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Shourya Path News - सरलता से गंभीर चिंतन करती पुस्तक

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सरलता से गंभीर चिंतन करती पुस्तक

  • rounak group

   शौर्यपथ / सत्य वह नहीं है जो असत्य है। सत्य स्वयं में एक अनुभव है जो मन की कंदराओं से निकल कर आपको वास्तविकता से जोड़ता है। सत्य की संपूर्ण विलक्षण अनुभूति जिसे हुई है वह भी अभिव्यक्ति के स्तर पर स्वयं को अकिंचन ही समझता है कि किन शब्दों में उसे बताया या समझाया जाए। > संवेदना के धरातल पर सत्य निर्मल है, निर्विकार है। सत्य से साक्षात्कार करने के लिए स्वयं का शब्द, वाक्य, अलंकार और अभिव्यंजना से सराबोर होना जरूरी नहीं है बल्कि जरूरी है सहजता से उसे मन के भीतर ही कहीं पा लेना। युवा पत्रकार प्रवीण तिवारी ने अपनी नवीनतम पुस्तक 'सत्य की खोज' में अत्यंत सरल, स्पष्ट, सटीक और संक्षिप्त लेकिन प्रभावशाली रूप में इस विषय की कुशल पड़ताल की है।
प्रवीण तिवारी पेशे से पत्रकार हैं लेकिन पिछले कुछ दिनों में उन्होंने अपनी एक नई पहचान स्थापित की है और वह है आध्यात्मिकता के स्तर पर पहुंचा पैनी पैठ का एक युवा चिंतक। इस छवि के अनुरूप ही उनकी इस पुस्तक ने साहित्य संसार में वैचारिक दस्तक दी है। प्रवीण ने -सत्य क्या है, सत्य की खोज की आवश्यकता, अभ्यास, बाधाएं, अस्त्र, खोज और गीता, सत्य की कुंजी, सत्य के साथ अनुभव और अंत में सत्य की प्राप्ति जैसे सरलतम बिंदुओं के माध्यम से पड़ाव दर पड़ाव अपनी अभिव्यक्ति को विस्तार दिया है। लेखक ने सत्य की खोज के बहाने समाज में एक सरल व्यक्तित्व के निर्माण, रक्षण और निरंतर उसके विकास और उससे भी आगे निखार पर जोर दिया है। मन की मलीनता से लेकर व्यवहार के स्तर पर व्यक्त होने वाली जटिलताओं को लेखक ने सूक्ष्मता से परखा और महसूस किया है। व्यवहारगत कमियों और खामियों को भी इस खूबी से वर्णि‍त किया है कि वह हम अपने आप में पाते हैं पर उसके प्रति नकारात्मक भाव नहीं लाते हुए उससे मुक्ति पाने का मार्ग तलाशते हैं। लेखक ने क्लैप-बाय-क्लैप अपने पन्नों को पलटने के लिए बाध्य किया है। हर पूर्व चैप्टर में वह अगले के लिए जिज्ञासा उत्पन्न करते हैं और सबसे महत्वपूर्ण की उन जिज्ञासाओं की संतुष्टि भी पाठक को अगले पन्ने पर मिलती है। अगर लेखक प्रश्न उठाता है तो हर संभावित उत्तरों की सूची भी उसकी मंजूषा में है।
लेखक की सोच जितनी स्पष्ट है लेखन भी उतना ही सरल है। 'सत्य की खोज' जैसे विषय पर लिखी यह पुस्तक किसी साधारण से पाठक को असाधारण रूप से चैतन्य करने की क्षमता रखती है। जीवन के प्रति नितांत नया और तेजस्वी दृष्टिकोण देती यह पुस्तक हर उस पाठक को पढ़नी चाहिए जो व्यर्थ के आडंबरों में उलझा है। वैचारिक मंथन के स्थान पर जो वैचारिक प्रलाप को प्राथमिकता देता है।
पुस्तक की सबसे खास बात यह है कि इसमें उपदेश नहीं है, उदाहरण है। कथनी नहीं है, करनी है। प्रपंच नहीं है, प्रयास है। भव्य अलंकरण नहीं है, सरल आचरण है। एक जगह लेखक लिखता है - सत्य की खोज में निकलने वालों की सबसे बड़ी बाधा असत्य से प्रियता है। इस प्रियता से मुक्ति ही संपूर्ण पुस्तक का मूल है। भावों की मधुरता और भाषा की प्रवाहमयता से पूरी पुस्तक एक सांस में पढ़ जाने की ताकत रखती है। यकीनन सरलता से गंभीर चिंतन करती यह पुस्तक आकर्षित करती है। लेखक : प्रवीण तिवारी 


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