February 12, 2026
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“ठंड में जागती आस्था और कुर्सियों पर बैठी सुविधा: बागेश्वर धाम की कथा में असली भक्त कौन?” Featured

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रातभर खुले पंडाल में ज़मीन पर बैठे श्रद्धालु बनाम खाली VIP-VVIP पंडाल—चित्र खुद बता रहे हैं श्रद्धा, समर्पण और अनुयायित्व की सच्ची परिभाषा

SHOURYAPATH NEWS 

श्रद्धा की असली परीक्षा : बागेश्वर धाम की कथा और उसके सच्चे श्रोता
बागेश्वर धाम महाराज पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की कथा केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि आस्था, विश्वास और तपस्या की जीवंत परीक्षा है। आपके द्वारा भेजे गए तीनों चित्र किसी भी प्रचार, मंच या भाषण से अधिक स्पष्टता के साथ यह प्रश्न खड़ा करते हैं कि “कथा के असली अधिकारी और सच्चे भक्त आखिर हैं कौन?”

पहला चित्र : ठंड में जागती श्रद्धा
पहला चित्र उस खुले पंडाल का है, जहाँ कथा समाप्त होने के बाद भी आम श्रद्धालु अपने परिवार, बच्चों और बुज़ुर्गों के साथ रातभर ठंड में बैठे हैं। उनके पास न कोई वीआईपी पास है, न आरामदायक कुर्सियाँ, न ही सुरक्षा का घेरा। जमीन पर बिछी चादरें, ओढ़े हुए कंबल और आँखों में अगली कथा के इंतजार की चमक—यही वह दृश्य है जहाँ श्रद्धा सांस लेती दिखाई देती है।

इन लोगों के लिए कथा समय की सुविधा नहीं, बल्कि जीवन का संबल है। अगली कथा दोपहर 2 बजे है, फिर भी वे रात यहीं गुजारते हैं, क्योंकि उनके लिए कथा “पास” से नहीं, “प्रेम” से मिलती है।

दूसरा चित्र : सुविधा के बाद सन्नाटा
दूसरा चित्र वीआईपी कैटेगरी के पंडाल का है। कथा समाप्त होते ही यहाँ सन्नाटा है—सजी-संवरी कुर्सियाँ खाली पड़ी हैं। यह वह वर्ग है, जो सुविधा के साथ आता है और सुविधा के साथ ही चला जाता है। अगली कथा के लिए अब फिर से पास और व्यवस्था की तैयारी होगी।
यहाँ श्रद्धा है, इसमें संदेह नहीं—लेकिन यह श्रद्धा समयबद्ध है, आराम-आधारित है। कथा यहाँ साधना नहीं, एक कार्यक्रम बनकर रह जाती है।

तीसरा चित्र : पहुंच की श्रद्धा
तीसरा चित्र वीवीआईपी कैटेगरी का है—लाल कालीन, आरामदायक सोफे और अलग व्यवस्था। यह वे लोग हैं जो अपनी सामाजिक, राजनीतिक या प्रशासनिक पहुंच के सहारे समय पर आएंगे, कथा सुनेंगे और सम्मान के साथ लौट जाएंगे।
यह श्रद्धा भी है, पर यह संघर्ष से मुक्त है। यहाँ कथा प्रतीक्षा नहीं मांगती, त्याग नहीं मांगती—बस उपस्थिति पर्याप्त है।

सच्ची श्रद्धा किसकी?
तीनों चित्रों को गहराई से देखने पर एक बात स्पष्ट होती है—
सच्ची श्रद्धा वही है जो असुविधा में भी डगमगाए नहीं।
जो ठंड, थकान और इंतजार के बावजूद कथा के लिए वहीं ठहरा रहे।
जो जमीन पर बैठकर भी उतनी ही भक्ति से कथा सुने, जितनी कोई सोफे पर बैठकर सुनता है।
बागेश्वर धाम महाराज की कथा जिन मूल्यों—धैर्य, विश्वास, तप और समर्पण—की शिक्षा देती है, उनका वास्तविक प्रतिबिंब पहले चित्र में बैठे आम श्रद्धालुओं में दिखाई देता है। वही असली अनुयायी हैं, वही कथा के असली अधिकारी हैं, क्योंकि उनकी श्रद्धा किसी पास, पद या पहचान की मोहताज नहीं है।

कथा मंच पर सुनाई जाती है, लेकिन उसकी असली परीक्षा पंडाल में होती है।जहाँ कोई देख नहीं रहा, कोई पहचान नहीं रहा—वहीं श्रद्धा सबसे शुद्ध रूप में प्रकट होती है। बागेश्वर धाम के असली भक्त वही हैं, जो रातभर ठंड में जागकर अगली कथा का इंतजार करते हैं—क्योंकि उनके लिए कथा एक आयोजन नहीं, आस्था का उत्सव है।

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