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दुर्ग निगम के नोटिस से उठा संवैधानिक सवाल: क्या निर्वाचित महिला पार्षद की पद गरिमा की हुई अनदेखी? Featured

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आयुक्त के नोटिस में 'पार्षद' पद का उल्लेख नहीं, रेशमा सोनकर ने राष्ट्रपति से मुख्यमंत्री तक भेजने की तैयारी की प्रतिवेदन की प्रतिलिपि; भाजपा की 'ट्रिपल इंजन सरकार' में बढ़ी सियासी चर्चा

दुर्ग । नगर पालिक निगम दुर्ग के आयुक्त सुमित अग्रवाल द्वारा वार्ड क्रमांक 58 की निर्वाचित महिला पार्षद रेशमा सोनकर को जारी नोटिस अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह मामला संवैधानिक मर्यादा, स्थानीय स्वशासन, महिला जनप्रतिनिधियों के सम्मान और भाजपा संगठन की आंतरिक राजनीति तक पहुंच गया है।

24 जून को जारी निगम के नोटिस में पार्षद को केवल "श्रीमती रेशमा सोनकर" संबोधित किया गया है, जबकि उनके निर्वाचित पद "पार्षद, वार्ड क्रमांक 58" का उल्लेख नहीं किया गया। इसी बिंदु को लेकर पार्षद ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराते हुए इसे निर्वाचित जनप्रतिनिधि की संस्थागत गरिमा की अनदेखी बताया है।

क्या है पूरा मामला?

नगर निगम ने नोटिस में आरोप लगाया है कि स्वच्छ भारत मिशन (SBM 2.0) के अंतर्गत वार्ड 57 में प्रस्तावित मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (MRF) निर्माण कार्य के दौरान 21 जून को कार्य में बाधा उत्पन्न की गई, ठेकेदार और मजदूरों को डराया गया तथा शासकीय कार्य प्रभावित हुआ। निगम ने इसे शासन की महत्वपूर्ण परियोजना बताते हुए कार्रवाई की चेतावनी दी है।

दूसरी ओर पार्षद रेशमा सोनकर ने इन सभी आरोपों को पूरी तरह निराधार बताते हुए कहा है कि उन्होंने न किसी कर्मचारी, अधिकारी अथवा ठेकेदार से दुर्व्यवहार किया और न ही किसी शासकीय कार्य में बलपूर्वक बाधा डाली। उन्होंने प्रशासन से आरोपों के समर्थन में सीसीटीवी फुटेज, वीडियो, स्वतंत्र गवाह, पुलिस रिकॉर्ड अथवा अन्य विधिसम्मत साक्ष्य सार्वजनिक करने की मांग की है।

संविधान का दिया हवाला

अपने विस्तृत जवाब में पार्षद ने संविधान के अनुच्छेद 14, 15, 19, 21 तथा 74वें संविधान संशोधन का उल्लेख करते हुए कहा है कि जनता की समस्याओं को उठाना निर्वाचित जनप्रतिनिधि का संवैधानिक दायित्व है। उनका कहना है कि कोई भी प्रशासनिक अधिकारी संविधान और लोकतांत्रिक संस्थाओं से ऊपर नहीं हो सकता।

पर्यावरणीय नियमों पर भी उठाए सवाल

पार्षद का दावा है कि संबंधित स्थल पर ठोस अपशिष्ट जलाया जा रहा है, जो राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) के दिशा-निर्देशों के विपरीत है। उन्होंने कहा कि उनके पास फोटो, वीडियो और अन्य साक्ष्य उपलब्ध हैं, जिन्हें आवश्यकता पड़ने पर न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाएगा।

केरल दौरे के बीच गरमाई राजनीति

उल्लेखनीय है कि 24 जून को ही निगम के पार्षदों का दल केरल अध्ययन दौरे पर रवाना हुआ। इसी दौरान नोटिस का मुद्दा सामने आने के बाद भाजपा के भीतर भी चर्चा तेज हो गई। राजनीतिक हलकों में यह सवाल उठ रहा है कि भाजपा की ट्रिपल इंजन सरकार होने के बावजूद एक भाजपा की महिला पार्षद के साथ हुए इस घटनाक्रम पर पार्टी नेतृत्व और जनप्रतिनिधियों की चुप्पी क्यों है।

नगर निगम की राजनीति में पहले से चल रही गुटबाजी की चर्चाओं के बीच यह प्रकरण नए विवाद का कारण बन गया है। विपक्ष के साथ-साथ राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि इससे प्रशासन और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों के बीच समन्वय पर सवाल खड़े हुए हैं।

राष्ट्रपति से मुख्यमंत्री तक भेजा जाएगा प्रतिवेदन

रेशमा सोनकर ने बताया कि वे इस पूरे मामले का विस्तृत प्रतिवेदन राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल, मुख्य न्यायाधीश, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, मुख्यमंत्री, उपमुख्यमंत्री एवं नगरीय प्रशासन मंत्री, शिक्षा मंत्री, महापौर, मुख्य सचिव, नगरीय प्रशासन विभाग, संभागायुक्त और कलेक्टर सहित विभिन्न संवैधानिक एवं प्रशासनिक प्राधिकारियों को भेजेंगी।

अब सबकी नजर इन सवालों पर

अब इस मामले में कई महत्वपूर्ण प्रश्न चर्चा के केंद्र में हैं—

क्या नोटिस जारी करते समय निर्वाचित जनप्रतिनिधि के पद का उल्लेख किया जाना चाहिए था?
क्या निगम प्रशासन के आरोपों के समर्थन में पर्याप्त साक्ष्य उपलब्ध हैं?
क्या पर्यावरणीय नियमों के उल्लंघन के आरोपों की स्वतंत्र जांच होगी?
भाजपा नेतृत्व और महापौर अलका बाघमार इस विवाद पर क्या रुख अपनाएंगी?
क्या यह मामला स्थानीय स्वशासन और प्रशासनिक अधिकारों की नई बहस का आधार बनेगा?

नोट: यह समाचार उपलब्ध निगम नोटिस तथा पार्षद रेशमा सोनकर द्वारा लगाए गए आरोपों और दावों पर आधारित है। निगम प्रशासन का पक्ष नोटिस में दर्ज आरोपों तक सीमित है। आरोपों की सत्यता का अंतिम निर्धारण सक्षम जांच अथवा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा।

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