लेख / पिछले कई महीनों से देखा जा रहा है कि प्रदेश में किसी भी प्रकार की घटना घटित होने पर भाजपा के नेता मुख्यमंत्री भूपेश बघेल से इस्तीफे की मांग करने लग जाते हैं खैर विपक्ष का यह काम है कि सरकार के काम का आंकलन करना कमजोरियों को उजागर करना और सरकार को घेरना ताकि सरकार पर कार्य को लेकर ,गुणवत्ता को लेकर ,निष्पक्षता को लेकर दबाव बना रहे लोकतंत्र की यही खूबसूरत तस्वीर है कि सत्ता पक्ष की कमियों को उजागर करने का काम विपक्ष करता है और विपक्ष की हमेशा से यही मांग रहती है कि सरकार नहीं चला सकते तो इस्तीफा दे दें यही भारत का लोकतंत्र है किंतु पिछले दिनों देखने में आया कि बालेश्वर रेल दुर्घटना में किस तरह से लापरवाही के कारण वीभत्स और दर्दनाक दुर्घटना घटित हुई जो देश ही नहीं दुनिया के 20 साल के इतिहास में यह सबसे बड़ी दुर्घटना के रूप में सामने आए जिसमें लगभग 300 लोगों की मृत्यु और 1000 से ज्यादा लोगों के घायल होने की जानकारी सामने आई . इस दुर्घटना पर विपक्ष ने भी अपने सवाल खड़े किए और जिम्मेदार लोगों पर कड़ी से कड़ी कार्यवाही की मांग के साथ इस्तीफे की मांग भी की यही लोकतंत्र है इसी लोकतंत्र की सुंदर तस्वीर सत्ता पक्ष और विपक्ष के द्वारा राजनीतिक की सीढ़ियों पर चढ़ने का एक मार्ग है देखने में आया कि जब विपक्ष इस्तीफे की मांग कर रहे थे तो कई भाजपा के नेता इसे गंदी और तुच्छ राजनीति करार देने में नहीं चूक रहे थे, नैतिकता की बात कर रहे थे कई नेताओं ने तो यहां तक भी कह दिया कि विपक्ष मौत पर गंदी राजनीति कर रही है .
बड़ा सवाल ये उठता है कि ऐसे ही मामले जब छत्तीसगढ़ में हुए तब नैतिकता की बात करने वाले कई भाजपा ही नेता मुख्यमंत्री से इस्तीफे की मांग किस नैतिकता के आधार पर कर रहे थे साल भर पहले कवर्धा की घटना को देखा जाए तो एक तरफ कवर्धा में सांप्रदायिक सौहार्द्र बिगाड़ने की संभावना जागृत हो रही थी वहीं भाजपा के नेता इसे राजनीतिक रूप देकर प्रदेश में जगह-जगह प्रदर्शन कर रहे थे एवं इस्तीफे की मांग कर रहे थे वही हाल में बेमेतरा के एक गांव में आपसी दुश्मनी की वजह से हुई हत्या को किस तरह से सामाजिक रंग देने की कोशिश हुई जिस पर पुलिस प्रशासन ने सामाजिक संगठनों के साथ बैठक कर मामले को शांत करने का भरपूर प्रयास किया और सफल भी हुए किंतु इस आपसी विवाद ने पूरे प्रदेश को ही हिला कर रख दिया जगह-जगह प्रदर्शन हुए और इस्तीफे की मांग की गई तब कहां गई थी नेताओं की कि नैतिकता की बातें . आज 300 लोगों की जानें गई कई गंभीर रूप से घायल हैं जबकि इनमें से किसी की भी कोई गलती नहीं थी . किसी और की लापरवाही की सजा है यह भुगत रहे हैं कई लोगों के परिवार के चिराग बुझ गए और इस पर जवाब देने के लिए कोई भी सामने नहीं आ रहा है सिर्फ नैतिकता की बात की जा रही है क्या देश के इतिहास में इतनी बड़ी दुर्घटना होने के बावजूद भी सवाल करना गुनाह है क्या लोकतंत्र में अब सत्ता पक्ष से सवाल करने पर देशद्रोही का प्रमाण पत्र देने का काम करेंगे कुछ सोशल मिडिया के धुरंधर . देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी देश की जनता को इस मामले पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे उन्होंने भी प्रेस कॉन्फ्रेंस कैंसिल कर दी तब सबकी नजर इस प्रेस कांफ्रेंस पर थी सत्ता सँभालने के ९ साल बाद देश के पीएम किसी प्रेस कांफ्रेंस के ज़रिये चौथे स्तंभ के सामने होने वाले थे किन्तु वह भी स्थगित हो गई . आज पूरा देश जानना चाहता है कि 300 लोगों की अकाल मृत्यु और हजारों लोगों के घायल की जिम्मेदारी किसकी है छोटी-छोटी बातों पर इस्तीफा मांगने वाले आज नैतिकता की बात कर रहे हैं क्या वह इन मृत लोगों के परिजनों को कोई जवाब दे सकते हैं कि आखिर बिना गलती के इनकी मौत क्यों हुई और किसकी जिम्मेदारी बनती है इस घटना पर . आश्चर्य की बात है कि कुछ चाटुकार मिडिया ग्रुप पुरानी घटनाओं की तुलना करने लगा आश्चर्य तो तब हुआ जब एक केन्द्रीय मंत्री ने पुराने मामलो की जाँच का हवाला देते हुए सवाल पूछने वालो से ही सवाल करने लगे . केन्द्रीय मंत्री शायद यह भूल गए कि इन्ही अव्यवस्थाओ के कारण देश की जनता ने उन्हें मौका दिया किन्तु जवाब देने की जगह पुरानी घटनाओं का हवाला देकर क्या आज के जीवंत सवाल से बचा जा सकता है क्या जिम्मेदारी से भागा जा सकता है अगर जिम्मेदारी नहीं तो सरकार से मिलने वाली सुविधाओ का जिस पर लाखो करोडो खर्च होते है दोहन क्यों आखिर लोकतंत्र में अब सवाल क्या सत्ताधारी करेंगे अगर ऐसा है तो कहा है लोक तंत्र कहा है नैतिकता कौन है इतने लोगो की मृत्यु का दोषी किसकी है जिम्मेदारी सवाल बहुत है किन्तु जवाब देने वाले अभी नैतिकता की बात कर रहे ....
लेखक के निजी विचार
शरद पंसारी