरह हट गया है और पारस्परिक टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।
कपड़ा, रत्न-आभूषण, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह जीवनदान से कम नहीं।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
2024 तक यही टैरिफ मात्र 3 प्रतिशत के आसपास था।
इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत आज भी उस स्थिति से नीचे खड़ा है, जहाँ वह दो साल पहले था।


व्यापार युद्ध से बाहर निकलना—यही असली उपलब्धि

संपादकीय दृष्टि से इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि टैरिफ 18 प्रतिशत हुआ,
बल्कि यह है कि भारत 50 प्रतिशत के दंडात्मक व्यापार युद्ध से बाहर निकल पाया

2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब व्यापार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।
ऐसे माहौल में भारत का समझौते की मेज़ पर लौटना एक व्यावहारिक निर्णय था।


जहाँ भारत मजबूत हुआ

यह समझौता भारत को एक ऐसे लाभकारी मोड़ पर ले आया है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती—

  • चीन पर आज भी 30–35% या उससे अधिक अमेरिकी टैरिफ लागू है

  • वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर लगभग 20% शुल्क है

  • जबकि भारत अब 18% पर है

यह स्थिति भारतीय निर्यात को अमेरिकी बाज़ार में स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है।
यह बढ़त 2024 में भारत के पास नहीं थी।


लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी है

हर समझौते की एक कीमत होती है—और यह डील भी अपवाद नहीं।

भारत ने:

  • रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे बंद करने

  • अमेरिकी LNG और तकनीक के आयात बढ़ाने

  • तथा लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता ली है

यह सब भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ा सकता है।
सस्ती ऊर्जा छोड़कर महँगे विकल्प अपनाना, अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।


रणनीतिक प्रश्न यहीं से शुरू होता है

यह समझौता भारत की उस रणनीतिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करता है,
जिस पर वह लंबे समय से गर्व करता आया है।

क्या वैश्विक दबावों के सामने भारत को बार-बार आर्थिक रियायतें देनी पड़ेंगी?
और क्या भविष्य में व्यापारिक फैसले विदेश नीति के दबाव में लिए जाते रहेंगे?

इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं।


निष्कर्ष: न पराजय, न पूर्ण विजय—एक परिपक्व समझौता

यह कहना गलत होगा कि भारत इस समझौते में हार गया।
यह कहना भी सच नहीं होगा कि भारत ने सब कुछ जीत लिया।

सच्चाई यह है कि—

भारत ने टकराव के दौर से निकलकर समझौते का रास्ता चुना है।

यह रास्ता महँगा है, समझौतों से भरा है,
लेकिन वैश्विक व्यापार की वर्तमान वास्तविकताओं में
शायद यही सबसे व्यावहारिक विकल्प भी था।

अब चुनौती यह है कि भारत इस मिली हुई प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को
निर्यात विस्तार, घरेलू उद्योग संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा में बदल पाए—
वरना यह समझौता केवल राहत बनकर रह जाएगा, उपलब्धि नहीं।

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