February 10, 2026
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धर्म संसार / शौर्यपथ / प्रभु यीशु के जन्म की ख़ुशी में मनाया जाने वाला क्रिसमस का त्योहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह त्योहार कई मायनों में बेहद खास है। क्रिसमस को बड़ा दिन, सेंट स्टीफेंस डे या फीस्ट ऑफ़ सेंट स्टीफेंस भी कहा जाता है। प्रभु यीशु ने दुनिया को प्यार और इंसानियत की शिक्षा दी। उन्होंने लोगों को प्रेम और भाईचारे के साथ रहने का संदेश दिया। प्रभु यीशु को ईश्वर का इकलौता प्यारा पुत्र माना जाता है। इस त्योहार से कई रोचक तथ्य जुड़े हैं। आइए जानते हैं इनके बारे में।
क्रिसमस ऐसा त्योहार है जिसे हर धर्म के लोग उत्साह से मनाते हैं। यह एकमात्र ऐसा त्योहार है जिस दिन लगभग पूरे विश्व में अवकाश रहता है। 25 दिसंबर को मनाया जाने वाला यह त्योहार आर्मीनियाई अपोस्टोलिक चर्च में 6 जनवरी को मनाया जाता है। कई देशों में क्रिसमस का अगला दिन 26 दिसंबर बॉक्सिंग डे के रूप मे मनाया जाता है। क्रिसमस पर सांता क्लॉज़ को लेकर मान्यता है कि चौथी शताब्दी में संत निकोलस जो तुर्की के मीरा नामक शहर के बिशप थे, वही सांता थे। वह गरीबों की हमेशा मदद करते थे उनको उपहार देते थे। क्रिसमस के तीन पारंपरिक रंग हैं हरा, लाल और सुनहरा। हरा रंग जीवन का प्रतीक है, जबकि लाल रंग ईसा मसीह के रक्त और सुनहरा रंग रोशनी का प्रतीक है। क्रिसमस की रात को जादुई रात कहा जाता है। माना जाता है कि इस रात सच्चे दिल वाले लोग जानवरों की बोली को समझ सकते हैं। क्रिसमस पर घर के आंगन में क्रिसमस ट्री लगाया जाता है। क्रिसमस ट्री को दक्षिण पूर्व दिशा में लगाना शुभ माना जाता है। फेंगशुई के मुताबिक ऐसा करने से घर में सुख समृद्धि आती है। पोलैंड में मकड़ी के जालों से क्रिसमस ट्री को सजाने की परंपरा है। मान्यता है कि मकड़ी ने सबसे पहले जीसस के लिए कंबल बुना था।

 

वन विभाग की ‘नैतिक दबाव’ रणनीति पर संवैधानिक बहस, कांग्रेस ने बताया तानाशाही फरमान

रायपुर, 05 फरवरी 2026।
छत्तीसगढ़ में वन्यजीवों के अवैध शिकार को रोकने के लिए वन विभाग द्वारा प्रस्तावित ‘सामाजिक बहिष्कार’ की रणनीति अब एक बड़े राजनीतिक और संवैधानिक विवाद का रूप ले चुकी है। जहां वन विभाग इसे समुदाय आधारित संरक्षण मॉडल बता रहा है, वहीं कांग्रेस ने इसे संविधान विरोधी, जंगलराज और भीड़तंत्र को बढ़ावा देने वाला फैसला करार दिया है।


वन विभाग का पक्ष: कानून के साथ नैतिक दबाव की नीति

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (PCCF) एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक के अनुसार, केवल जेल और जुर्माने के डर से शिकार पूरी तरह नहीं रुक पा रहा है। इसी पृष्ठभूमि में विभाग ने Community for Conservation मॉडल के तहत सामाजिक दबाव की अवधारणा सामने रखी है।

वन विभाग की रणनीति के प्रमुख उद्देश्य:

  • नैतिक दबाव: गांव-समाज में शिकारी की पहचान उजागर होने से लोक-लाज का डर पैदा करना

  • सामुदायिक निगरानी: ग्रामीणों को वन्यजीव संरक्षण में भागीदार बनाना

  • युवाओं में संदेश: शिकार को ‘वीरता’ नहीं, बल्कि ‘सामाजिक अपराध’ के रूप में स्थापित करना

प्रस्तावित कदमों में शामिल हैं:

  • सार्वजनिक कार्यक्रमों में शिकारियों की भागीदारी सीमित करना

  • शिकार में पकड़े गए व्यक्तियों के नाम सार्वजनिक करना

  • शिकार बढ़ने पर संबंधित गांव की संयुक्त वन प्रबंधन समिति (JFMC) को मिलने वाले लाभों में कटौती

वन विभाग स्पष्ट कर रहा है कि यह कोई आधिकारिक दंडात्मक आदेश नहीं, बल्कि सामुदायिक संकल्प के रूप में लागू किया जाएगा।


कांग्रेस का हमला: ‘संविधान का अपमान और तानाशाही सोच’

प्रदेश कांग्रेस के वरिष्ठ प्रवक्ता धनंजय सिंह ठाकुर ने इस फैसले पर तीखा हमला बोलते हुए वन मंत्री केदार कश्यप से सवाल किया—
“क्या छत्तीसगढ़ में अब कानून नहीं, जंगलराज चलेगा? क्या शिकारियों को अदालत नहीं, गांव की भीड़ सजा देगी?”

कांग्रेस का आरोप है कि:

  • सामाजिक बहिष्कार संविधान के मूल अधिकारों के खिलाफ है

  • यह व्यवस्था घृणा, तिरस्कार, जातिगत भेदभाव और हिंसा को जन्म दे सकती है

  • बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर के संविधान में सामाजिक बहिष्कार जैसी कुरीतियों को खत्म करने का संकल्प था, ऐसे में यह फैसला संविधान का अपमान है

धनंजय ठाकुर ने कहा कि वन विभाग अपनी प्रशासनिक विफलता छुपाने के लिए सामाजिक दंड जैसी व्यवस्था थोपना चाहता है। दिसंबर 2025 की विभागीय बैठक में धर्मगुरुओं, गांव के मुखिया और समाजसेवियों के जरिए बहिष्कार कराने का निर्णय वैमनस्य फैलाने वाला है।


कानूनी बनाम सामाजिक दंड: मूल टकराव

यह पूरा विवाद दो विचारधाराओं के बीच टकराव को उजागर करता है—

वन विभाग का दृष्टिकोण कांग्रेस का दृष्टिकोण
समुदाय आधारित संरक्षण संविधान आधारित दंड
नैतिक व सामाजिक दबाव न्यायालय द्वारा सजा
सामूहिक जिम्मेदारी व्यक्तिगत अधिकार
रोकथाम पर जोर कानून के सख्त पालन पर जोर

कांग्रेस की मांग

कांग्रेस ने सरकार से मांग की है कि:

  • सामाजिक बहिष्कार जैसे फैसले पर तत्काल रोक लगाई जाए

  • शिकारियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के तहत कड़ी कानूनी सजा दी जाए

  • ऐसे निर्णय लेने वाले अधिकारियों पर कार्रवाई की जाए

  • वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए ठोस और संवैधानिक उपाय किए जाएं


वन विभाग का उद्देश्य भले ही वन्यजीव संरक्षण हो, लेकिन अपनाया गया तरीका अब संवैधानिक अधिकारों और सामाजिक सौहार्द पर सवाल खड़े कर रहा है।
अब यह देखना अहम होगा कि सरकार समुदाय आधारित संरक्षण और संविधान आधारित शासन के बीच किस संतुलन का रास्ता चुनती है।

   रायपुर/ शौर्यपथ / प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि भाजपा सरकार एवं मिलरों के सांठ-गांठ के चलते गरीबों को इस माह चावल देने गोदामों में चावल नहीं है। कस्टम मिलिंग के बाद मिलरों के द्वारा पूरा चावल जमा नहीं कराना सरकार की कमजोरी है। सरकार ने इस माह एकमुश्त दो माह का चावल देने का आदेश जारी किया लेकिन वास्तविकता यह दो माह दूर की बात एक माह का चावल देने लायक स्टॉक सरकारी गोदाम में नहीं है। राशन दुकान में गुणवत्ताहीन खराब चावल मिलने की शिकायत लगातार हो रही है। बस्तर में 30 हजार टन सड़ा चावल वितरण करने दिया गया। जिसका विरोध हुआ, अकेले रायपुर जिला में 75 राईस मिलर ने 7,500 टन कस्टम मिलिंग का जमा नहीं किया गया। पूरे प्रदेश में यही स्थिति है। सरकार ने चावल जमा नहीं करने वाले राईस मिलर पर कोई कार्यवाही क्यों नहीं की? उन्हें ब्लैक लिस्टेड क्यों नहीं किया गया? उनसे चावल की रिकवरी क्यां नहीं की गई? इससे समझ में आ रहा है दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल काली है।

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि सरकारी गोदाम में चावल नहीं है, फोर्टिफाइड राइस का टेंडर नहीं हुआ है, फिर गरीबों को दो माह का चावल एकमुश्त देने का आदेश क्यों दिया गया? ये आदेश गरीबों के साथ भद्दा मजाक है, अपमान है। क्या खाद्य संचालनालय के अधिकारी बेसुध रहते है? उन्हें अपने विभाग की स्टॉक के बारे में जानकारी नहीं है? बड़ी अराजक स्थिति है? राशन कार्डधारी पहले ही खराब क्वालिटी की सड़ा हुआ चावल राशन दुकानों से मिलने की शिकायत कर रहे है। जिस पर अब तक कोई कार्यवाही नहीं हुई है। क्या विभाग, खाद्य मंत्री के बिना जानकारी इस प्रकार से आदेश दिया है? क्या ये आदेश विभागीय मंत्री के अनुमोदन से हुआ है? लाखों टन चावल जिसमें फोर्टिफाइड चावल कैसे मिलेगा?

प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष दीपक बैज ने कहा कि जिस प्रकार से खाद्य विभाग की कार्यशैली है इस बात का प्रमाण है विभागीय मंत्री के नियंत्रण में कुछ भी नहीं है? खाद्य मंत्री को इसका जवाब देना चाहिए कि खाली गोदाम से गरीबों के घर तक दो माह का चावल कब पहुंचेगा? सरकार के अजीबोगरीब फरमान से खाद्य अधिकारी एवं राशन दुकान संचालक सभी परेशान है। गरीबों को चावल देने के नाम से भाजपा सरकार गुमराह कर रही है। सरकार तत्काल फोर्टिफाइड मिला चावल की व्यवस्था कर, राशन कार्डधारियों को दे।

नक्सल ऑपरेशन की जानकारी लीक करने के आरोप, IPS अधिकारियों के नाम भी रिपोर्ट में दर्ज कारोबारी दीपक टंडन से विवाद अब राष्ट्रीय सुरक्षा के घेरे में रायपुर/दंतेवाड़ा। छत्तीसगढ़ पुलिस…

By - नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ। "शौर्यपथ अख़बार" में प्रकाशित खबर के बाद प्रशासन की संवेदनशीलता और कार्यकुशलता का सराहनीय उदाहरण सामने आया है। मामले को गंभीरता से लेते हुए नवपदस्थ कलेक्टर ने बिना विलंब संज्ञान लिया और स्पष्ट निर्देश दिए कि गरीब व विकलांग महिला को शासन की किसी भी पात्र योजना से वंचित न रहने दिया जाए।

कलेक्टर के निर्देश मिलते ही जनपद पंचायत तोकापाल के सीईओ ने सक्रिय भूमिका निभाते हुए पूरी टीम के साथ त्वरित कार्रवाई शुरू की। जमीनी हकीकत को समझते हुए जनपद स्तर पर न केवल फाइलों में सुधार की पहल की गई, बल्कि मानवीय दृष्टिकोण के साथ समस्या के स्थायी समाधान की दिशा में काम किया गया।

वहीं खाद्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारियों की कार्यशैली भी प्रशंसनीय रही। मामला संज्ञान में आते ही विभागीय अमला बिना किसी औपचारिक देरी के सक्रिय हुआ और राशन कार्ड से जुड़ी त्रुटियों को सुधारने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। अधिकारियों और कर्मचारियों ने यह स्पष्ट संदेश दिया कि शासन की योजनाएं काग़ज़ों तक सीमित नहीं, बल्कि ज़रूरतमंद तक पहुँचाने की जिम्मेदारी भी उनकी है।

जनपद सीईओ, खाद्य विभाग के अधिकारियों और उनकी पूरी टीम ने आपसी समन्वय के साथ जिस तत्परता और संवेदनशीलता का परिचय दिया, वह प्रशासनिक व्यवस्था की सकारात्मक तस्वीर पेश करता है। विकलांग महिला को चावल, पेंशन और आवास जैसी बुनियादी सुविधाओं से जोड़ने की प्रक्रिया तेज़ी से आगे बढ़ाई जा रही है। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही महिला को चावल, पेंशन और आवास जैसी सभी बुनियादी सुविधाओं का नियमित लाभ मिलेगा और भविष्य में ऐसी संवेदनहीनता की पुनरावृत्ति नहीं होगी।

यह कार्रवाई न केवल एक गरीब और असहाय महिला के जीवन में राहत लेकर आई है, बल्कि यह भी साबित करती है कि जब प्रशासन इच्छाशक्ति और मानवीय सोच के साथ काम करता है, तो शासन की योजनाएं सचमुच ज़मीन पर उतरती हैं। क्षेत्र में जनपद पंचायत तोकापाल और खाद्य विभाग की इस तत्पर कार्यशैली की सराहना की जा रही है। यह कदम न केवल एक गरीब विकलांग महिला के लिए राहत बना है, बल्कि यह संदेश भी देता है कि मीडिया में उठी आवाज़ और प्रशासनिक संवेदनशीलता मिलकर ज़मीन पर बदलाव ला सकती है।

*रेट प्रिंट से ऊपर बिक रहा ज़हर!

कोंडागांव में गुटखा-सिगरेट की अवैध बिक्री,
नए टैक्स से पहले थोक व्यापारियों की जमाखोरी,
विभागीय चुप्पी से पनप रहा काला कारोबार**

कोंडागांव | दीपक वैष्णव की  विशेष रिपोर्ट

एक ओर आम आदमी महंगाई की मार से जूझ रहा है, तो दूसरी ओर कोंडागांव का बाजार नए नियम लागू होने से पहले ही मनमानी महंगाई और कालाबाजारी का गवाह बन चुका है। नगर में गुटखा, जर्दा और सिगरेट बिना रेट प्रिंट, तय मूल्य से कहीं अधिक दामों पर खुलेआम बेचे जा रहे हैं, जबकि संबंधित विभाग कुंभकर्णी नींद में सोया हुआ नजर आ रहा है।

नए नियम से पहले ही ‘लूट का लाइसेंस’!

भारत सरकार द्वारा 1 फरवरी 2026 से तंबाकू उत्पादों पर नए उत्पाद शुल्क, स्वास्थ्य उपकर और राष्ट्रीय सुरक्षा उपकर लागू किया जाना है। साथ ही चबाने वाले तंबाकू, जर्दा व पान-मसाला के लिए नए पैकिंग नियम अधिसूचित किए जा चुके हैं।

लेकिन कोंडागांव में नियम लागू होने से पहले ही
? थोक व्यापारियों ने जमाखोरी शुरू कर दी है
? पुराने स्टॉक को नए दामों पर खपाया जा रहा है
? छोटे दुकानदार मजबूरी में अधिक कीमत पर बेचने को विवश हैं

यह स्थिति केवल महंगाई नहीं, बल्कि संगठित कालाबाजारी का संकेत देती है।

प्रतिबंध के बावजूद धड़ल्ले से गुटखा बिक्री

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद देश के कई राज्यों में गुटखा के उत्पादन और बिक्री पर प्रतिबंध है। इसके बावजूद कोंडागांव के हर चौक-चौराहे, ठेले-गुमटी और किराना दुकानों में
थोक और चिल्लर दोनों स्तर पर प्रतिबंधित गुटखा खुलेआम बिक रहा है।

यह सवाल खड़ा करता है कि
➡️ यह माल आ कहां से रहा है?
➡️ किसकी मिलीभगत से बाजार तक पहुंच रहा है?
➡️ और विभाग की निगाहें आखिर कहां टिकी हैं?

**त्योहारों में मिठाई दुकानों पर छापे,

लेकिन गुटखा पर ‘अघोषित संरक्षण’?**

विभाग की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है।
त्योहारी सीजन में
✔️ मिठाई दुकानों पर लगातार दबिश
✔️ सैंपल लेकर ‘खाना-पूर्ति’ की कार्रवाई

लेकिन शहर भर में चल रहे गुटखा-सिगरेट के अवैध कारोबार पर न कोई छापा, न कोई कार्रवाई।
यह चयनात्मक सक्रियता स्पष्ट रूप से विभागीय लापरवाही या मौन सहमति की ओर इशारा करती है।

राजस्व चोरी और सुशासन की पोल

बिना रेट प्रिंट, बिना वैध टैक्स और तय मूल्य से अधिक दामों पर बिक्री
? सीधे-सीधे सरकारी राजस्व की चोरी है
? स्वास्थ्य कानूनों की खुली अवहेलना है
? और सुशासन के दावों पर करारा तमाचा है

प्रदेश सरकार भले ही सुशासन की बात करे,
लेकिन कोंडागांव की जमीनी हकीकत बताती है कि नियम सिर्फ कागजों में जिंदा हैं।

सबसे बड़ा सवाल — जिम्मेदार कौन?

अब सवाल यह नहीं कि
❓ गुटखा बिक रहा है या नहीं
बल्कि सवाल यह है कि
कब जागेगा संबंधित विभाग?
किस अधिकारी की जिम्मेदारी तय होगी?
या फिर यह अवैध कारोबार यूं ही फलता-फूलता रहेगा?

यदि समय रहते सख्त कार्रवाई नहीं हुई, तो यह सिर्फ कानून की हार नहीं, बल्कि जनस्वास्थ्य और राजस्व दोनों के साथ खुला अपराध माना जाएगा।

राजनांदगांव /शौर्यपथ / 90s स्टूडियो एवं गिल्टी इंजीनियर्स प्रोडक्शन के बैनर तले बनी छत्तीसगढ़ी फीचर फिल्म 06 फरवरी को छत्तीसगढ़ी के सिनेमा घरों में रिलीज हो रही है ।इस फिल्म के निर्माता दीपेश साहू एवं नीरज ग्वाल फिल्म के निर्देशक एवं निर्माता है। फिल्म में मुख्य रूप से यशवंतानंद, सुरभि कृष्ण श्रीवास्तव, अनिल शर्मा, हीरा मानिकपुरी, अंजली सिंह चौहान, उपासना वैष्णव, नरेंद्र पटनारे ने अभिनय किया है । फिल्म के को प्रोड्यूसर दानेश साहू, विश्वनाथ साहू है और एसोसिएट प्रोड्यूसर अभिषेक ग्वाल और योगेश्वर साहू है ।

0 सामाजिक विषय पर बनी फिल्म

फिल्म सरकारी दमाद की कहानी एक सामाजिक मुद्दे पर आधारित है । फिल्म में सरकारी नौकरी न होने के कारण युवा वर्ग को विवाह में हो रही समस्या को दिखाने का प्रयास किया गया है। फिल्म की कहानी यशवंतानंद और रोहित राव ने लिखी है। फिल्म के स्क्रीनप्ले अथवा डायलॉग के लेखक क्रमशः यशवंतानंद, रोहित राव , मयंक आदिल, गिरधारी आर्यन है।

0 कॉमेडी, फैमिली ड्रामा, रोमांस, इमोशंस से लबरेज

इस फिल्म में सामाजिक मुद्दे को उठाने के साथ साथ भरपूर एंटरटेनमेंट भी देखने को मिलेगा। फिल्म को कॉमेडी , फैमिली ड्रामा , रोमांस , इमोशंस सब कुछ का एक कंप्लीट पैकेज माना जा सकता है।

0 ट्रेलर व गाने है खास

फिल्म का ट्रेलर और गाने अमारा म्यूजिक छत्तीसगढ़ के यूट्यूब चैनल में रिलीज हो गए है । गाने और ट्रेलर को दर्शकों द्वारा खूब पसंद किया जा रहा है। फिल्म का साउंड नीलेश जाटवा एवं म्यूजिक नीलेश पातंगे ने किया है।

0 फिल्म की स्क्रीनिंग को छालीवुड ने सराहा

सरकारी दमाद की स्क्रीनिंग बीते दिनों रायपुर के पी वी आर मैग्नेटो मॉल में सम्पन्न हुई । स्क्रीनिंग में उपस्थित छालीवुड के नामचीन कलाकार निर्देशक, निर्माताओं जैसे सतीश जैन, मनोज वर्मा, अनुज शर्मा, राज वर्मा ने फिल्म की कहानी, म्यूजिक , एक्टिंग, निर्देशन को काफी सराहा है।

0 सरकारी दमाद है राजनांदगांव के लिए खास

इस फिल्म की शूटिंग राजनांदगांव में हुई है। फिल्म में राजनांदगांव शहर अथवा पास के गांव को खूबसूरती से दिखाया है। फिल्म के लेखक अथवा अधिकांश कलाकार राजनांदगांव से है। फिल्म के मुख्य कलाकार यशवंतानंद एवं सुरभि कृष्ण श्रीवास्तव भी राजनांदगांव के है। भारतीय फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान FTII पुणे से अध्ययनरत सुरभि कृष्ण श्रीवास्तव ने प्रसिद्ध फिल्म बंगाल 1947 जैसे बड़ी फिल्मों में पूर्व में अभिनय किया है तो दूसरी ओर कई वर्षों से थिएटर करने के साथ साथ यशवंतानंद चमन बहार जैसी फिल्मों में अभिनय कर चुके है। फिल्म में राजनांदगांव के कई दिग्गज कलाकारों जैसे शरद श्रीवास्तव, आमोद श्रीवास्तव, विनोद गौतम, भोलाराम बक्शी, सुरेंद्र चंद्राकर , सुदेश यादव , रितेश सिंघाड़े , पूजा शर्मा , देवेश वर्मा, नागेश पठारी ने अभिनय किया है । 0 टीम ने किया प्रशासन और राजनांदगांव वासियों का धन्यवाद फिल्म की शूटिंग राजनांदगांव शहर, ग्राम सुंदरा, जंगलेसर, मनघटा, मुड़ीपार में सम्पन्न हुई है। सफल शूटिंग के लिए टीम ने जिला प्रशासन और जनता को विशेष धन्यवाद ज्ञापित किया ।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ । न्यू बस स्टैंड पर महापौर की तस्वीर को लेकर "शौर्यपथ" में प्रमुखता से प्रकाशित खबर का असर तुरंत देखने को मिला। खबर सामने आने के बाद निगम स्तर पर संज्ञान लिया गया और बस स्टैंड परिसर में लगे पोस्टर से पूर्व महापौर का फोटो हटा दिया गया।

अख़बार के माध्यम से उठे सवाल ने उस स्थिति की ओर ध्यान खींचा, जहां अन्य नेताओं की तस्वीरें तो समय के साथ बदली जा चुकी थीं, लेकिन महापौर की तस्वीर अपडेट होना जैसे यादों के भरोसे छोड़ दिया गया था। सवाल सामने आते ही तस्वीर हटाई गई, जिससे यह स्पष्ट हुआ कि सुधार की ज़रूरत पहले से थी, बस उसे रेखांकित किया जाना बाकी था।

यह संयोग ही कहा जाएगा कि जो बात लंबे समय तक नजरअंदाज होती रही, वह खबर प्रकाशित होते ही स्मरण में आ गई। कार्रवाई की गति ने यह भी दिखा दिया कि जब मुद्दा प्रमुखता से सामने आता है, तो समाधान में देर नहीं लगती।

फिलहाल, इस त्वरित सुधार ने यह स्पष्ट कर दिया है कि सार्वजनिक स्थलों पर लगी तस्वीरें केवल सजावट नहीं होतीं, बल्कि वे व्यवस्था की सजगता और सतर्कता का भी संकेत देती हैं। जनहित से जुड़े विषयों को जब जिम्मेदारी से उजागर किया जाता है, तो व्यवस्था भी उसी जिम्मेदारी के साथ प्रतिक्रिया देती है।

संपादकीय |( शरद पंसारी )

व्यापार केवल आयात–निर्यात का खेल नहीं होता, वह राष्ट्रों की रणनीतिक स्वायत्तता, वैश्विक हैसियत और भविष्य की दिशा तय करता है।
3 फरवरी 2026 को अमेरिका और भारत के बीच हुआ नया व्यापार समझौता इसी कसौटी पर परखा जाना चाहिए।

यह समझौता ऐसे समय में हुआ है, जब 2025 में लगाए गए 50 प्रतिशत अमेरिकी टैरिफ ने भारतीय निर्यात की रीढ़ तोड़ दी थी। उस पृष्ठभूमि में 18 प्रतिशत पर पहुँचना निश्चित रूप से राहत है—लेकिन सवाल यह है कि क्या यह भारत की जीत है, या हालात के आगे झुककर निकाला गया रास्ता?


राहत को जीत कह देना जल्दबाज़ी होगी

इस समझौते के बाद अमेरिकी बाज़ार में भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत का दंडात्मक शुल्क पूरी तरह हट गया है और पारस्परिक टैरिफ घटकर 18 प्रतिशत रह गया है।
कपड़ा, रत्न-आभूषण, फार्मा और इंजीनियरिंग जैसे क्षेत्रों के लिए यह जीवनदान से कम नहीं।

लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि
2024 तक यही टैरिफ मात्र 3 प्रतिशत के आसपास था।
इस दृष्टि से देखा जाए तो भारत आज भी उस स्थिति से नीचे खड़ा है, जहाँ वह दो साल पहले था।


व्यापार युद्ध से बाहर निकलना—यही असली उपलब्धि

संपादकीय दृष्टि से इस समझौते की सबसे बड़ी उपलब्धि यह नहीं कि टैरिफ 18 प्रतिशत हुआ,
बल्कि यह है कि भारत 50 प्रतिशत के दंडात्मक व्यापार युद्ध से बाहर निकल पाया

2025 में अमेरिकी प्रतिबंधों ने यह स्पष्ट कर दिया था कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में अब व्यापार केवल आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक हथियार बन चुका है।
ऐसे माहौल में भारत का समझौते की मेज़ पर लौटना एक व्यावहारिक निर्णय था।


जहाँ भारत मजबूत हुआ

यह समझौता भारत को एक ऐसे लाभकारी मोड़ पर ले आया है, जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती—

  • चीन पर आज भी 30–35% या उससे अधिक अमेरिकी टैरिफ लागू है

  • वियतनाम और बांग्लादेश जैसे प्रतिस्पर्धी देशों पर लगभग 20% शुल्क है

  • जबकि भारत अब 18% पर है

यह स्थिति भारतीय निर्यात को अमेरिकी बाज़ार में स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त देती है।
यह बढ़त 2024 में भारत के पास नहीं थी।


लेकिन कीमत भी चुकानी पड़ी है

हर समझौते की एक कीमत होती है—और यह डील भी अपवाद नहीं।

भारत ने:

  • रूसी तेल की खरीद धीरे-धीरे बंद करने

  • अमेरिकी LNG और तकनीक के आयात बढ़ाने

  • तथा लगभग 500 अरब डॉलर के अमेरिकी उत्पाद खरीदने की प्रतिबद्धता ली है

यह सब भारत की ऊर्जा लागत और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ा सकता है।
सस्ती ऊर्जा छोड़कर महँगे विकल्प अपनाना, अर्थव्यवस्था के लिए दीर्घकालिक चुनौती बन सकता है।


रणनीतिक प्रश्न यहीं से शुरू होता है

यह समझौता भारत की उस रणनीतिक स्वतंत्रता पर भी सवाल खड़े करता है,
जिस पर वह लंबे समय से गर्व करता आया है।

क्या वैश्विक दबावों के सामने भारत को बार-बार आर्थिक रियायतें देनी पड़ेंगी?
और क्या भविष्य में व्यापारिक फैसले विदेश नीति के दबाव में लिए जाते रहेंगे?

इन सवालों के उत्तर आसान नहीं हैं।


निष्कर्ष: न पराजय, न पूर्ण विजय—एक परिपक्व समझौता

यह कहना गलत होगा कि भारत इस समझौते में हार गया।
यह कहना भी सच नहीं होगा कि भारत ने सब कुछ जीत लिया।

सच्चाई यह है कि—

भारत ने टकराव के दौर से निकलकर समझौते का रास्ता चुना है।

यह रास्ता महँगा है, समझौतों से भरा है,
लेकिन वैश्विक व्यापार की वर्तमान वास्तविकताओं में
शायद यही सबसे व्यावहारिक विकल्प भी था।

अब चुनौती यह है कि भारत इस मिली हुई प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त को
निर्यात विस्तार, घरेलू उद्योग संरक्षण और ऊर्जा सुरक्षा में बदल पाए—
वरना यह समझौता केवल राहत बनकर रह जाएगा, उपलब्धि नहीं।

0 ग्रामीण भाजपा ने जताया हर्ष

राजनंदगांव/शौर्यपथ/ विधानसभा अध्यक्ष डॉ रमन सिंह लगातार अपनी विधानसभा के विकास कार्यों के लिए सतत प्रयास करते रहते हैं ,और लगातार विकास कार्यों को स्वीकृति प्रदान करने में लगे रहते हैं इसी कड़ी में आज डॉ रमन सिंह ने अपने विधानसभा के 45 कार्यों हेतु 2 करोड़ 8 लख रुपए की स्वीकृति प्रदान करवाई ।

विदित हो कि वित्तीय वर्ष 25 -26 में भाग संख्या 80 के अंतर्गत छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण एवं अन्य पिछड़ा वर्ग विकास प्राधिकरण के लिए राशि में से प्रवधानित राशि की स्वीकृति प्रदान की गई । इस हेतु माननीय मुख्यमंत्री विष्णु देव साय एवं अध्यक्ष छत्तीसगढ़ राज्य ग्रामीण एवं अन्य पिछड़ा वर्ग विकास प्राधिकरण द्वारा क्षेत्रीय आवश्यकताओं एवं जनहित को ध्यान में रखते हुए डॉ रमन सिंह द्वारा प्रेषित प्रस्ताव पर अमल करते हुए 2 करोड आठ लाख दस हजार रुपए की स्वीकृति प्राधिकरण के अनुमोदन की प्रत्याशा में दी गई है , जिसके अनुसार राजनांदगांव विधानसभा क्षेत्र के निम्न कार्यों की स्वीकृति दी गई है किचन शेड प्राथमिक शाला भवन ग्राम बम्हनी विकासखंड व जिला राजनांदगांव हेतु 5 लाख रुपए , नाली निर्माण शीतला मंदिर से नया तालाब ग्राम धनगांव हेतु 6 लाख रुपए, नाली निर्माण वार्ड नंबर 3 एवं 7 ग्राम बरगा चार लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण जी रोड से तालाब तक ग्राम भानपुरी 5.20 लख रुपए, सीसी रोड निर्माण जी ई रोड से जसपाल घर तक ग्राम धर्मपुर 5.20 लख रुपए, निर्मला घाट निर्माण शीतल तालाब पार ग्राम भोथीपार खुर्द 5.20 लाख रुपए, नाली निर्माण शीतला मंदिर स्कूल के पास ग्राम कोपेडीह ₹4 लाख रुपये, सांस्कृतिक मंच निर्माण शीतला पारा ग्राम धामनसरा 2.50 लख रुपए, निर्मला घाट निर्माण रपटा तालाब ग्राम पनेका ₹5 लाख रुपये, निर्मला घाट निर्माण राजगामी तालाब में ग्राम बाकल 5.20 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण कार्य शासकीय प्राथमिक माध्यमिक शाला के पास ग्राम रीवागहन ₹5 लाख रुपए, पेपर ब्लॉक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र ग्राम सुकुलदेहांन 3 लाख रुपये, बोर खनन हनुमान मंदिर के पाग्राम भानपुरी 1. 6 लाख रुपए, यात्री प्रतीक्षालय निर्माण कार्य मुख्य सड़क मार्ग में ग्राम महाराजपुर 5 लाख रुपये, नाली निर्माण कार्य आबादी पर से हरदी नाला तक ग्राम भंवरमरा 4 लाख रुपए, निर्मला घाट निर्माणकार्य छोटा तालाब में ग्राम सुंदरा विकासखंड 5 लाख रुपए, । निर्मला घाट निर्माण नया तालाब में ग्राम पारीकला 5 लाख रुपये, सीसी रोड निर्माण कार्य मुख्य मार्ग से डालू घर तक 5.20 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण कार्य गोपाल साहू घर से शमशान घाट तक ग्राम रानीतराई 5.20 लाख रुपए, कंक्रीटी कारण निर्माण कार्य कोथा में ग्राम बोरी 5.20 लख रुपए, नाली निर्माण कार्य चमारराय वर्मा घर से हालर चौक तक ग्राम डिलापहरी 6 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण कार्य मुख्य मार्ग से मुक्तिधाम तक ग्राम बरगाही 5.20 लाख रुपए, नाली निर्माण कार्य वार्ड नंबर 1 ग्राम लिटिया 5 लाख रुपये, मंच निर्माण कैलाश नगर ग्राम जगलेश्वर 3 लाख रुपए, कंक्रीटकरण निर्माण कार्य वार्ड नंबर 15 से 13 तक ग्राम रवेली 5.20 लख रुपए, पेपर ब्लॉक निर्माण मिडिल स्कूल मे ग्राम खैरा 7 लाख रुपए, यात्री प्रतीक्षालय सार्वजनिक मंच के पास ग्राम मनकी 5 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण वार्ड 6 कुशल साहू घर से शिवभवानी घर तक ग्राम टेडेसरा 5.20 लाख रुपए, निर्मला घाट निर्माण नया तालाब में ग्राम मौहाभांठा 2. 6 लाख रुपए, निर्मला घाट निर्माण डबरी तालाब में ग्राम इं इदावनी 5.20 लाख रुपए, मंच निर्माण वार्ड नंबर 17 सखा तालाब के पास ग्राम अंजोरा 5 लाख रुपए, निर्मला घाट निर्माण माता तालाब में ग्राम धीरी 2. 6 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण बांदा तालाब से शमशान घाट तक ग्राम मगरलोटा 5.20 लाख रुपए, शौचालय निर्माण माध्यमिक शाला में ग्राम बैगाटोला 3 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण हनुमान मंदिर से नानक सिंह के खेत तक ग्राम बिरेझर 2. 6 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण मिडिल स्कूल से शीतला मंदिर तक ग्राम ईरा 5.20 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण वार्ड नंबर 6 ग्राम फुलझर5.20 लाख रुपए, निर्मला घाट निर्माण तालाब ग्राम खुटेरी 5.20 लाख रुपए, निर्मला घाट निर्माण शीतल तालाब ग्राम मुड़पार 5.20 लाख रुपए, मैदान कांक्रीटिकरण कर्मा भवन के पास ग्राम मोखला 5.20 लाख रुपए, सीसी रोड निर्माण वार्ड नंबर 5 ग्राम सुरगी 5.20 लाख

भाजपा मीडिया सेल द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार विकास कार्यों की स्वीकृति पर जिला भाजपा अध्यक्ष कोमल सिंह राजपूत, ग्रामीण मंडल अध्यक्ष मनोज साहू, खिलेश्वर साहू, रोहित चंद्राकर, लीलाधर साहू ,,जिला पंचायत सदस्य देवकुमारी साहू , प्रतीमा चंद्राकर सहित भाजपा नेताओ ने विकास कार्यों की स्वीकृति पर हर्ष व्यक्त करते हुए मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय विधानसभा अध्यक्ष डॉ रमन सिंह का आभार व्यक्त किया है ।

By- नरेश देवांगन 

जगदलपुर, शौर्यपथ । नगर निगम जगदलपुर में वर्तमान महापौर संजय पांडे हैं, लेकिन न्यू बस स्टैंड मे लगी पोस्टर कुछ और ही कहानी कहती नजर आ रही हैं। यहां अब भी पूर्व महापौर सफ़िरा साहू का फोटो प्रमुखता से लगा हुआ है, जबकि उसी बोर्ड पर मौजूद अन्य पूर्व नेताओं की तस्वीरों पर वर्तमान सरकार के नेताओं के फोटो चिपकाए जा चुके हैं।

हैरानी की बात यह है कि जहां “अपडेट” करने की फुर्ती दिखाई गई, वहां महापौर की तस्वीर को जस का तस छोड़ दिया गया। सवाल यह है कि क्या निगम की नज़र में महापौर का पद इतना गौण है कि उसकी तस्वीर बदलने की ज़रूरत ही नहीं समझी गई? या फिर जिम्मेदारों के लिए यह तय करना ही मुश्किल हो गया है कि शहर का वर्तमान महापौर आखिर है कौन?

शहर में यह चर्चा आम है कि निगम कार्यालयों और सार्वजनिक स्थलों पर लगी तस्वीरें सिर्फ शोपीस नहीं होतीं, वे व्यवस्था की सजगता भी दिखाती हैं। ऐसे में न्यू बस स्टैंड पर टंगी तस्वीरें निगम की प्राथमिकताओं पर तंज कसती प्रतीत हो रही हैं।

अब निगाहें निगम के जिम्मेदारों पर टिकी हैं—क्या वे इसे सामान्य भूल बताकर नजरअंदाज करेंगे, या फिर समय के साथ तस्वीरें भी बदलेंगी? फिलहाल, न्यू बस स्टैंड पर सवाल टंगा है, जवाब नहीं।

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