नकद वसूली के साथ आयुष्मान कार्ड भी किया एक्टिवेट, रसीद तक नहीं—परिजनों ने लगाया गंभीर भ्रष्टाचार का आरोप, स्वास्थ्य विभाग की चुप्पी पर सवाल
दुर्ग | शौर्यपथ
शहर में निजी अस्पतालों की मनमानी और स्वास्थ्य विभाग की कथित निष्क्रियता अब खुलकर सामने आने लगी है। ओम परिसर स्थित गंगोत्री हॉस्पिटल पर एक ऐसा गंभीर आरोप लगा है, जो न केवल चिकित्सा व्यवस्था पर सवाल खड़े करता है, बल्कि केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी आयुष्मान भारत योजना की विश्वसनीयता पर भी चोट करता है।
मामला दुर्ग निवासी आकाश वर्मन से जुड़ा है, जिन्होंने आरोप लगाया है कि उनकी बहन के इलाज के दौरान अस्पताल प्रबंधन ने नकद राशि भी वसूली और साथ ही आयुष्मान कार्ड को बिना जानकारी के एक्टिवेट कर दिया। यह दोहरा खेल तब उजागर हुआ, जब मरीज को दूसरे अस्पताल में शिफ्ट किया गया।
3 दिन तक “इलाज” या सिर्फ खानापूर्ति?
बताया गया कि 28 तारीख को सड़क दुर्घटना में घायल आकाश वर्मन की बहन और नानी को गंगोत्री हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया।
परिजनों का आरोप है कि तीन दिनों तक इलाज के नाम पर सिर्फ औपचारिकता निभाई गई, जबकि मरीज की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ।
स्थिति बिगड़ने पर परिजनों ने मरीज को शंकराचार्य हॉस्पिटल, दुर्ग में शिफ्ट किया, जहां डॉक्टरों ने तुरंत गंभीरता को देखते हुए आईसीयू में भर्ती किया। यह वही मरीज थी, जिसे गंगोत्री में सामान्य वार्ड में रखा गया था।
40-45 हजार कैश… फिर भी आयुष्मान चालू!
परिजनों के अनुसार, गंगोत्री हॉस्पिटल प्रबंधन ने इलाज के नाम पर 40 से 45 हजार रुपये नकद लिए, लेकिन कोई रसीद नहीं दी गई।
चौंकाने वाली बात तब सामने आई जब शंकराचार्य हॉस्पिटल में आयुष्मान कार्ड इस्तेमाल करने की कोशिश की गई—
? सिस्टम में दिखा कि कार्ड पहले से ही किसी अन्य अस्पताल में एक्टिव है।
यानी,
नकद भी लिया गया और सरकारी योजना का लाभ भी उठाया गया!
“यह सीधे-सीधे आयुष्मान योजना पर डाका”
परिजनों का आरोप है कि गंगोत्री हॉस्पिटल ने जानबूझकर कहा कि आयुष्मान कार्ड से इलाज संभव नहीं, जबकि अंदर ही अंदर कार्ड को एक्टिवेट कर लिया गया।
यदि यह आरोप सही है, तो यह सरकारी योजना में संगठित भ्रष्टाचार का स्पष्ट मामला बनता है।
कमीशनखोरी और झोला-छाप कनेक्शन?
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कुछ ग्रामीण क्षेत्रों के अप्रमाणित (झोला-छाप) डॉक्टरों द्वारा कमीशन के लालच में मरीजों को इस अस्पताल में रेफर किया जाता है।
यदि यह नेटवर्क सक्रिय है, तो यह मामला और भी गंभीर हो जाता है।
रसीद मांगी तो विवाद का प्रयास?
आकाश वर्मन का आरोप है कि जब उन्होंने नकद भुगतान की रसीद मांगी, तो अस्पताल संचालक गराडे द्वारा न केवल टालमटोल किया गया, बल्कि माहौल को विवादित बनाने की कोशिश भी की गई, ताकि मामले को दबाया जा सके।
हालांकि, परिजनों ने शांतिपूर्ण तरीके से विरोध दर्ज कराया।
थाने में शिकायत, अब प्रशासन की परीक्षा
इस पूरे मामले की लिखित शिकायत मोहन नगर थाना में की गई है।
अब बड़ा सवाल यह है कि:
? क्या स्वास्थ्य विभाग और जिला प्रशासन इस मामले में सख्त कार्रवाई करेगा?
? या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रह जाएगा?
पहले भी विवादों में रहा अस्पताल
गंगोत्री हॉस्पिटल पहले भी नियमों के उल्लंघन और संदिग्ध संचालन को लेकर चर्चा में रहा है।
सोशल मीडिया पर बड़े-बड़े दावे करने वाला यह अस्पताल, जमीनी हकीकत में कई सवालों के घेरे में है।
सबसे बड़ा सवाल
जब एक अस्पताल
नकद वसूली करता है
रसीद नहीं देता
और साथ ही सरकारी योजना का लाभ भी उठाता है
तो यह सिर्फ लापरवाही नहीं, बल्कि
? “मरीजों की जिंदगी से सीधा खिलवाड़” है।
अब नजरें प्रशासन पर टिकी हैं—क्या गंगोत्री हॉस्पिटल पर गिरेगी कार्रवाई की गाज, या फिर सिस्टम की चुप्पी सब कुछ ढंक देगी?